एक रोज हेडमास्टर कलीराम ने अपने कमरे में बुलाकर पूछा, "क्या नाम है बे तेरा?"
"ओमप्रकाश" मैंने डरते-डरते धीमे स्वर में अपना नाम बताया. हेडमास्टर को देखते ही बच्चे सहम जाते थे. पूरे स्कूल में उनकी दहशत थी.
"चूहड़े का है?" हेडमास्टर का दूसरा सवाल उछला.
"जी."
"ठीक है. वह जो सामने शीशम का पेड़ खड़ा है, उस पर चढ़ जा और टहनियां तोड़कर झाड़ू बना ले. पत्तों वाली झाड़ू बनाना. और पूरे स्कूल को ऐसा चमका दे जैसा शीशा. तेरा तो यह खानदानी काम है. जा... फटाफट लग जा काम पर."
हेडमास्टर के आदेश पर मैंने स्कूल के कमरे और बरामदे साफ कर दिए. तभी वे खुद चलकर आए और बोले, "इसके बाद मैदान भी साफ कर दे." लंबा-चौड़ा मैदान मेरे वजूद से कई गुना बड़ा था, जिसे साफ करने से मेरी कमर दर्द करने लगी थी. धूल से चेहरा और सिर अट गया था. मुंह के भीतर धूल घुस गई थी. मेरी कक्षा में बाकी बच्चे पढ़ रहे थे और मैं झाड़ू लगा रहा था.
प्रसिद्ध लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की किताब ‘जूठन’ के इस अंश को ध्यान में रखकर यह खबर पढ़िए.
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 4 मई 2026 को कहा कि ओडिशा की न्यायपालिका ने आदिवासी और दलित समुदाय के लोगों के लिए दो महीने तक पुलिस थानों की सफाई जैसी 'घृणित' जमानत शर्तें तय कीं. कोर्ट ने कहा कि इससे यह संकेत मिलता है कि कुछ न्यायाधीशों की 'पिछड़ी मानसिकता' थी और उनमें जातिगत दुराग्रह मौजूद थे. कोर्ट ने ओडिशा की अदालतों की तरफ से लगाई गई उन कई जमानत शर्तों को रद्द कर दिया है, जिनमें आरोपियों को पुलिस थानों की सफाई करने का निर्देश दिया गया था.
अदालत ने ऐसी शर्तों को असंवैधानिक और मानव गरिमा का उल्लंघन बताया है. मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस प्रथा की कड़ी आलोचना की. अदालत ने इसे 'औपनिवेशिक मानसिकता' का प्रतीक और मौलिक मानवाधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन बताया है. कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जमानत की शर्तें निष्पक्ष, कानूनी और सम्मानजनक होनी चाहिए तथा उनका स्वरूप दंडात्मक या अपमानजनक नहीं हो सकता.
दरअसल साल 2023 से ओडिशा के रायगड़ा और कालाहांडी जिलों में वेदांता समूह की प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजना के विरोध में आदिवासी और दलित समुदायों के नेतृत्व में कई प्रदर्शन चल रहे हैं. इन प्रदर्शनों ने कई बार उग्र रूप ले लिया, जिसके कारण झड़पें हुईं और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कई एफआईआर दर्ज की गईं. ऐसे कई मामलों में निचली अदालतों ने आरोपियों को इस शर्त पर जमानत दी कि वे पुलिस थानों की सफाई करेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के निर्देश आरोपियों को पहले से दोषी मानने जैसे हैं. यह सजा देने के समान है, जो जमानत के चरण में स्वीकार्य नहीं है.
विशेष उदाहरणों का उल्लेख करते हुए अदालत ने 9 मई 2025 को उड़ीसा हाई कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें आरोपी कुमेश्वर नायक को रिहाई के बाद दो महीने तक काशीपुर पुलिस स्टेशन की सफाई करने का निर्देश दिया गया था. उन्हें एक प्रदर्शन के दौरान कथित तोड़फोड़ के मामले में गिरफ्तार किया गया था. इसी तरह की एक और शर्त दिसंबर 2025 में रायगड़ा के एक अलग मामले में भी लगाई गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मई 2025 से जनवरी 2026 के बीच कम से कम छह ऐसे आदेश पारित किए गए थे.
