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झारखंड में डीजीपी की कुर्सी पर केंद्र और राज्य सरकार का झगड़ा बढ़ क्यों गया?

झारखंड में DGP के पद को लेकर राज्य सरकार पर केंद्र सरकार की गाइडलाइन्स की अनदेखी के आरोप लग रहे हैं

झारखंड की डीजीपी तदाशा मिश्रा
झारखंड की डीजीपी तदाशा मिश्रा
अपडेटेड 29 जनवरी , 2026

झारखंड में पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति का मसला सुलझने के बजाय उलझता ही जा रहा है. राज्य में ऐसा पहली बार नहीं, बल्कि तीसरी बार हो रहा है जब पुलिस मुखिया की कुर्सी विवादों में घिरी है.

ताजा मामला वर्तमान डीजीपी तदाशा मिश्रा से जुड़ा है, जिनकी नियुक्ति पर अब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीधा दखल देते हुए कड़ी आपत्ति जताई है. केंद्र ने स्पष्ट कहा है कि यह नियुक्ति नियमों और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के खिलाफ है.

क्या है पूरा मामला?

विवाद की शुरुआत बीते 4 नवंबर को हुई, जब तत्कालीन डीजीपी अनुराग गुप्ता ने अचानक इस्तीफा दे दिया. सरकार ने इसे तीन दिन बाद यानी 6 नवंबर को स्वीकार किया और तदाशा मिश्रा को प्रभारी डीजीपी बना दिया. पेंच तब फंसा जब 31 दिसंबर को रिटायर होने जा रहीं तदाशा मिश्रा को उनके रिटायरमेंट से ठीक एक दिन पहले, दिसंबर को, दो साल का सेवा विस्तार देकर स्थाई डीजीपी नियुक्त कर दिया गया.

इस पर एक्शन लेते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 13 जनवरी को राज्य सरकार को पत्र लिखा. मंत्रालय ने ना केवल तदाशा मिश्रा की नियुक्ति प्रक्रिया को गलत बताया, बल्कि यह भी कह दिया कि उन्हें 31 दिसंबर 2025 से ही रिटायर माना जाए. केंद्र ने राज्य की पिछली तीन डीजीपी नियुक्तियों को भी नियमों के विरुद्ध करार दिया है.

लेकिन आखिर वो कौन सा नियम है जिस पर केंद्र और झारखंड सरकार आमने-सामने हैं?

केंद्र बनाम राज्य: नियमों की रस्साकशी

केंद्र की गाइडलाइन सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह जजमेंट, 2006 के आधार पर तैयार की गई है जिसके मुताबिक, राज्यों को डीजीपी पद के लिए 6 सीनियर IPS अधिकारियों के नाम UPSC को भेजने होते हैं. UPSC उनमें से तीन नाम चुनकर राज्य को भेजता है, जिनमें से किसी एक को सरकार डीजीपी बनाती है. शर्त ये है कि अधिकारी का सर्विस रिकॉर्ड साफ हो और उसे कम से कम 2 साल का कार्यकाल मिले.

वहीं झारखंड सरकार ने 2024 में ‘सेलेक्शन एंड अप्वाइंटमेंट रूल्स’ नाम से अपनी नई नियमावली बना ली है. सरकार का तर्क है कि 'पुलिस' राज्य का विषय है, इसलिए वे नियम बना सकते हैं. राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के 2019 के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा कि कई बार कानून-व्यवस्था, नक्सल समस्या और अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों में 2 साल के कार्यकाल से पहले भी डीजीपी को हटाने या नियुक्त करने की शक्ति राज्य के पास होनी चाहिए.

राज्य की नई नियमावली के तहत अब डीजीपी चुनने के लिए UPSC पैनल की जरूरत नहीं है. इसके लिए एक विशेष समिति बनाई गई है जिसके अध्यक्ष हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज होंगे. इनके अलावा, इस समिति में राज्य के मुख्य सचिव, UPSC के नॉमिनेटेड मेम्बर, झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) के अध्यक्ष या प्रतिनिधि, गृह विभाग के प्रधान सचिव और राज्य के पूर्व डीजीपी शामिल होंगे. 

फिलहाल, नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस नई नियमावली को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिस पर 4 फरवरी को सुनवाई होनी है.

बाबूलाल मरांडी का आरोप: ‘सीनियरिटी की अनदेखी हुई'

बाबूलाल मरांडी ने 7 जनवरी को केंद्रीय गृह सचिव को पत्र लिखकर इस नियुक्ति पर सवाल उठाए थे. उनका कहना है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइन्स की गलत व्याख्या की है और सरकार का यह तर्क सही नहीं है कि सीनियर अधिकारी उपलब्ध नहीं थे.

मरांडी के मुताबिक, झारखंड कैडर में डीजी रैंक के तीन वरिष्ठ अधिकारी— अनिल पालटा (1990 बैच), प्रशांत सिंह (1992 बैच) और एम.एस. भाटिया (1993 बैच) मौजूद थे और कोई भी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर नहीं था. इनका कार्यकाल भी क्रमशः एक, दो और तीन साल बचा था. लेकिन 1994 बैच की तदाशा मिश्रा को सीनियरिटी लांघकर डीजीपी बना दिया गया.

'सुपर सीएम' का खेल और इनसाइड स्टोरी

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सीनियरिटी में सबसे ऊपर चल रहे एम.एस. भाटिया को राज्य के एक बड़े प्रशासनिक अधिकारी का समर्थन हासिल था. लेकिन मुख्यमंत्री के करीबी लोगों को डर था कि भाटिया के डीजीपी बनने से वो प्रशासनिक अधिकारी 'सुपर सीएम' की हैसियत में आ जाएंगे. इसी रस्साकशी में तीसरे नंबर की दावेदार तदाशा मिश्रा को मौका मिल गया और उन्हें राज्य की पहली महिला डीजीपी बनने का खिताब भी हासिल हुआ.

बहरहाल, बाबूलाल मरांडी का कहना है कि जिस तरह अनुराग गुप्ता के मामले में सारे नियम ताक पर रखे गए और बाद में उन्हें हटाना पड़ा, वैसा ही हश्र इस नियुक्ति का भी हो सकता है. अब सबकी निगाहें 4 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं.

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