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इंस्टाग्राम से स्लीपर सेल तक; यूपी में तेजी से फैल रहा ‘डिजिटल कट्टरपंथ’

इंस्टाग्राम और एन्क्रिप्टेड ऐप्स के जरिए युवाओं को जाल में फंसाकर यूपी में फैलाया जा रहा डिजिटल कट्टरपंथ, जासूसी और स्लीपर सेल भर्ती का नया हाइब्रिड मॉडल

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सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 21 मई , 2026

रामपुर के एक छोटे कस्बे का 22 वर्षीय युवक पिछले कुछ महीनों से अपने परिवार की नजरों में अचानक बदलने लगा था. साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाला यह युवक देर रात तक फोन पर व्यस्त रहता, विदेशी कारों, दुबई के आलीशान विला और लग्जरी रिसॉर्ट्स के वीडियो शेयर करता और अक्सर कहता कि ‘भारत में मेहनत से कुछ नहीं मिलता.’ 

परिवार को लगा कि वह सोशल मीडिया की चकाचौंध से प्रभावित हो गया है, लेकिन जांच एजेंसियों के अनुसार वह धीरे-धीरे एक ऐसे डिजिटल नेटवर्क के संपर्क में आ चुका था, जिसे पाकिस्तान स्थित गैंगस्टर शहजाद भट्टी और उसके सहयोगी चला रहे थे. उत्तर प्रदेश आतंकवाद निरोधक दस्ता यानी एटीएस की जांच में सामने आया कि युवक की शुरुआत इंस्टाग्राम पर हुई दोस्ती से हुई थी.

पहले उसे महंगे लाइफस्टाइल और आसान पैसे का लालच दिखाया गया. फिर धीरे-धीरे उससे संवेदनशील जगहों की तस्वीरें, स्थानीय गतिविधियों की जानकारी और कुछ खास लोगों पर नजर रखने जैसे ‘छोटे काम’ कराए जाने लगे.

एजेंसियों का दावा है कि यही नया पैटर्न अब उत्तर प्रदेश सहित पूरे उत्तर भारत में तेजी से फैल रहा है, जहां सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को पहले प्रभावित किया जाता है और फिर उन्हें कट्टरपंथ, जासूसी या अस्थिरता फैलाने वाली गतिविधियों की तरफ धकेला जाता है.

उत्तर प्रदेश क्यों बना नया निशाना

केंद्रीय और राज्य सुरक्षा एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार उत्तर प्रदेश पाकिस्तान समर्थित डिजिटल कट्टरपंथ और स्लीपर सेल भर्ती रणनीति का सबसे बड़ा लक्ष्य बनकर उभरा है. इसकी सबसे बड़ी वजह राज्य की विशाल युवा आबादी, तेजी से बढ़ती स्मार्टफोन पहुंच और सोशल मीडिया का गहरा प्रभाव है.

पिछले कुछ महीनों में एटीएस और केंद्रीय एजेंसियों की गिरफ्तारियों और जांचों ने यह संकेत दिया है कि अब पारंपरिक आतंकी मॉड्यूल की जगह ‘हाइब्रिड खतरे’ का मॉडल विकसित हो चुका है. इसमें अपराध, कट्टरपंथ, जासूसी और साइबर नेटवर्किंग एक साथ काम कर रहे हैं. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ये नेटवर्क किसी संगठित आतंकी ढांचे की तरह दिखाई नहीं देते बल्कि छोटे-छोटे नागरिक आधारित मॉड्यूल के रूप में संचालित होते हैं.

सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक पहले आतंकी संगठनों के स्पष्ट ढांचे, प्रशिक्षण शिविर और संपर्क चैनल होते थे. अब भर्ती का पूरा तंत्र इंस्टाग्राम, यूट्यूब, टेलीग्राम और एन्क्रिप्टेड चैट प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट हो चुका है. युवाओं को सीधे कट्टरपंथी सामग्री नहीं दिखाई जाती बल्कि पहले उन्हें मनोरंजन, धन और पहचान के सपने दिखाकर नेटवर्क में खींचा जाता है.

इसी खतरे को देखते हुए पिछले सप्ताह केंद्रीय एजेंसियों और एंटी टेररिज्म यूनिटों ने उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश में एक साथ बड़े पैमाने पर छापेमारी की. लगभग 300 संदिग्धों को पूछताछ और डिजिटल जांच के लिए हिरासत में लिया गया.

जांचकर्ताओं का मानना है कि पाकिस्तान स्थित गैंगस्टर शहजाद भट्टी इस पूरे नेटवर्क में एक डिजिटल रिक्रूटर की भूमिका निभा रहा था. एजेंसियों के अनुसार वह सोशल मीडिया के जरिए ऐसे युवाओं की पहचान करता था जो आर्थिक रूप से कमजोर, सामाजिक रूप से असंतुष्ट या तेजी से पैसा और पहचान हासिल करने की इच्छा रखते थे.

