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खाकी और रुतबे का खेल : यूपी में फर्जी IAS-IPS अफसर कैसे लोगों को ठग रहे?

कानपुर से गोरखपुर और लखनऊ तक फर्जी IAS–IPS बनकर ठगी और रंगदारी के बढ़ते मामलों ने दिखाया है कि लाल बत्ती और वर्दी के नाम पर भरोसे की लूट कैसे महीनों तक चलती रहती है

AI जेनरेटेड (सांकेतिक तस्वीर).
AI जेनरेटेड (सांकेतिक तस्वीर).
अपडेटेड 23 जनवरी , 2026

उत्तर प्रदेश में फर्जी IAS और IPS अफसरों के मामले अब अपवाद नहीं रहे. बीते कुछ महीनों में सामने आए मामलों को देखें तो साफ है कि यह सिर्फ ठगी नहीं, बल्कि सत्ता, रुतबे और सिस्टम के भरोसे पर हमला है. 

कोई खुद को भावी जिलाधिकारी बताकर शादी के नाम पर लाखों हड़प रहा है, कोई वर्दी पहनकर रंगदारी मांग रहा है, तो कोई हूटर लगी गाड़ियों और गनरों के साथ घूमकर करोड़ों की ठगी कर रहा है. इन मामलों में सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं कि ठगी हुई, बल्कि यह है कि इतने बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा लंबे समय तक कैसे चलता रहा.

शादी, पोस्टिंग और 71 लाख की ठगी

कानपुर का मामला इस ट्रेंड की भयावह तस्वीर पेश करता है. चकेरी निवासी नितेश पांडे ने खुद को संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) परीक्षा पास, भावी IAS अधिकारी बताकर एक युवती और उसके परिवार को छह महीने तक अपने झांसे में रखा. कभी बैंक कर्मचारी, कभी डॉक्टर और अंत में IAS. फर्जी नियुक्ति पत्र, सरकारी ईमेल और डीएम पोस्टिंग के दावे के सहारे उसने शादी का भरोसा जीता. नतीजा, युवती ने नकद, गहने और बचत मिलाकर 71 लाख रुपये गंवा दिए. जब सच्चाई सामने आने लगी तो आरोपी गायब हो गया और धमकियां देने लगा. पुलिस अब 20 जनवरी को बीएनएस की धाराओं में केस दर्ज कर जांच कर रही है, लेकिन सवाल यह है कि इतने महीनों तक यह नाटक बिना किसी सत्यापन के कैसे चलता रहा.

वर्दी का खौफ और रंगदारी

गोरखपुर के पीपीगंज इलाके में सामने आया मामला बताता है कि वर्दी आज भी कितना बड़ा हथियार है. शनि वर्मा नाम के युवक ने खुद को IPS अधिकारी बताकर कपड़ा व्यापारी से दो लाख रुपये की रंगदारी मांगी. वर्दी पहनकर घर पहुंचा, फर्जी मुकदमे और एनकाउंटर की धमकी दी. 

व्यापारी डर गया, लेकिन बाद में सच्चाई सामने आई और 17 जनवरी को आरोपी जेल पहुंचा. पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, ऐसे मामलों में डर इतना हावी होता है कि पीड़ित तुरंत शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते.

फर्जी IAS ‘गौरव कुमार’ और करोड़ों का खेल

गोरखपुर में 10 दिसंबर, 2025 को पकड़ा गया ललित किशोर उर्फ फर्जी IAS गौरव कुमार इस नेटवर्क का सबसे रंगीन लेकिन खतरनाक चेहरा है. लाल बत्ती लगी गाड़ियां, 10 गनर, स्टेनो, ऑफिस, नेम प्लेट, हूटर और अखबारों की कटिंग. नौकरी और टेंडर दिलाने के नाम पर उसने यूपी, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश में करोड़ों की ठगी की. 

पुलिस जांच में सामने आया कि वह AI से तैयार फर्जी अनुमोदन पत्र और सरकारी फाइलें दिखाकर लोगों को भ्रमित करता था. एक पीड़ित के अनुसार, सिर्फ एक डील में उसने 1.70 करोड़ रुपये ट्रांसफर कराए और नकद, गाड़ियां अलग से लीं. हैरानी की बात यह है कि स्कूल निरीक्षण से लेकर सरकारी आयोजनों तक में वह आसानी से घुस जाता था.

80 करोड़ की ठगी और 150 पीड़ित

लखनऊ में 15 अक्टूबर 2025 को पकड़ा गया झारखंड निवासी विवेक मिश्रा उर्फ विवेक आनंद मिश्रा इस फर्जीवाड़े का ‘कॉरपोरेट मॉडल’ है. खुद को गुजरात कैडर का आइएए अधिकारी बताकर उसने करीब 150 लोगों से 80 करोड़ रुपये ठग लिए.

फर्जी नियुक्ति पत्र, सोशल मीडिया पर नकली प्रोफाइल और प्रभावशाली रिश्तों की कहानी उसके हथियार थे. खासतौर पर सीधे-साधे परिवारों की युवतियों को वह शादी और नौकरी के झांसे में लेता था. मामला 2019 का है, लेकिन गिरफ्तारी 2024-25 में जाकर हुई, जो सिस्टम की सुस्ती को उजागर करता है.

