14 अप्रैल को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने रायगंज और मालदा में लगातार दो रैलियां कर पश्चिम बंगाल में अपने चुनावी अभियान की शुरुआत कर दी है. इन रैलियों में उन्होंने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) और BJP दोनों पर तीखा हमला किया.
इस तरह राहुल ने उस राज्य में अपनी पार्टी को प्रासंगिक बनाने की कोशिश की, जहां उसकी पकड़ लगातार कमजोर होती जा रही है. कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले मालदा जिले में राहुल गांधी ने केंद्र और राज्य सरकारों की विफलता पर अपनी बात रखी.
उन्होंने तर्क दिया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में प्रशासनिक पतन और केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जरिए लिए गए नीतिगत निर्णयों के कारण बंगाल की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो रही है.
राहुल ने आरोप लगाया कि राज्य में उद्योग को "दोहरी मार" झेलनी पड़ रही है. राहुल का दावा है कि स्थानीय सरकार की नीतियों ने व्यवसायों को पलायन करने पर मजबूर किया है, जबकि केंद्र सरकार के फैसलों ने संकट को और बढ़ा दिया है.
उनके मुताबिक, दोनों सरकारों की इन्हीं विफलताओं के परिणामस्वरूप रोजगार में कमी और आर्थिक गतिरोध उत्पन्न हुआ है, जिससे विशेष रूप से लघु एवं मध्यम उद्यम प्रभावित हुए हैं. राहुल गांधी ने अपने भाषण में केंद्र सरकार के आर्थिक और विदेश नीति की विफलताओं पर जमकर निशाना साधा.
उन्होंने मोदी सरकार पर अमेरिका के साथ संबंधों में राष्ट्रीय हितों से समझौता करने का आरोप लगाया और कहा कि इससे भारत की आर्थिक संप्रभुता कमजोर हुई है. उन्होंने दावा किया कि सरकार ने ऐसे समझौते किए हैं जिनसे घरेलू उत्पादकों और किसानों को नुकसान होगा. राहुल के मुताबिक, केंद्र की गलत नीतियों से भारत की रणनीतिक स्वायत्तता घट रही है.
राहुल ने कहा, "मोदी ने भारत को बेच दिया है." उन्होंने हाल के हफ्तों में लगाए गए अपने इस आरोप को दोहराया और इसे व्यापार और ऊर्जा नीतियों की व्यापक आलोचना से जोड़ा है. उन्होंने आगे कहा कि ऊर्जा आयात जैसे मुद्दों पर स्वतंत्र निर्णय लेने की भारत की क्षमता सीमित कर दी गई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि बाहरी प्रभाव घरेलू नीतिगत विकल्पों को प्रभावित कर रहा है.
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, "विदेशी वस्तुओं की बाढ़ छोटे व्यवसायों को तबाह कर सकती है. अगर इसी तरह बाहर से सामानों का आयात होता रहा, तो स्थानीय उद्योगों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा."
राहुल गांधी की आलोचना केवल BJP तक ही सीमित नहीं थी. तृणमूल पर तीखा हमला करते हुए उन्होंने राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने और निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनाने में विफल रहने का आरोप लगाया. उन्होंने तर्क दिया कि राज्य नेतृत्व के जरिए लिए गए नीतिगत निर्णयों के कारण बंगाल में उद्योग पहले ही "बंद" हो चुके हैं, जिससे केंद्रीय नीतियों का प्रभाव और भी बढ़ गया है.
रायगंज में दिन के शुरुआती दिनों में राहुल गांधी ने अपने हमले को और तीखा करते हुए कहा कि BJP और TMC दोनों ही सरकारें आम जनता को हाशिए पर धकेलने का काम कर रही है. उन्होंने कहा कि सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाली दोनों पार्टियां शासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के मामले में एक जैसी है. उन्होंने कांग्रेस को एक ऐसे विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जो इस चक्र को तोड़ सकता है.
BJP और TMC को एक समान बताने का यह प्रयास बंगाल में कांग्रेस की रणनीति का मुख्य हिस्सा है, जहां वह राज्य के द्विध्रुवीय राजनीतिक मुकाबले के दोनों ध्रुवों पर हमला करके अपनी राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश है. गांधी के संदेश में बार-बार यही बात दोहराई गई कि दोनों में से कोई भी पार्टी आम लोगों, विशेषकर युवाओं और छोटे व्यवसायियों के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करती.
