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उत्तर प्रदेश : सूदखोरों के चक्कर में लोग कर रहे आत्महत्या! कानून और बैकिंग सिस्टम कहां हुआ फेल?

सूदखोरी निषेध कानून और सरकारी योजनाओं के बावजूद यूपी में सूदखोर बेलगाम हैं. सवाल है कि बैंकिंग तंत्र, प्रशासन और राजनीति क्यों इस काले धंधे को नहीं रोक पा रहे

लोन चुकाने के लिए मांगी दो और दिन की मोहलत, घर का गेट उखाड़ ले गए रिकवरी एजेंट (ai image)
बीते छह महीनों में यूपी में एक दर्जन से ज्यादा लोगों सूदखोरों के चक्कर में आत्महत्या की है (प्रतीकात्मक तस्वीर/ AI)
अपडेटेड 1 सितंबर , 2025

उत्तर प्रदेश में यह पूरे शाहजहांपुर जिले के लिए चौंकाने वाला मामला था. 26 अगस्त को यहां के एक युवा कारोबारी 36 साल के सचिन ग्रोवर ने अपनी पत्नी और चार साल के बच्चे के साथ आत्महत्या कर ली थी. बाहर से देखने में यह परिवार सामान्य-सा प्रतीत होता था, लेकिन भीतर ही भीतर वह कर्ज़ और सूदखोरी के जाल में गहराई तक धंस चुका था. 

करीबी बताते हैं कि ग्रोवर ने कारोबार बढ़ाने के लिए पहले बैंक से मदद पाने की कोशिश की, लेकिन जटिल प्रक्रिया और गारंटी की शर्तों ने उन्हें निराश कर दिया. इसके बाद उन्होंने दोस्त की मदद से स्थानीय महाजनों और सूदखोरों से पैसे उधार लिए. शुरुआत में सब कुछ संभलता नजर आया, लेकिन 30 प्रतिशत ब्याज की दर इतनी अधिक थी कि धीरे-धीरे कर्ज़ बर्फ के गोले की तरह बढ़ता गया. 

दुर्गा एन्क्लेव में रहने वाले सचिन के पड़ोसी ने ‘इंडिया टुडे’ को बताया, “महाजन लोग आए दिन घर पर धमकाते थे. परिवार के सामने अपमानित करना आम हो गया था. सचिन भाई अक्सर कहते थे कि अब रास्ता नहीं बचा.” परिवार के करीबी एक रिश्तेदार ने नाम न बताने की शर्त पर जानकारी दी, "सचिन ने कई बार पुलिस से मदद की सोची, लेकिन डर और सामाजिक शर्मिंदगी की वजह से पीछे हट जाते थे. उन्हें लगता था कि शिकायत करने से स्थिति और बिगड़ेगी.” 

कर्जदारों के चंगुल से निकल की परेशानी से सचिन टूट गए और 26 अगस्त की देर रात परिवार समेत आत्महत्या कर ली. मामले की जांच करने वाले स्थानीय पुलिस अधिकारी का कहना है कि परिवार गहरे तनाव में था और कई नोटिस, दबाव और धमकियों के बीच टूट चुका था. हालांकि पुलिस अब सूदखोरों की भूमिका की जांच कर रही है, लेकिन सवाल यह है कि प्रशासन समय रहते मदद क्यों नहीं कर पाया.

राजधानी लखनऊ के मोहल्ले अशरफाबाद में रहने वाला परिवार- शोभित रस्तोगी (45), उनकी पत्नी सुचिता और बेटी ख्याति जो कर्ज़ और सूदखोरों के दबाव से परेशान होकर अंत तक संघर्ष करते हुए टूट गया था. मोहल्ले वालों के मुताबिक शोभि‍त ने बैंक से 40-50 लाख रुपए का लोन ले रखा था. बैंक वाले रिकवरी के लिए अक्सर उनके घर आते थे. इसको लेकर शोभि‍त परेशान थे. एक दिन परेशानियों के बोझ के आगे उन्होंने हार मान ली और जहर खाकर परिवार समेत आत्महत्या कर ली. 

ये दो मामले तो केवल बानगी हैं. बीते बीते छह महीनों में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों—शाहजहांपुर, गोरखपुर, कानपुर, बनारस और बरेली- से लगभग दो दर्जन के करीब ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां छोटे कारोबारी, किसान और मजदूर सूदखोरों के जाल में फंसकर मानसिक और आर्थिक दबाव के चलते मौत के कगार पर पहुंच गए. 