लग्जरी गाड़ियां और नकली पहचान

सितंबर 2025 में लखनऊ के वजीरगंज इलाके में पकड़ा गया सौरभ त्रिपाठी खुद को IAS बताकर छह लग्जरी गाड़ियों में घूम रहा था. फर्जी पहचान पत्र, सचिवालय पास, एनआईसी की नकली ईमेल आईडी और लाल-नीली बत्ती. पुलिस जांच में पता चला कि वह कई राज्यों में इसी तरीके से ठगी कर चुका है. जब उसे रोका गया तो उसने वरिष्ठ अधिकारियों के नाम लेकर दबाव बनाने की कोशिश की. यह वही पैटर्न है जो लगभग हर केस में दिखता है.

भरोसा, दिखावा और डर

इन सभी मामलों को जोड़कर देखें तो फर्जी अफसरों की कार्यप्रणाली लगभग एक जैसी है. पहला कदम, पहचान बनाना. किसी रिश्तेदार, परिचित या सोशल सर्कल के जरिए एंट्री. दूसरा, भरोसा जीतना. फर्जी दस्तावेज, सरकारी ईमेल, वर्दी, गाड़ी, हूटर और प्रभावशाली भाषा. तीसरा, दबाव या लालच. नौकरी, टेंडर, पोस्टिंग, शादी या कार्रवाई से बचाने का वादा. चौथा, धमकी. शक होने पर कानूनी कार्रवाई, फर्जी केस या निजी तस्वीरों की धमकी. एक वरिष्ठ IPS अधिकारी बताते हैं, “ये लोग सिस्टम की धीमी जांच प्रक्रिया और आम लोगों की अफसरों के प्रति स्वाभाविक श्रद्धा का फायदा उठाते हैं. ज्यादातर पीड़ित सत्यापन कराने की हिम्मत ही नहीं जुटाते.”

ये जल्दी पकड़ में क्यों नहीं आते, विशेषज्ञ मानते हैं कि इसकी तीन बड़ी वजहें हैं. पहली, त्वरित सत्यापन की कमी. आम नागरिक के लिए यह जांचना आसान नहीं कि सामने वाला वाकई IAS या IPS है या नहीं. दूसरी, सामाजिक दबाव. शादी या नौकरी जैसे मामलों में परिवार बदनामी के डर से चुप रहता है. तीसरी, तकनीक का दुरुपयोग. फर्जी ईमेल, AI से बने दस्तावेज और सोशल मीडिया प्रोफाइल जांच को मुश्किल बना देते हैं. एक साइबर विशेषज्ञ के मुताबिक, “आज फर्जी सरकारी ईमेल और लेटरहेड बनाना बेहद आसान हो गया है. अगर संस्थागत स्तर पर डिजिटल वेरिफिकेशन मजबूत न हो तो ऐसे मामले बढ़ते रहेंगे.”

सरकारी कवायद और निगरानी

यूपी पुलिस और प्रशासन ने हाल के महीनों में इस खतरे को गंभीरता से लिया है. CB-CID और EOW को ऐसे मामलों की जांच में लगाया गया है. पुलिस मुख्यालय ने जिलों को निर्देश दिए हैं कि किसी भी व्यक्ति के IAS या IPS होने के दावे पर तुरंत कैडर और पोस्टिंग का सत्यापन किया जाए. गृह विभाग स्तर पर एक केंद्रीकृत डेटाबेस को मजबूत करने की बात भी चल रही है, ताकि जिलों को तुरंत जानकारी मिल सके. एक वरिष्ठ गृह अधिकारी कहते हैं, “हम यह भी देख रहे हैं कि आम लोगों के लिए एक आसान वेरिफिकेशन मैकेनिज्म बने, जिससे वे बिना डर किसी अफसर की पहचान जांच सकें.”

फर्जी IAS और IPS का यह जाल सिर्फ कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का सवाल है. जब तक अफसरों के नाम और रुतबे को बिना सवाल किए सच मानने की प्रवृत्ति रहेगी, ऐसे ठग मौके ढूंढते रहेंगे. सख्त जांच, तेज सत्यापन और सार्वजनिक जागरूकता ही इसका तोड़ है. वरना हर कुछ महीनों में कोई नया ‘डीएम साहब’ या ‘IPS साहब’ भरोसे की नई कहानी गढ़ता रहेगा, और किसी न किसी की जिंदगी उसकी कीमत चुकाती रहेगी.

बीते दो वर्षों में पकड़े गए जालसाज :

24 जुलाई 2019 (जांच तेज, गिरफ्तारी 2024-25) : विवेक मिश्रा, लखनऊ, फर्जी गुजरात कैडर IAS-IPS, 80 करोड़ की ठगी।
10 दिसंबर 2024 : ललित किशोर उर्फ गौरव कुमार, गोरखपुर, फर्जी IAS, करोड़ों की ठगी।
15 अक्टूबर 2025 : सौरभ त्रिपाठी, लखनऊ, फर्जी IAS, लग्जरी गाड़ियां और नकली दस्तावेज।
17 जनवरी 2026 : शनि वर्मा, गोरखपुर, फर्जी IPS, रंगदारी का मामला।
20 जनवरी 2026 : नितेश पांडे, कानपुर, फर्जी IAS, शादी के नाम पर 71 लाख की ठगी।

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