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कांग्रेस में हारे हुए नेताओं को इनाम देने का चलन टूटता क्यों नहीं?

चुनावों में हार के बावजूद कांग्रेस में नेताओं का कद घटना तो दूर और बढ़ता जा रहा है और राजस्थान इसका सबसे अच्छा उदाहरण है

प्रतीकात्मक फोटो
अपडेटेड 8 मई , 2026

असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को लगातार तीसरी बार मिली करारी हार के बाद पार्टी के असम प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह ने इस्तीफा दे दिया. इस इस्तीफे ने कांग्रेस में उस बहस को फिर से जिंदा कर दिया है कि आखिर कई चुनाव हारे हुए नेताओं को पार्टी में इतनी अहम जिम्मेदारी क्यों सौंपी जा रही है? क्या अब कांग्रेस में चुनाव जीतना राजनीतिक तरक्की की अनिवार्य शर्त नहीं रह गया है?

खासकर राजस्थान कांग्रेस में कई ऐसे चेहरे हैं जो लगातार चुनाव हारने के बावजूद कई वर्षों से संगठन में राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत और प्रभावशाली पदों पर बने हुए हैं. कांग्रेस में पिछले कुछ वर्षों में सियासत का यह नया ट्रेंड साफ दिखाई देता है. विधानसभा और लोकसभा चुनावों में हार झेलने वाले नेताओं को पार्टी न केवल बचा रही है, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारियां भी सौंप रही है.

राजस्थान कांग्रेस में यह बहस इसलिए भी तेज है क्योंकि पार्टी पिछले कुछ वर्षों में गुटबाजी, नेतृत्व संघर्ष और चुनावी असफलताओं से लगातार जूझ रही है. ऐसे में हार के बावजूद नेताओं को पुरस्कृत करने की संस्कृति संगठन के भीतर नई नाराजगी पैदा कर रही है. इस बहस के केंद्र में सबसे बड़ा नाम भंवर जितेंद्र सिंह का है. अलवर लोकसभा सीट से वे 2014 और 2019 का चुनाव हार चुके हैं. दावा किया जाता है कि 2024 में उन्होंने हार के डर से चुनाव लड़ने का जोखिम ही नहीं उठाया.

इसके बावजूद कांग्रेस संगठन में उनकी पकड़ लगातार मजबूत बनी रही. जमीनी जनाधार खोने के बावजूद उन्हें राष्ट्रीय महासचिव, सीडब्ल्यूसी सदस्य, असम प्रभारी, चुनाव पूर्व गठबंधन तय करने वाले समूह और राजनीतिक मामलों की समिति जैसे प्रभावशाली मंचों में जगह मिलती रही. पार्टी के भीतर अब यह धारणा बन चुकी है कि चुनावी जीत से ज्यादा उनकी स्वीकार्यता गांधी परिवार और केंद्रीय नेतृत्व के बीच है.

पिछले 23 साल से लगातार चुनाव हारने वाले नीरज डांगी को भी संगठन में हमेशा बेहतर जिम्मेदारियों से नवाजा गया है. नीरज डांगी के पिता कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे थे, इसके चलते उन्हें 2003 में देसूरी से विधानसभा टिकट दिया गया मगर वे बुरी तरह पराजित हुए. इसके बाद 2008 में उन्हें रेवदर से कांग्रेस उम्मीदवार बनाया गया मगर वे फिर चुनाव हार गए.

लगातार दो हार के बाद भी उन्हें 2009 में यूथ कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष का जिम्मा दिया गया और पद मिलने का सिलसिला लगातार जारी रहा. डांगी को 2014 में कांग्रेस प्रवक्ता और प्रदेश कांग्रेस कमेटी में महासचिव जैसा पद मिला. कहने को तो कांग्रेस ने दो बार चुनाव हारने वालों को टिकट नहीं देने की पॉलिसी बनाई मगर 2018 में इस पॉलिसी को दरकिनार कर डांगी को फिर रेवदर से कांग्रेस का टिकट मिला, पर वे फिर चुनाव नहीं जीत पाए.

इन सबके बावजूद 2020 में उन्हें राज्यसभा सांसद का पद उपहार में मिला और संगठन में राष्ट्रीय सचिव जैसी जिम्मेदारी भी दी गई. लगातार चुनावी हार भी उनके राजनीतिक ग्राफ को कभी नीचे नहीं ला पाई. 2018 और 2023 में लगातार विधानसभा चुनाव हार चुके धीरज गुर्जर को कांग्रेस संगठन हमेशा अहम जिम्मेदारियां देता रहा है. वे फिलहाल कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव हैं और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के सह प्रभारी भी हैं.

ऐसा ही एक नाम दिव्या मदेरणा का भी है जिन्हें 2023 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद राष्ट्रीय सचिव और जम्मू कश्मीर जैसे राज्य का सह प्रभार दिया गया. दिलचस्प बात यह है कि दिव्या प्रदेश कांग्रेस की गतिविधियों में कम सक्रिय नजर आती हैं, लेकिन राष्ट्रीय संगठन में उनकी स्थिति मजबूत बनी हुई है. पार्टी के भीतर यह चर्चा आम है कि मदेरणा परिवार की राजनीतिक विरासत और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान उनकी सक्रिय मौजूदगी ने उन्हें हाईकमान का करीबी बनाए रखा.

सवाई माधोपुर से 2018 में विधायक रहे दानिश अबरार 2023 में चुनाव हार गए, मगर इसके बावजूद संगठन में उनकी अहमियत बनी रही. हाल ही में एक पदाधिकारी ने उन पर गुटबाजी के आरोप भी लगाए, फिर भी पार्टी नेतृत्व का भरोसा उन पर कायम है और उन्हें राष्ट्रीय सचिव जैसा अहम पद मिला हुआ है. विजय जांगिड़ कांग्रेस के टिकट पर कभी कोई बड़ा चुनाव नहीं जीत सके, लेकिन उन्हें राष्ट्रीय संयुक्त सचिव और छत्तीसगढ़ का सह प्रभारी बना दिया गया.

इस फेहरिश्त में कई और भी नाम शामिल हैं. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी और कारोबारी राजीव अरोड़ा चाहे कोई चुनाव नहीं जीत पाए हों, मगर उन्हें ऑल इंडिया प्रोफेशनल कांग्रेस में राष्ट्रीय स्तर पर जगह मिली हुई है. कांग्रेस के टिकट पर कोई चुनाव नहीं जीतने वाले संदीप चौधरी कांग्रेस के नेशनल मीडिया पैनलिस्ट हैं. वहीं रूबी खान और रूनित डी मेलो अल्पसंख्यक विभाग में राष्ट्रीय समन्वयक का जिम्मा संभाल रहे हैं.

कुल मिलाकर लगातार हार के बावजूद नेताओं को बड़े पद मिलने से जमीनी कार्यकर्ताओं में यह संदेश जा रहा है कि जनता का जनादेश नहीं, बल्कि दिल्ली दरबार में पकड़ ज्यादा मायने रखती है. अगर यही सिलसिला चलता रहा तो कांग्रेस में चुनाव जीतना संघर्ष और हारना इनाम बन जाएगा?

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