बढ़ते कर्ज़ से जुड़ी आत्महत्याओं के एक परेशान करने वाले पैटर्न ने व्यापारी समुदाय को हिलाकर रख दिया है. उत्तर प्रदेश पुलिस के मुताबिक पीड़ितों ने निजी बैंकों और यहां तक कि कानूनी और नियामक ढांचों से बाहर काम करने वाले निजी ऋणदाताओं से भी ऊंची ब्याज दरों पर पैसे उधार लिए थे. ये अवैध साहूकार, जिन्हें अक्सर 'सूदखोर' कहा जाता है, पैसे वसूलने के लिए धमकियों, सार्वजनिक रूप से बदनाम करने और हिंसा का इस्तेमाल करने के लिए जाने जाते हैं.

कानून और प्रशासन का फासला

उत्तर प्रदेश में सूदखोरी पर रोक लगाने के लिए एक सख्त कानून मौजूद है- यूपी सूदखोरी निषेध अधिनियम. कागज पर यह कानून बेहद सख्त दिखता है. इसके तहत बिना लाइसेंस के कोई भी व्यक्ति पैसे उधार नहीं दे सकता. कलेक्टर से लाइसेंस लेना और सभी लेन-देन का हिसाब-किताब लिखित रूप में रखना अनिवार्य है. कानून यह भी कहता है कि ब्याज दर “उचित” और राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित सीमा के भीतर होनी चाहिए. अगर कोई महाजन धमकी, दबाव या हिंसा के जरिए कर्ज वसूलता है तो यह अपराध माना जाएगा और उसके लिए जेल और जुर्माने दोनों का प्रावधान है. 

इतना ही नहीं, कानून पीड़ित व्यक्ति को यह अधिकार भी देता है कि वह अदालत में जाकर ब्याज को माफ़ कराने या घटवाने की मांग कर सके. अदालत यह तय कर सकती है कि कौन-सी दर उचित है और कितना ब्याज वसूलना जायज है. लेकिन जमीनी हकीकत इस तस्वीर से बिल्कुल उलट है. प्रयागराज के समाजसेवी अजीत सिंह बताते हैं, “छोटे कस्बों और गांवों में ज्यादातर सूदखोर बिना किसी लाइसेंस के खुलेआम धंधा कर रहे हैं. प्रशासन के पास न तो निगरानी की ताकत है, न इच्छाशक्ति. ब्याज दरों पर भी कोई स्पष्ट कैपिंग नहीं है. यही कारण है कि सूदखोर पांच से दस प्रतिशत तक मासिक ब्याज वसूलते हैं, जो सालाना साठ से एक सौ बीस प्रतिशत तक पहुंच जाता है.” 

समस्या यहीं खत्म नहीं होती. पीड़ित व्यक्ति अगर अदालत जाना भी चाहे तो सामाजिक शर्मिंदगी, महाजनों की धमकियों और कानूनी प्रक्रिया की जटिलता उसे पीछे खींच लेती है. मुकदमे लंबे चलते हैं और आम आदमी के पास इतना पैसा और समय नहीं होता कि वह वर्षों तक अदालत के चक्कर काट सके. अजीत‍ सिंह बताते हैं, “कई मामलों में तो स्थानीय पुलिस ही महाजनों के साथ मिली होती है. शिकायत दर्ज नहीं होती, या पीड़ित परिवार पर समझौते का दबाव बनाया जाता है.” 

कानून की एक और बड़ी कमजोरी इसकी सजा और जुर्माने का ढांचा है. कई बार आरोपी को सिर्फ जुर्माना देकर छोड़ दिया जाता है. नतीजा यह होता है कि यह धंधा और मजबूत होकर फैलता जाता है. शाहजहांपुर, लखनऊ जैसे मामले इसी विफलता की पोल खोलते हैं, जहां सूदखोरों की दबंगई और प्रशासन की चुप्पी ने एक पूरे परिवार को खत्म होने पर मजबूर कर दिया.

