‘ऐसे कयास लगातार लगाए जा रहे हैं कि चिराग किसके साथ चुनाव लड़ेंगे. जहां तक गठबंधन की बात है तो मैं यह साफ कर दूं, चिराग का गठबंधन, चिराग का तालमेल सिर्फ और सिर्फ बिहार की जनता के साथ है.’ चिराग पासवान ने 10 मार्च को अपनी पार्टी लोजपा (रामविलास) की मुजफ्फरपुर में आयोजित 'जन आशीर्वाद महासभा' को संबोधित करते हुए यह बयान दिया है.
बिहार के राजनीतिक गलियारों में इस बात के कयास कई दिनों से लगाए जा रहे थे कि नीतीश के एनडीए में आने, पशुपति पारस के हाजीपुर सीट पर फिर से दावेदारी करने और लोकसभा चुनाव के लिए एनडीए के बीच सीट शेयरिंग के लिए तय हो रहे फार्मूले से चिराग नाराज हैं. इस कयासबाजी पर खुद चिराग पासवान ने रविवार को पार्टी की जन आशीर्वाद महासभा में मुहर लगा दी.
यह सभा वैशाली लोकसभा क्षेत्र के मुजफ्फरपुर के साहिबगंज में हुई थी. यहां चिराग ने अपने संबोधन में एक बार भी खुद को एनडीए का हिस्सा नहीं बताया. न ही उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लिया, जबकि वे खुद को पीएम मोदी का हनुमान बताते रहे हैं.
इसके उलट इस जनसभा में चिराग ने उन सभी पार्टियों, नेताओं और गठबंधनों को बिहार की बदहाली का जिम्मेदार बता दिया, जो अब तक बिहार पर राज करते आए थे. उन्होंने कहा, "कई सरकारें आईं, गईं. गठबंधन बने और टूटे. मगर हमारे प्रदेश की समस्याएं आज भी वहीं की वहीं हैं. लोगों ने बड़े-बड़े वादे किए मगर बिहार वहीं के वहीं खड़ा है. पलायन हमारे युवाओं की मजबूरी बन गया है, शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पलायन."
जाहिर ही जानकारों को उनके इस भाषण में वह चिराग नजर नहीं आया जो हमेशा खुद को एनडीए का हिस्सा और मोदी का हनुमान बताता रहा है. जिस चिराग पासवान ने अपने पिता रामविलास पासवान को मोदी के साथ आने के लिए प्रेरित किया था.साथ ही जिसने अपनी अब तक की राजनीति में एक बार भी मोदी या भाजपा का विरोध नहीं किया.
चिराग की यह नाखुशी राजनीतिक विश्लेषकों ने उस दिन ही परख ली थी, जब दो मार्च को औरंगाबाद में पीएम मोदी की सभा में एक ही माला में मोदी और नीतीश नजर आए थे और आमंत्रित अतिथि होने के बावजूद चिराग उस सभा से गायब रहे. फिर लोगों ने यह भी देखा कि जब लालू यादव के हमले के बाद भाजपा और एनडीए के कई नेताओं ने खुद के सोशल मीडिया अकाउंट में ‘मोदी का परिवार’ जोड़ लिया, मगर चिराग का नाम वही का वही रहा - 'युवा बिहार चिराग पासवान.'
क्यों नाखुश हैं चिराग
चिराग की नाखुशी की कई वजहें हैं. पहली तो वे इस बात से नाखुश थे कि एनडीए में हाजीपुर लोकसभा सीट पर उनके दावे को लेकर कोई स्पष्ट राय नहीं बन रही. उनका सम्मान तो है, मगर उनकी पार्टी को तोड़ने वाले उनके चाचा पशुपति पारस को भी उसी सम्मान के साथ जगह दी जा रही है. फिर उनकी नाखुशी उस बात से हुई कि एनडीए में नीतीश कुमार और जदयू को शामिल कर लिया गया. चिराग मानते हैं कि नीतीश कुमार ने ही उनके पिता की पार्टी लोजपा को तोड़ने के लिए पशुपति पारस को उकसाया था. चिराग की पूरी राजनीति नीतीश कुमार के विरोध की राजनीति है. वे कहते हैं कि नीतीश कुमार बिहार की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पा रहे और उन्हें अभी सत्ता छोड़ देनी चाहिए.
