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अपराध की बहस में यादव क्यों बनाए जा रहे विलेन?

BJP की अगुवाई वाले NDA के कुछ नेताओं ने पिछले दिनों इशारों-इशारों में यादवों को अपराध से जोड़ने की कोशिश की. जानकार इसे जातिगत ध्रुवीकरण की कोशिश बता रहे

जीतनराम मांझी- फाइल फोटो
जीतनराम मांझी के एक बयान ने इस पूरी बहस को हवा दी है (फाइल फोटो)
अपडेटेड 26 मई , 2026

इन दिनों बिहार में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी का एक बयान चर्चा में है. उन्होंने सवाल किया है कि क्यों बिहार की जेलों में 40 फीसदी कैदी एक ही जाति के हैं. उन्होंने कई तथ्यों के साथ यह साबित करने का प्रयास किया है कि बिहार की एक जाति ऐसी है, जो अपराध, जमीन कब्जे और दलित उत्पीड़न के मामलों में शामिल रही है.

हालांकि ऐसा बयान जारी करने वाले वे इकलौते राजनेता नहीं हैं. एक JDU विधायक अजय कुशवाहा कहते हैं, “पूरे क्रिमिनलॉजी के 50 परसेंट लोग तो वही हैं. मारे जाएंगे तो चिल्लाएंगे ही, विधवा विलाप करेंगे ही.” ये दोनों नेता अपनी जुबान से किसी खास जाति का नाम नहीं लेते मगर इशारों-इशारों में समझा देते हैं कि वे यादवों के बारे में बात कर रहे हैं.

तो क्या अब बिहार की राजनीति में यादवों को नया विलेन बनाने की मुहिम शुरू हो गई है?

यह सवाल इसलिए भी है कि इन दोनों बयानों के बाद बिहार में सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक यह बहस जोर-शोर से चलने लगी है कि यादव जाति का चरित्र अपराधियों वाला है या नहीं. ऐसा मानने वाले कई सही-गलत तथ्यों और उदाहरणों से इसे साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं, इसे गलत मानने वाले कह रहे हैं कि अपराधी हर जाति में होते हैं. वे युद्ध के दौरान यादव जाति की अहीर रेजिमेंट की वीरता की कहानियां साझा कर रहे हैं और यह भी बता रहे हैं कि जातिवादी दंगों के दौरान कैसे इस रेजिमेंट ने आगे बढ़कर दलितों की रक्षा की थी.  मगर मूल सवाल यह है कि आखिर क्यों यादवों को नया विलेन बताया जा रहा है? इसके क्या राजनीतिक मायने हैं?

इन सबकी शुरुआत 19 मई को तब हुई जब नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव बिहार में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध के मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे. उन्होंने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में 15 अप्रैल से 15 मई के बीच राज्य में महिलाओं के खिलाफ होने वाले हिंसक अपराधों की लंबी सूची गिनाई. फिर कहा, “हम सम्राट चौधरी जी से जानना चाहते हैं कि वे जो विशेष जाति वालों का एनकाउंटर करवा रहे हैं, महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वालों का एनकाउंटर कब करवाएंगे? जिसके साथ दुष्कर्म हुआ, उसकी भी जाति देखें और दुष्कर्म करने वालों की जाति भी देखें?”

तेजस्वी यादव की इस टिप्पणी के पीछे एक खास संदर्भ था. दरअसल पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया में बिहार को लेकर चर्चा चल रही थी कि राज्य सरकार चुन-चुनकर यादव अपराधियों का ही एनकाउंटर करवा रही है. इसके पीछे खास तौर पर सुल्तानगंज के एक हत्याकांड का उदाहरण था, जिसमें एक यादव दबंग व्यक्ति को मुख्य अपराधी माना जा रहा था जो बाद में पुलिस एनकाउंटर में मारा गया. मगर इस धारणा के पीछे कोई सटीक आंकड़ा नहीं था. बाद में JDU के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताया कि यह धारणा बिल्कुल गलत है. उन्होंने कहा, “20 नवंबर, 2025 के बाद छह अपराधी मारे गए. एक ब्राह्मण, एक भूमिहार, एक कुशवाहा, एक मालाकार थे. हां, दो यादव भी थे. अपराधियों की कोई जाति नहीं होती. जो पुलिस पर गोली चलाएंगे, वे मारे जाएंगे.”