ऑल इंडिया ज्वैलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन के उत्तर प्रदेश संयोजक विनोद माहेश्वरी के अनुसार, सूदखोर लोगों को आसान किश्तों का लालच देकर फंसाते हैं, जैसे कि अगर उधार ली गई राशि 10,000 रुपये है तो 100 रुपये प्रतिदिन (यानी मूलधन का केवल 1 फीसदी प्रतिदिन) या 1000 रुपये प्रति माह (यानी 10 फीसदी मासिक) का लालच देकर. ज़रूरतमंद लोग अक्सर वार्षिक ब्याज दर की गणना किए बिना ही किश्तें चुकाने के लिए राज़ी हो जाते हैं. 1 फीसदी दैनिक ब्याज दर के लिए वार्षिक दर बढ़कर 365 और 10 फीसदी मासिक ब्याज दर के लिए 120 फीसदी हो जाती है. 

हालांकि, नियम कहते हैं कि किश्तें मूलधन के दोगुने से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए. अगर कोई किसी भी दिन या महीने में ब्याज नहीं चुका पाता है, तो वह राशि मूलधन में जोड़ दी जाएगी और कुल राशि पर ब्याज लगाया जाएगा. कर्जदारों को सूदखोरों के जाल का पता तब चलता है जब यह किश्तें चुकाने की प्रक्रिया सालों तक चलती रहती है और मूलधन जस का तस बना रहता है. 

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने एक निष्पक्ष आचरण संहिता (Fair Practices Code) अनिवार्य कर दी है, जो बैंकों या NBFC द्वारा अनुचित उत्पीड़न, धमकियों, बेवक्त आने-जाने या अभद्र भाषा के प्रयोग पर रोक लगाती है. एजेंटों के पास पहचान पत्र होना अनिवार्य है और एक उचित शिकायत निवारण तंत्र मौजूद होना चाहिए. इन सुरक्षा उपायों के बावजूद, रेगूलेटरी सिस्टम विशेष रूप से अनियमित या अनौपचारिक ऋणदाताओं (लोन शार्क) के विरुद्ध कमज़ोर बना हुआ है, जो अक्सर RBI की निगरानी से बाहर काम करते हैं और अनैतिक दबाव बनाने के हथकंडे अपनाते हैं.

राहत देने में सरकारी योजनाएं विफल 

जनधन खाते, मुद्रा लोन और फाइनेंशियल इन्क्लूजन जैसी सरकारी योजनाएं कागजों पर छोटे व्यापारियों और गरीब तबके के लिए वरदान की तरह लगती हैं. लेकिन जब इन्हें जमीनी स्तर पर लागू करने की बारी आती है तो तस्वीर बिलकुल अलग हो जाती है. लखनऊ के कारोबारी रमेश अग्रवाल कहते हैं, “बैंक हमसे बार-बार नए दस्तावेज मांगते हैं. गारंटी और कागजी झंझट इतने हैं कि महीनों तक लोन पास नहीं होता. हमें तुरंत पैसा चाहिए होता है, और सूदखोर बिना पूछताछ के उसी दिन कैश दे देता है.” 

जनधन योजना के तहत करोड़ों खाते खोले गए, लेकिन उनमें से एक बड़ी संख्या अभी भी शून्य बैलेंस में पड़ी है. बैंक इन खातों को देखकर अक्सर उन्हें ‘कमज़ोर ग्राहक’ मानते हैं. छोटे व्यापारियों का आरोप है कि उन्हें इस आधार पर क्रेडिट तक आसानी से नहीं मिलता. गोंडा जिले की शांति देवी, जो कपड़े का छोटा धंधा चलाती हैं, बताती हैं, “मैंने मुद्रा लोन के लिए तीन बार आवेदन दिया. हर बार बैंक वाले कहते- फाइल पूरी नहीं है. आखिर में थककर मैंने 5 फीसदी महीने के हिसाब से गांव के महाजन से कर्ज लिया. अब ब्याज ही चुकाते-चुकाते कारोबार डूब गया.” 