तीसरी वजह यह है कि उनका छह लोकसभा सीटों पर आम और हाजीपुर की सीट पर खास दावा है. वे छह सीट मांग रहे हैं, मगर नीतीश के आने के बाद उनके लिए छह सीटें निकल नहीं पा रहीं. एनडीए में उनके लिए हद से हद तीन सीटें देने की बात चल रही है. उनका खास दावा अपने पिता की पारंपरिक और हर हाल में जिताऊ लोकसभा सीट हाजीपुर पर है, जहां से फिलहाल उनके चचा पशुपति पारस एमपी हैं. पारस सीट छोड़ने के लिए तैयार नहीं. एनडीए कोई फैसला नहीं कर पा रही. इस तमाम उलझनों, दावों और अपने पक्ष में फैसले न होने की वजह से चिराग नाखुश हैं.
तो क्या चिराग महागठबंधन में जाएंगे!
नाखुश चिराग क्या करेंगे, यह कयास हर राजनीतिक विश्लेषक लगा रहे हैं. पिछले दिनों यह खबर भी आई कि महागठबंधन की तरफ से चिराग पासवान को ऑफर मिला है. उन्हें कहा गया है कि अगर वे महागठबंधन की तरफ आते हैं तो उन्हें आठ सीटें बिहार में और दो सीटें दूसरे राज्य में मिल सकती हैं. ऐसा माना जाता है कि चिराग पासवान के पास छह फीसदी वोट हैं, अगर वे महागठबंधन की तरफ आते हैं तो अब तक एनडीए के पक्ष में जो लड़ाई है वह बराबर की टक्कर हो सकती है.
मगर क्या सचमुच चिराग को कोई ऑफर मिला है. अगर मिला है तो क्या चिराग महागठबंधन की तरफ जाएंगे?
जब हमने राजद के वरिष्ठ प्रवक्ता चितरंजन गगन से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, “हमारी तरफ से चिराग से कोई बातचीत नहीं चल रही है. पर अगर कोई नेता या पार्टी सांप्रदायिक और जनविरोधी मोदी सरकार के खिलाफ इस लड़ाई में हमारे साथ आती है तो हम उसका स्वागत करेंगे. अब चिराग पासवान को फैसला करना है कि क्या वे इस लड़ाई में हमारे साथ आएंगे?" हालांकि चिराग पासवान ने खुद मुजफ्फरपुर की सभा में इस कयासबाजी को खारिज कर दिया कि वे महागठबंधन के साथ जाना चाहते हैं. मगर जब तक सीटों के तालमेल पर कोई फैसला नहीं हो जाता चिराग को लेकर कयासबाजियां चलती रहेंगी.
अगर चिराग की बातें नहीं मानी गई तो वे क्या करेंगे?
इस सवाल पर पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हेमंत कहते हैं, "चिराग का विरोध नीतीश से है और अपने चाचा पशुपति पारस से है. उनका विरोध मोदी और भाजपा से नहीं है. आज की सभा में भी जब चिराग खुद का गठबंधन जनता से बता रहे थे. उसी मंच पर उनकी पार्टी के दूसरे नेता मोदी का हाथ मजबूत करने के भाषण दे रहे थे. वैसे तो राजनीति में कब क्या हो, कौन किसके साथ चला जाए यह कहना मुश्किल है. मगर मुझे लगता नहीं कि किसी भी सूरत में चिराग महागठबंधन के साथ जाएंगे."
वे इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, "पहली बात कि चिराग के अलावा उनकी पार्टी के ज्यादातर बड़े नेता सवर्ण हैं और भाजपा की मानसिकता वाले हैं. वे उन्हें कभी भाजपा के खिलाफ जाने नहीं देंगे. दूसरी बात चिराग हर सूरत में दिल्ली के लुटियन जोन में एक बंगला और केंद्र सरकार में एक मंत्रालय चाहते हैं. इसकी गारंटी उन्हें मोदी ही दे सकते हैं. अभी तो ऐसा लग रहा है कि उनकी नाराजगी का इस्तेमाल भाजपा नीतीश की सीटें कम करने में कर सकती हैं. अगर सचमुच चिराग को कम सीटें मिलीं तो भी वे 2020 की तरह जदयू के खिलाफ उम्मीदवार खड़े कर देंगे, मगर महागठबंधन में नहीं जाएंगे."
कुछ जानकार यह भी मानते हैं कि चिराग की राजनीति की शुरुआत ही मोदी के प्रशंसक के तौर पर हुई. उनकी सोशलिस्ट पॉलिटिक्स की ना ट्रेनिंग है और न ही इसमें उनकी कोई रुचि. अगर वे महागठबंधन में जाते हैं तो उन्हें मोदी का विरोध करना पड़ेगा और सामाजिक न्याय की बात करनी पड़ेगी. सांप्रदायिकता का विरोध करना पड़ेगा. यह काम वे शायद ही कर पाएं.