तेजस्वी यादव के इस बयान पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी तंज कसते हुए जवाब दिया, “अब हम पुलिस से कहेंगे कि वह पहले जाति पूछ ले फिर अपराधियों पर गोली चलाए?” मगर BJP की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के दूसरे नेताओं ने इन तथ्यों पर ध्यान नहीं दिया.

मीनापुर के JDU विधायक अजय कुशवाहा ने तेजस्वी यादव की इस टिप्पणी की आलोचना करते हुए जो कहा, वह हम स्टोरी के पहले हिस्से में बता चुके हैं. केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी तो इस मामले में आगे बढ़कर विस्तार से आंकड़े बताने लगे.

22 मई को X पर एक पोस्ट में उन्होंने लिखा, “मैं मानता हूं कि अपराधियों की कोई जाति नहीं होती. पर RJD वालों से मेरे कुछ सवाल हैं. बिहार की हर जेल में एक ही जाति के 40 फीसदी बंदी क्यों हैं? क्यों दलितों को सरकार से मिली पर्चे वाली लगभग 50 फीसदी से अधिक जमीन पर एक ही जाति के लोगों ने जबरदस्ती कब्जा किया हुआ है? क्यों दलित अत्याचार कानून के तहत एक ही जाति के लोगों पर लगभग 50 फीसदी या उससे अधिक मामले दर्ज हैं? क्यों मुसलमानों के कब्रिस्तान की जो जमीन कब्जा गई है, उस जमीन के लगभग 60 फीसदी हिस्से पर एक ही जाति का अवैध कब्जा है? क्यों वक्फ की कब्जा हुई जमीन के लगभग 65 फीसदी हिस्से पर एक ही जाति का कब्जा है? क्यों दंगों में एक ही जाति के लगभग 40 फीसदी लोगों पर मुसलमानों के ऊपर अत्याचार का आरोप लगाकर केस दर्ज होता है?”

जाहिर है, बात 'अपराधियों की कोई जाति नहीं होती' से आगे बढ़कर 'यादव जाति बिहार की सबसे बड़ी अपराधी जाति है' का तथ्य साबित करने तक पहुंच गई. ऐसे में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी AI समिट में इशारों-इशारों में कहा, “पटना में करीब चार हजार कैमरे लगाए गए हैं. अगर AI से कहिए कि हरे गमछे वाले को ढूंढ़ना है तो उसे कितना वक्त लगेगा उनको ढूंढ़ने में? वह तुरंत खोज लेगा.” हालांकि हरे गमछे से उनका आशय किसी जाति विशेष से नहीं रहा होगा मगर RJD कार्यकर्ता लंबे समय तक हरा गमछा कंधे पर रखते रहे हैं और यादव जाति के लोग RJD के कोर कार्यकर्ता माने जाते रहे हैं. इसलिए ऐसा माना गया कि यह इशारा भी यादव जाति की तरफ ही था.

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर क्यों बिहार की राजनीति में जानबूझकर यादव जाति को विलेन साबित करने की कोशिश की जा रही है? दरअसल, बिहार की हालिया जाति आधारित गणना के मुताबिक राज्य में यादव जाति की आबादी 14 फीसदी है. इनमें से बड़ा हिस्सा, लगभग 80 फीसदी, लोकसभा और विधानसभा चुनावों में RJD को वोट करता रहा है.

BJP ने कई बार कोशिश की कि यादव जाति के मतदाता उसके पाले में आएं. इसके लिए पार्टी ने नंद किशोर यादव और नित्यानंद राय जैसे यादव नेताओं को पार्टी की कमान सौंपी. रामकृपाल यादव जैसे RJD के बड़े नेता को अपनी पार्टी में जगह देकर आगे बढ़ाया. भूपेंद्र यादव जैसे नेता को बिहार का प्रभारी बनाया. मगर RJD के पाले से यादवों को अपने पक्ष में करने में पार्टी सफल नहीं हो पाई. 

शायद इसी वजह से इनमें से दो बड़े यादव नेताओं का कार्यक्षेत्र अब बिहार नहीं है. नंद किशोर यादव को राज्यपाल बनाकर नागालैंड भेजा गया है और नित्यानंद राय केंद्र में मंत्री हैं. तमाम कयासों के बावजूद पार्टी ने उन्हें बिहार का मुख्यमंत्री नहीं बनाया. रामकृपाल यादव भी कुछ समय पहले तक केंद्र की राजनीति में ही सक्रिय थे. पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें बिहार बुलाया गया. उन्हें मंत्री पद जरूर दिया गया है, मगर वे पार्टी की राजनीति के कोर में नहीं हैं. तो क्या पार्टी ने मान लिया है कि अब यादवों को अपने पाले में करना मुश्किल है? ऐसे में क्यों न उन्हें विलेन साबित कर अलग तरह का ध्रुवीकरण किया जाए?