मुद्रा लोन योजना का दावा है कि बिना गारंटी 10 लाख तक का कर्ज मिल सकता है. मगर हकीकत में छोटे कारोबारियों को अक्सर 10-20 हजार से ज्यादा मंजूर ही नहीं होता. इतना पैसा किसी व्यापार को खड़ा करने के लिए नाकाफी है. लखनऊ में एक राष्ट्रीयकृत बैंक के अधिकारी मानते हैं कि समस्या सिस्टम में है, “हम पर डिफॉल्ट का दबाव बहुत है. इसलिए हम बिना कागजात और गारंटी के बड़े लोन पास करने से डरते हैं. ऊपर से जो टारगेट दिए जाते हैं, उनमें अक्सर ‘गुणवत्ता’ की जगह ‘संख्या’ ज्यादा अहम हो जाती है.” फाइनेंशियल इन्क्लूजन का दूसरा संकट है ‘लास्ट माइल डिलीवरी’. गांवों और कस्बों में बैंक शाखाएं कम हैं और जो हैं भी, वहां का रवैया आम ग्राहकों को हतोत्साहित करता है. वित्तीय साक्षरता की कमी इसे और बढ़ाती है. आगरा के रिक्शा चालक हरिनारायण का अनुभव इसी का उदाहरण है, “जनधन खाता खुल गया, लेकिन न तो कभी बैंक ने समझाया, न किसी ने बताया कि इससे लोन कैसे मिलेगा. जब जरूरत पड़ी तो सीधे सूदखोर के पास गया, क्योंकि वहीं तुरंत पैसा मिलता है.” यानी, बैंकिंग योजनाओं और सूदखोरी की जमीनी हकीकत के बीच का यह अंतर ही यूपी जैसे राज्यों में सबसे बड़ी त्रासदी है. लोग जानते हैं कि महाजनों का पैसा जाल है, लेकिन जब सरकार और बैंक उनकी तत्काल जरूरत पूरी नहीं करते, तो उनके पास वही आखिरी सहारा रह जाता है. 

सामाजिक दबाव और चुप्पी 

सूदखोरी केवल आर्थिक समस्या नहीं है, यह मानसिक दबाव भी पैदा करती है. परिवार अपमान और तानों के बीच दब जाता है. छोटे शहरों और गांवों में मानसिक स्वास्थ्य के लिए हेल्पलाइन या काउंसलिंग सुविधाएं न के बराबर हैं. लखनऊ में प्रैक्टिस करने वाले मनोचिकित्सक डॉ. देवाशीष शुक्ल बताते हैं, “कर्ज़दार अक्सर सामाजिक शर्मिंदगी और मानसिक तनाव से टूट जाते हैं. लोग मदद मांगने से डरते हैं. हमें ग्रामीण स्तर पर जागरूकता, काउंसलिंग और हेल्पलाइन नेटवर्क बढ़ाना होगा.” 

सूदखोरी पर अक्सर राजनीति और समाज की चुप्पी छाई रहती है. चुनावी भाषणों में किसान कर्ज़माफी और ऋण राहत की बातें होती हैं, लेकिन वास्तविक सुरक्षा और राहत कार्यक्रम जमीनी स्तर पर नहीं पहुंच पाते. सामाजिक कार्यकर्ता अजीत सिंह कहते हैं, “सूदखोरों के खिलाफ आवाज उठाना मुश्किल है. समाज कर्ज़दार को दोषी मानता है. अगर सामाजिक दृष्टिकोण नहीं बदला, तो कानून और योजनाएं भी पूरी तरह प्रभावी नहीं हो सकतीं.” जानकार बताते हैं कि सूदखोरी पर लगाम का सबसे कारगर समाधान है औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था को आसान और भरोसेमंद बनाना. छोटे कारोबारियों और आम नागरिकों के लिए तत्काल और बिना जटिल प्रक्रिया वाले माइक्रो-क्रेडिट सिस्टम को मजबूत करना होगा. मुद्रा लोन और जनधन जैसी योजनाओं को कागज से निकालकर जमीन पर सरल बनाया जाए, ताकि जरूरत पड़ते ही व्यक्ति को कानूनी तरीके से पैसा मिल सके. 

इसके साथ ही फाइनेंशियल साक्षरता अभियान चलाना जरूरी है, जिससे लोग ब्याज दरों और कानूनी विकल्पों को समझ सकें. पुलिस और प्रशासन को सूदखोरी निषेध अधिनियम का कड़ाई से पालन कराना होगा और शिकायत दर्ज होते ही त्वरित कार्रवाई करनी होगी. वहीं, सेल्फ हेल्प ग्रुप और कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसायटी जैसे मॉडल को बढ़ावा देकर सामुदायिक स्तर पर वैकल्पिक वित्तीय ढांचा खड़ा किया जा सकता है. जब तक यह सुरक्षित और सुलभ विकल्प नहीं बनेंगे, तब तक सूदखोरों का जाल टूटना मुश्किल रहेगा.

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