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आनंद बोस का जाना, आरएन रवि का आना : बंगाल में नए 'पॉलिटिकल ड्रामा' का मंच सजा

TMC ने इस अचानक हुए बदलाव पर सवाल उठाए हैं और BJP के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर चुनाव से ठीक पहले बंगाल में राजनीतिक समीकरण अपने मुताबिक बदलने का आरोप लगाया है

पश्चिम बंगाल के नए राज्यपाल आरएन रवि (फाइल फोटो)
पश्चिम बंगाल के नए राज्यपाल आरएन रवि (फाइल फोटो)
अपडेटेड 9 मार्च , 2026

कोलकाता के 'लोक भवन' में अचानक हुए एक बदलाव ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पश्चिम बंगाल में एक नए सियासी टकराव को जन्म दे दिया है. गवर्नर सी.वी. आनंद बोस ने 5 मार्च को इस्तीफा दे दिया, और केंद्र सरकार ने तुरंत उनकी जगह तमिलनाडु के पूर्व गवर्नर आर.एन. रवि की नियुक्ति का ऐलान कर दिया.

इस घटनाक्रम पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है, जो इस कदम को चुनाव से पहले की एक पैंतरेबाज़ी मान रही है. आनंद बोस ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंप दिया, जिससे नवंबर 2022 में शुरू हुआ उनका कार्यकाल अचानक खत्म हो गया.

वैसे बोस का कार्यकाल 2027 के आखिर तक चलना था. अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि जब बोस ने अपना इस्तीफा भेजा, तब वे नई दिल्ली में थे, हालांकि सार्वजनिक तौर पर इसके पीछे की कोई वजह नहीं बताई गई है.

नए गवर्नर आर.एन. रवि एक पूर्व IPS अफसर हैं, जो डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर और बाद में तमिलनाडु के गवर्नर के तौर पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उनकी यह नियुक्ति देशभर में एकसाथ राज्यपालों के बदलाव की प्रक्रिया का हिस्सा थी.

यह बदलाव तुरंत ही बंगाल में एक टकराव का बिंदु बन गया. ममता ने दावा किया कि इस नियुक्ति को लेकर उनसे कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया. सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में, उन्होंने बोस के इस्तीफे और रवि के चुनाव, दोनों पर हैरानी जताई.

उन्होंने लिखा, "मैं पश्चिम बंगाल के गवर्नर श्री सी.वी. आनंद बोस के इस्तीफे की अचानक आई खबर से हैरान और बेहद चिंतित हूं. मुझे इस वक्त उनके इस्तीफे के पीछे की वजहें नहीं पता हैं. हालांकि, मौजूदा हालात को देखते हुए, मुझे कोई हैरानी नहीं होगी अगर आने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले कुछ खास राजनीतिक हितों को साधने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री की तरफ से गवर्नर पर कोई दबाव डाला गया हो."

ममता ने आगे लिखा, "केंद्रीय गृह मंत्री ने मुझे अभी बताया है कि श्री आर.एन. रवि को पश्चिम बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया जा रहा है. उन्होंने इस बारे में स्थापित परंपरा के मुताबिक मुझसे कभी सलाह नहीं ली. ऐसे कदम भारत के संविधान की भावना को कमजोर करते हैं और हमारे संघीय ढांचे की नींव पर चोट करते हैं. केंद्र को 'कोऑपरेटिव फेडरलिज्म' के सिद्धांतों का सम्मान करना चाहिए और ऐसे एकतरफा फैसले लेने से बचना चाहिए जो लोकतांत्रिक परंपराओं और राज्यों के सम्मान को ठेस पहुंचाते हों."

ममता का यह बयान TMC सरकार और BJP के नेतृत्व वाले केंद्र के बीच टकराव के एक नए दौर की शुरुआत का सिग्नल है. इस घटनाक्रम की टाइमिंग ने सियासी टेंशन को और बढ़ा दिया है. बंगाल में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर पहले ही भारी राजनीति हो रही है. इस प्रोसेस के बाद TMC ने आरोप लगाया है कि असली वोटर्स को भारी संख्या में वोटर लिस्ट से हटाया जा रहा है. पार्टी का मानना है कि यह पूरी कवायद राज्य के चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकती है.

TMC के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने तंज कसते हुए कहा, "गवर्नर की नियुक्ति में राज्य सरकारों को शामिल किया जाना चाहिए और 'सरकारिया कमीशन' की सिफारिश के मुताबिक पैनल बनाए जाने चाहिए. केंद्र-राज्य संबंधों पर बने 'पुंछी कमीशन' ने भी सिफारिश की थी कि गवर्नर की नियुक्ति संबंधित राज्य से सलाह लेने के बाद ही होनी चाहिए. लेकिन सुनता कौन है?"