इस सवाल पर टाटा सामाजिक संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुषेंद्र कहते हैं, “बिहार में यादव और RJD का एक तरह का आइडेंटिफिकेशन हो गया है. RJD यादवों की पार्टी समझी जाती है. निश्चित तौर पर जब BJP उन्हें अपने पाले में लाने में विफल रही तो वह अब नए तरह का ध्रुवीकरण कर रही है.  BJP यह समझ रही है कि भले 14 फीसदी यादव और 18 फीसदी मुसलमान RJD के पाले में रहें मगर इससे तब तक कोई फर्क नहीं पड़ेगा जब तक दूसरी जातियां RJD के साथ न जाएं. इसलिए राज्य की दूसरी जातियों, जिनमें सवर्ण, अतिपिछड़े और दलित शामिल हैं, उनके मन में NDA नेता यादव जातियों के खिलाफ नकारात्मक भाव उत्पन्न करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि बाकी मतदाता पूरी ताकत के साथ उनके साथ बने रहें.”

पुषेंद्र आगे यह भी कहते हैं, “जैसा कि आंकड़ों से भी जाहिर है, इस बात में कोई सच्चाई नहीं है कि सिर्फ यादव जाति के लोग ही अपराधी हैं. आंकड़ों को अगर छोड़ भी दें तो हमने पिछले अनुभवों से जाना है कि 90 के दशक से पहले बिहार में जितने बड़े अपराधी या दबंग थे, उनमें ज्यादातर सवर्ण जातियों के होते थे. उनमें ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत जातियों का वर्चस्व था. उस वक्त पिछड़ी और दलित जातियों के जो लोग अपराधी गिरोहों में होते थे, वे कारिंदे की भूमिका में रहते थे. 1990 के बाद जब लालू प्रसाद यादव सत्ता में आए, तो खासकर यादव और बिंद जाति के अपराधी इन गिरोहों से स्वतंत्र होने लगे. उन्हें उम्मीद थी कि नया निजाम उनके पक्ष में रहेगा. इसके बाद भी इन जातियों का प्रभुत्व कभी इतना नहीं रहा कि अपराध की दुनिया पर उनका नियंत्रण हो. कुछ गिने-चुने चेहरे ही अब भी दिखते हैं. हाल ही में हमने सीवान में शराब तस्करी से जुड़े लोगों का अध्ययन किया, तो पता चला कि सबसे अधिक राजपूत जाति के युवक इस काम से जुड़े हैं. ऐसे में यह धारणा भी तथ्यों पर आधारित नहीं है.”

जानकार बताते हैं कि यादवों की नकारात्मक छवि बनाने से NDA को दो तरह के फायदे हो सकते हैं. पहला, यादवों को ओबीसी राजनीति से अलग-थलग कर बिहार में नॉन-यादव ओबीसी ध्रुवीकरण किया जा सकता है. दूसरा, बढ़ते अपराध की बहस को दूसरी दिशा में मोड़कर लोगों का ध्यान बंटाया जा सकता है. साथ ही, इन अपराधों की जिम्मेदारी भी RJD पर डाली जा सकती है. मगर इन सबका बिहार के समाज पर क्या असर पड़ने वाला है?

पटना साइंस कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर अखिलेश कुमार इस चलन पर चिंता जताते हैं. वे कहते हैं, “हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. नीतीश कुमार ने भी अपने तरीके से बिहार की पिछड़ी और दलित जातियों को यह समझाने की कोशिश की थी कि यादव जाति के लोग ही उनके शोषक हैं. मगर नीतीश कुमार ने यह सब खुलेआम नहीं किया और उन्होंने कभी यादवों को सार्वजनिक रूप से विलेन बनाने की कोशिश नहीं की थी. मगर अब जो हो रहा है, वह समाज में उसी तरह विद्वेष फैलाने वाला है, जैसा मुसलमानों को इस देश की हर समस्या की जड़ बताकर किया गया. इससे तनाव पैदा होगा और यह तनाव हिंसक भी हो सकता है. सरकार को अब भी इस तरह के दुष्प्रचार पर रोक लगानी चाहिए.”

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