राहुल की रैलियों के लिए मालदा और रायगंज का चयन भी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था. मालदा का कांग्रेस से गहरा ऐतिहासिक संबंध है, विशेष रूप से दिवंगत ए.बी.ए. गनीखान चौधरी जैसे नेताओं की विरासत के माध्यम से. राहुल की यह यात्रा इस क्षेत्र में एक बार फिर कांग्रेस की जड़ें मजबूत करने के प्रयास के तौर पर देखी जा रही है.
हालांकि, रैलियों के शुरू होने से पहले ही विवाद शुरू हो गए थे. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि गांधी के रायगंज कार्यक्रम के लिए तैयार किए गए हेलीपैड में तोड़फोड़ की गई थी. कांग्रेस ने TMC कार्यकर्ताओं पर कार्यक्रम को बाधित करने का आरोप लगाया. सत्ताधारी पार्टी ने इस आरोप का खंडन करते हुए इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया.
राहुल गांधी के भाषणों में एक व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण की झलक भी मिलती है, जिसे कांग्रेस कई राज्य चुनावों से पहले पेश करने का प्रयास कर रही है. आर्थिक संकट, बेरोजगारी और छोटे व्यवसायों की असुरक्षा पर उनका जोर उन मुद्दों को लेकर उनके नजरिये को दिखाता है, जिन्हें वे लगातार पूरे देश में उठाते रहे हैं.
साथ ही, बंगाल में दिए गए उनके भाषण में एक खास क्षेत्रीय संदर्भ झलक रहा था. राष्ट्रीय नीतियों को उनके स्थानीय प्रभाव, विशेष रूप से बंगाल के औद्योगिक पतन पर उनके प्रभाव से जोड़कर, उन्होंने अपनी बात रखी, जिससे जनता क्षेत्रीय मुद्दों के जरिए इन राष्ट्रीय मुद्दों की अहमियत को समझ सकें. उन्होंने बार-बार "दोहरे झटके" का जिक्र करके मतदाताओं को यह महसूस कराने की कोशिश की है कि कैसे जनता राज्य स्तरीय शासन संबंधी मुद्दों और व्यापक आर्थिक दबावों के बीच फंसी हुई है और इसके लिए राज्य व केंद्र दोनों सरकार जिम्मेदार है.
राहुल गांधी के चुनाव प्रचार का लहजा आक्रामक था, लेकिन इससे बंगाल में कांग्रेस के सामने मौजूद चुनौतियों का भी पता चलता है. राजनीतिक परिदृश्य में TMC और BJP का दबदबा होने के कारण, पार्टी दोनों पर हमला करते हुए खुद को साबित करने की कोशिश में एक कठिन संतुलन बनाने का प्रयास कर रही है.
उनके भाषणों से ऐसा जाहिर होता है कि वे कांग्रेस को एक प्रमुख विरोधी दल के बजाय एक व्यवस्था सुधारने वाली तीसरी शक्ति के रूप में है. ऐसा करके राहुल गांधी कांग्रेस को राज्य की राजनीतिक चर्चा में एक बार फिर शामिल करने का प्रयास कर रहे हैं. हालांकि, यह रणनीति चुनावी लाभ में तब्दील हो पाएगी या नहीं, यह कहना मुश्किल है, खासकर ऐसे ध्रुवीकृत माहौल में.
इस चुनाव को व्यापक रूप से TMC और BJP के बीच सीधा मुकाबला माना जा रहा है, लेकिन गांधी के दखल से संकेत मिलता है कि कांग्रेस ऐसा सोचने वालों को करारा जवाब देने का प्रयास कर रही है. राहुल का तर्क है कि बंगाल की समस्याएं किसी एक पार्टी की विफलता का परिणाम नहीं हैं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक तंत्र की विफलता का नतीजा हैं. इस तरह ममता बनर्जी और नरेंद्र मोदी दोनों को समान रूप से निशाना बनाकर राहुल गांधी चुनाव के परिदृश्य को फिर से परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं.