इस गर्म माहौल में, आर.एन. रवि की नियुक्ति ने सत्ताधारी पार्टी के भीतर शक को और गहरा कर दिया है. TMC नेताओं का कहना है कि वे आने वाले महीनों में केंद्र और गवर्नर ऑफिस के साथ होने वाले संभावित संवैधानिक टकराव के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं.

दबी जुबान में पार्टी के कई नेता कहते हैं कि जैसे-जैसे चुनाव करीब आ रहे हैं, संगठन केंद्र और लोक भवन की तरफ से आने वाले एक बड़े "संवैधानिक झटके" के लिए कमर कस रहा है. उन्हें लगता है कि गवर्नर ऑफिस संस्थागत दबाव का एक बड़ा केंद्र बन सकता है.

रवि के अपने पुराने रिकॉर्ड ने भी इस विवाद को हवा दी है. तमिलनाडु के गवर्नर के तौर पर, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) सरकार के साथ उनके लगातार मतभेद रहे थे. विधायी मामलों, राज्य की स्वायत्तता और गवर्नेंस व इतिहास से जुड़े मुद्दों पर गवर्नर की सार्वजनिक टिप्पणियों को लेकर खूब विवाद हुए थे. यही एक बड़ी वजह है कि बंगाल में रवि के कार्यकाल पर सबकी पैनी नजर रहेगी.

हालांकि, बंगाल BJP ने इस कदम का बड़े जोश के साथ स्वागत किया है. पार्टी नेताओं का कहना है कि रवि एक बेहद अनुभवी प्रशासक हैं जो संविधान को समझते हैं और यह पक्का करेंगे कि राज्य में गवर्नेंस और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं सही तरीके से काम करें. उनका तर्क है कि यह बदलाव एक बहुत ही अहम मोड़ पर हुआ है क्योंकि बंगाल विधानसभा चुनावों की तरफ बढ़ रहा है.

इस नियुक्ति के बारे में पूछे जाने पर, BJP के एक सीनियर विधायक ने सिर्फ एक शब्द में जवाब दिया - "गुड". यह बोस की विदाई पर BJP की राहत का इशारा था, क्योंकि ऐसा माना जा रहा था कि वे 'TMC सरकार को घेरने के लिए पर्याप्त काम नहीं कर रहे थे'.

BJP के लिए, रवि की नियुक्ति उस बड़े संदेश को मजबूत करती है कि बंगाल की संस्थाओं को सख्त 'संवैधानिक निगरानी' की जरूरत है. पार्टी ने ममता सरकार पर बार-बार भ्रष्टाचार, प्रशासनिक नाकामियों और सरकारी मशीनरी के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया है.

TMC इस घटनाक्रम को केंद्र की एक बड़ी राजनीतिक रणनीति के हिस्से के तौर पर पेश कर रही है. पार्टी नेताओं का तर्क है कि चुनाव से ठीक पहले गवर्नर को बदलना केंद्र की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

पिछले एक दशक में, विपक्ष शासित राज्यों में गवर्नर्स की भूमिका अक्सर बहस का मुद्दा बनी रही है. कई राज्य सरकारों ने आरोप लगाया है कि गवर्नर ऐसे काम करते हैं जिससे केंद्र सरकार को फायदा हो, जबकि केंद्र का तर्क रहा है कि गवर्नर सिर्फ अपनी संवैधानिक ड्यूटी पूरी कर रहे हैं.

बंगाल में, गवर्नर और ममता सरकार के बीच रिश्ते अक्सर तनावपूर्ण रहे हैं. बोस से पहले रहे जगदीप धनखड़ के प्रशासनिक मामलों, विधायी प्रक्रियाओं और राज्य के विश्वविद्यालयों के कामकाज को लेकर TMC सरकार के साथ कई मतभेद थे. अब जबकि रवि कार्यभार संभालने जा रहे हैं, राजनीतिक जानकारों को लगता है कि यह टकराव और तेज हो सकता है.

ममता के लिए, यह मुद्दा गहरा राजनीतिक महत्व रखता है. गवर्नर की नियुक्ति को SIR विवाद से जोड़कर, वह इस मौके को बंगाल और केंद्र के बीच एक बड़े टकराव के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही हैं.

वहीं BJP के लिए, यह बदलाव इशारा करता है कि विधानसभा चुनाव करीब आते ही केंद्र सरकार बंगाल पर बारीकी से ध्यान दे रही है. पार्टी राज्य में अपना संगठनात्मक दायरा बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रही है और आने वाले चुनावों को एक बड़े मौके के तौर पर देख रही है.

इसलिए, बोस के अचानक इस्तीफे और रवि की एंट्री ने सिर्फ लोक भवन का चेहरा बदलने से कहीं ज्यादा काम किया है. इस कदम ने बंगाल में चल रहे राजनीतिक मुकाबले में एक नया चैप्टर खोल दिया है. जैसे-जैसे चुनाव करीब आएंगे, गवर्नर ऑफिस, राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच के समीकरण राज्य के 'पॉलिटिकल थिएटर' में और भी ज्यादा अहम होते जाएंगे.

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