अधिकारियों के मुताबिक भट्टी और उसके सहयोगियों ने सोशल मीडिया पर अपनी एक सुनियोजित छवि तैयार की. इसमें लग्जरी कारें, विदेशी यात्राएं, महंगे रिसॉर्ट, नकदी के बंडल और हथियारों के प्रदर्शन वाले वीडियो शामिल थे. जांचकर्ताओं का कहना है कि यह सिर्फ दिखावा नहीं था बल्कि मनोवैज्ञानिक भर्ती रणनीति का हिस्सा था.

‘हाइब्रिड खतरा’ क्या है

उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण ने हालिया मामलों को ‘हाइब्रिड खतरे’ का संकेत बताया है. उनके अनुसार यह ऐसा मॉडल है जिसमें सोशल मीडिया आधारित कट्टरता, संगठित अपराध, जासूसी और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियां एक-दूसरे से जुड़कर काम करती हैं.

इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें शामिल व्यक्ति शुरुआत में खुद को अपराधी या आतंकी नहीं मानते. उन्हें पहले छोटे आर्थिक काम दिए जाते हैं. जैसे किसी रेलवे ट्रैक की तस्वीर लेना, किसी सरकारी इमारत का वीडियो बनाना, किसी इलाके की भीड़भाड़ का आकलन करना या सोशल मीडिया पर कुछ खास तरह का कंटेंट फैलाना. धीरे-धीरे यही लोग बड़े नेटवर्क का हिस्सा बन जाते हैं. एजेंसियों का कहना है कि यह प्रक्रिया इतनी धीमी और सामान्य दिखती है कि परिवार और स्थानीय समाज को लंबे समय तक इसकी भनक तक नहीं लगती.

उत्तर प्रदेश एटीएस ने हाल ही में मेरठ से हिजबुल्लाह अली खान उर्फ तुषार चौहान और दिल्ली के सीमापुरी से समीर खान को गिरफ्तार किया. दोनों की उम्र करीब 20 वर्ष बताई जा रही है. जांच एजेंसियों का आरोप है कि दोनों डिजिटल कट्टरपंथ के शुरुआती चरण में थे.

एक वरिष्ठ एटीएस अधिकारी के अनुसार दोनों प्रशिक्षित आतंकी नहीं थे, बल्कि ‘डिजिटल ग्रूमिंग’ के शिकार युवा थे. जांचकर्ताओं का कहना है कि इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म के जरिये पहले उनसे दोस्ती की गई, फिर धीरे-धीरे उन्हें चरमपंथी विचारधारा और गोपनीय गतिविधियों की तरफ प्रेरित किया गया.

अधिकारियों के मुताबिक इस प्रक्रिया में सीधे हिंसा की बात नहीं होती. पहले युवाओं में व्यवस्था के प्रति असंतोष पैदा किया जाता है, फिर उन्हें ‘सिस्टम से लड़ने’ या ‘खास मिशन’ का हिस्सा बनने का एहसास कराया जाता है. कई मामलों में उन्हें पैसे या विदेश भेजने का लालच भी दिया जाता है.

रामपुर से लेकर गाजियाबाद तक फैला नेटवर्क

रामपुर में एजेंसियां गयास पाशा नामक युवक से जुड़े संबंधों की जांच कर रही हैं. अधिकारियों को संदेह है कि जिले के कई अन्य युवा भी ऑनलाइन इस नेटवर्क के संपर्क में आए थे. जांच में यह भी सामने आया कि इनमें से अधिकतर युवक 20 से 25 वर्ष आयु वर्ग के हैं.

गाजियाबाद में हाल ही में एक कथित जासूसी नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ जिसमें एक महिला समेत करीब 21 लोगों की गिरफ्तारी हुई. जांचकर्ताओं के अनुसार आरोपी पैसे के बदले पाकिस्तान स्थित संचालकों को संवेदनशील प्रतिष्ठानों के वीडियो और लोकेशन साझा कर रहे थे.

एजेंसियों का कहना है कि अब जासूसी का तरीका भी बदल चुका है. पहले पेशेवर एजेंटों का इस्तेमाल होता था, लेकिन अब आम नागरिकों को छोटे पैसों के बदले डिजिटल माध्यम से इस्तेमाल किया जा रहा है. किसी भी व्यक्ति के स्मार्टफोन को एक संभावित निगरानी उपकरण में बदला जा सकता है.

बिजनौर में पुलिस ने ऐसे गिरोह का खुलासा किया जिस पर हथियारों के साथ वीडियो पोस्ट करने, आगजनी और रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम को नुकसान पहुंचाने का आरोप है. जांचकर्ताओं के अनुसार गिरोह एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऑटोमोबाइल शोरूमों को निशाना बनाने की योजना बना रहा था.

सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि रेलवे नेटवर्क अब तेजी से संवेदनशील लक्ष्य बनता जा रहा है. इसकी वजह यह है कि रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम में मामूली छेड़छाड़ भी बड़े स्तर पर यातायात बाधित कर सकती है. अधिकारियों के अनुसार इस तरह की गतिविधियों का उद्देश्य सिर्फ भौतिक नुकसान पहुंचाना नहीं होता बल्कि आम लोगों के बीच भय और अस्थिरता पैदा करना भी होता है. यही वजह है कि अब रेलवे, संचार नेटवर्क और ऊर्जा ढांचे की निगरानी बढ़ा दी गई है.

अपराध और कट्टरपंथ का नया गठजोड़

जांच एजेंसियों का कहना है कि इस पूरे नेटवर्क में संगठित अपराध और वैचारिक कट्टरपंथ का नया मेल दिखाई दे रहा है. भगोड़े गैंगस्टर शारिक सत्था से जुड़े पुराने मामलों का जिक्र करते हुए अधिकारियों ने बताया कि नवंबर 2024 में संभल हिंसा की जांच के दौरान पाकिस्तान स्थित संचालकों से उसके कथित संबंध सामने आए थे.

विशेषज्ञों के मुताबिक यह मॉडल इसलिए ज्यादा खतरनाक है क्योंकि इसमें अपराधी नेटवर्क पहले से मौजूद संसाधन, फर्जी दस्तावेज, हवाला चैनल और स्थानीय संपर्क उपलब्ध कराते हैं, जबकि विदेशी संचालक वैचारिक और रणनीतिक दिशा देते हैं. यानी अब आतंकी गतिविधियां सिर्फ धार्मिक कट्टरता तक सीमित नहीं रहीं बल्कि अपराध, साइबर तकनीक और सोशल मीडिया प्रभाव का मिश्रित स्वरूप ले चुकी हैं.

सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि इस पूरे तंत्र में सबसे प्रभावशाली हथियार सोशल मीडिया है. इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और एन्क्रिप्टेड चैट ग्रुप्स के जरिये युवाओं को प्रभावित करना पहले से कहीं आसान हो गया है. जांचकर्ताओं के अनुसार कई मामलों में युवाओं को शुरुआत में यह एहसास तक नहीं होता कि वे किसी संगठित नेटवर्क का हिस्सा बन रहे हैं. उन्हें लगता है कि वे सिर्फ ‘ऑनलाइन दोस्त’ बना रहे हैं या ‘इन्फ्लुएंसर कंटेंट’ देख रहे हैं.

विशेषज्ञों के मुताबिक एल्गोरिद्म आधारित प्लेटफॉर्म भी इस खतरे को बढ़ाते हैं. एक बार कोई युवक हथियार, लग्जरी जीवनशैली या आक्रामक राष्ट्रवादी सामग्री से जुड़े वीडियो देखने लगता है तो प्लेटफॉर्म उसे उसी तरह का और अधिक कंटेंट दिखाने लगते हैं. इससे धीरे-धीरे उसकी डिजिटल दुनिया बदल जाती है.

एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ये नेटवर्क बेहद विकेंद्रीकृत हैं. इनमें शामिल लोग एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जानते तक नहीं. पूरा संचालन डिजिटल माध्यम से होता है. यही वजह है कि पारंपरिक खुफिया तंत्र के लिए ऐसे मॉड्यूल का पता लगाना कठिन हो रहा है.

पहले जहां संदिग्ध बैठकों, यात्रा या हथियारों की आवाजाही से सुराग मिलते थे, अब पूरा संपर्क एन्क्रिप्टेड ऐप्स और फर्जी सोशल मीडिया प्रोफाइल के जरिये होता है. अधिकारियों का कहना है कि अब जांच का बड़ा हिस्सा डिजिटल फॉरेंसिक, वित्तीय लेनदेन और ऑनलाइन गतिविधियों की विश्लेषण पर आधारित हो गया है. एजेंसियां उत्तर प्रदेश और उत्तरी भारत में फैले नेटवर्क के डिजिटल पदचिह्न, बैंकिंग ट्रेल और अंतरराज्यीय संचार पैटर्न की मैपिंग कर रही हैं.

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है. बेरोजगारी, सामाजिक असुरक्षा, तेजी से बदलती डिजिटल संस्कृति और त्वरित सफलता की चाह भी युवाओं को ऐसे नेटवर्क के प्रति संवेदनशील बना रही है.

यही वजह है कि सुरक्षा एजेंसियां अब सिर्फ गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहना चाहतीं. पुलिस और खुफिया इकाइयां स्कूलों, कॉलेजों और स्थानीय समुदायों के स्तर पर डिजिटल जागरूकता बढ़ाने की रणनीति पर भी काम कर रही हैं. अधिकारियों का मानना है कि आने वाले वर्षों में लड़ाई सिर्फ सीमा पर नहीं बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर भी लड़ी जाएगी. और उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और युवा राज्य में यह चुनौती सबसे ज्यादा गंभीर रूप ले सकती है.

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