पीठ ने कहा कि भले ही ऐसी शर्तें अनजाने में लगाई गई हों, फिर भी वे 'घृणित, अपमानजनक और कानून में अज्ञात' हैं. न्याय के सिद्धांतों को दोहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत की शर्तें किसी व्यक्ति की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचा सकतीं और न ही उन्हें मुकदमे से पहले सजा देने का माध्यम बनाया जा सकता है.
9,206 मामले लंबित, क्या सबको करनी होगी सफाई?
राज्य भर में दलितों-आदिवासियों के खिलाफ इस वक्त कुल 9,206 मामले कोर्ट में लंबित हैं. कटक में सबसे अधिक 1,720 मामले लंबित हैं. इसके बाद खुर्दा में 1,565, भद्रक में 1,224, जाजपुर में 1,061, गंजाम में 1,046, केंद्रापड़ा में 1,034 मामले और पुरी जिले में भी लगभग 1,556 मामले लंबित हैं. यह किसी और का नहीं बल्कि ओडिशा पुलिस का कहना है.
बीते 23 मार्च को ओडिशा पुलिस की मानवाधिकार संरक्षण प्रकोष्ठ (HRPC) ने एसटी एवं एससी विकास, अल्पसंख्यक और पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के सचिव को पत्र लिखकर भद्रक, गंजाम, जाजपुर, केंद्रापड़ा और खुर्दा जिलों में विशेष अदालतें स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है. यह प्रस्ताव इसलिए दिया गया है ताकी एससी/एसटी (PoA) अधिनियम के तहत दर्ज अत्याचार के मामलों के मुकदमों में तेजी लाई जा सके. मिली जानकारी के मुताबिक वर्तमान में केवल तीन विशेष अदालतें कटक, बालासोर और बलांगीर में कार्यरत हैं.
वहीं दूसरी तरफ बीते 17 दिसंबर 2025 को संसद में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री रामदास अठावले की ओर से दिए गए आंकड़ों के मुताबिक साल 2019 से 2023 तक देशभर में आदिवासियों के साथ हुई प्रताड़ना के कुल 47,659 मामले दर्ज किए गए हैं. इसमें साल 2019 में 7,567, साल 2020 में 8,270, साल 2021 में 8,799, साल 2022 में 10,064 और साल 2023 में 12,959 मामले दर्ज हुए हैं.
ओडिशा के वरिष्ठ पर्यावरण व मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रफुल्ल सामंत कहते हैं, "हमने तीन महीने पहले सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और ओडिशा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर भेजा था. हम जनहित याचिका दाखिल (PIL) करना चाहते थे लेकिन उसे उस वक्त PIL के योग्य नहीं माना गया और खारिज कर दिया गया. ठीक तीन महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए यह निर्णय दिया है."
वे आगे कहते हैं, "लेकिन मैं इस बारे में ध्यान दिलाना चाहता हूं कि कॉरपोरेट्स के खिलाफ देशभर में अधिकतर जगहों पर दलित और आदिवासी ही लड़ रहे हैं. कुछ मामलों में अन्य लोग भी लड़ रहे हैं, लेकिन क्या सब में झाड़ू लगाने का निर्देश दिया जाता है? जवाब है, नहीं. आप जजों की मानसिकता को इसी उदाहरण से समझ सकते हैं."
प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता नरेंद्र मोहंती कहते हैं, "जज की मानसिकता को इस बात से समझा जा सकता है कि जिस निर्णय का हमारे रूल ऑफ लॉ में कोई जिक्र नहीं है, उसे जज कहां से लेकर आ गए. जाहिर है कि वे खुद को कानून से ऊपर उठाकर ऐसा निर्णय दे रहे थे. यह साफ तौर पर जातिगत घृणा का मामला है. मैं तो इसे केवल जातिगत घृणा ही नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा के खिलाफ दिया गया फैसला मानता हूं. जो लोग इस वक्त विस्थापन के खिलाफ लड़ रहे हैं, उस लड़ाई को और लड़ने वालों को नीचा दिखाने के लिए ऐसे निर्णय दिए जाते हैं."
राजनीतिक तौर पर दलितों-आदिवासियों के लिए चीजें कछुआ चाल से ही सही, बदल रही हैं. लेकिन सामाजिक तौर पर उन्हें अपने लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक लंबी लड़ाई लड़नी होगी. 'जूठन' के हेडमास्टरों की संख्या समाज में अब भी बहुत अधिक है.

