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ईरान युद्ध की आंच में झुलस रही लखनऊ की चिकनकारी

खाड़ी युद्ध से एक्सपोर्ट ठप, लखनऊ की चिकनकारी इंडस्ट्री में 60 फीसदी की गिरावट; कारीगरों की आय घटी, करोड़ों का माल अटका, पांच लाख लोगों की रोजी-रोटी पर संकट छाया

सालाना 100 करोड़ रुपए के चिकनकारी कपड़े लखनऊ से खाड़ी देशों को निर्यात होते हैं (फाइल फोटो)
अपडेटेड 4 अप्रैल , 2026

पुराने लखनऊ में चौक इलाके की तंग गलियों में रहने वाली 42 वर्षीय शबीना बेगम पिछले 20 साल से चिकनकारी कर रही हैं. सुबह की नमाज़ के बाद वे सफेद कपड़े पर महीन टांके डालना शुरू करती थीं, जो अक्सर देर रात तक चलता था. लेकिन पिछले एक महीने से उनका काम लगभग ठप पड़ा है. 

उनके पास आधा तैयार माल रखा है, मगर उसे लेने वाला कोई नहीं आ रहा. शबीना बताती हैं, “पहले हर हफ्ते नया काम मिल जाता था. अब जो काम किया है, वही घर में पड़ा है. पैसे नहीं आ रहे, तो घर चलाना मुश्किल हो गया है.” शबीना जैसी हजारों महिला चिकन कारीगरों की जिंदगी इन दिनों अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है.

लखनऊ की मशहूर चिकनकारी इंडस्ट्री, जो सदियों से शहर की पहचान रही है, इस समय वैश्विक भू-राजनीतिक संकट की सीधी मार झेल रही है. पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध ने इस उद्योग के सबसे बड़े बाजार, खाड़ी देशों, को बुरी तरह प्रभावित किया है. नतीजा यह है कि एक्सपोर्ट लगभग ठप हो गया है और इसका असर सीधे उन करीब पांच लाख लोगों पर पड़ रहा है, जिनकी रोजी-रोटी इस कला से जुड़ी है. 

यह उद्योग केवल एक पारंपरिक शिल्प नहीं, बल्कि लखनऊ की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है. इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के मुताबिक, लखनऊ की चिकनकारी का सालाना कारोबार करीब ₹550 करोड़ का है. इसमें से लगभग 100 करोड़ रुपए का निर्यात खाड़ी देशों को होता रहा है, जबकि यूरोप और अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में करीब 70 करोड़ रुपए का माल जाता है. यानी कुल कारोबार का एक बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर विदेशों पर निर्भर है. 

ऐसे में जैसे ही पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू हुआ, इसका असर तुरंत दिखाई देने लगा. पिछले एक महीने से ज़्यादा समय से, माल की खेप पूरी तरह से रुक गई है. इससे पहले, अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ (शुल्क) के कारण भी एक्सपोर्ट में गंभीर रुकावटें आ चुकी थीं. 

इस इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के अनुसार, खाड़ी में चल रहे युद्ध ने स्थिति को और भी बदतर बना दिया है. लखनऊ के एक प्रमुख निर्यातक विनोद पंजाबी बताते हैं, “खाड़ी देश हमेशा से हमारा सबसे बड़ा बाजार रहे हैं. खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, श्रीलंकाई, नेपाली और अफ़गानी लोग रहते हैं. ये सभी लोग लखनऊ के चिकनकारी कपड़ों के शौकीन हैं. अभी हालात ऐसे हैं कि पिछले एक महीने से एक भी खेप नहीं भेजी जा सकी है.” इसकी एक और खास मुश्किल है. विनोद कहते हैं, “हम ऑर्डर के हिसाब से डिजाइन तैयार करते हैं. यह माल खास तौर पर वहां के ग्राहकों के लिए होता है. अब वह सारा सामान गोदाम में पड़ा है. इससे सिर्फ व्यापार नहीं, पूरी सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है.”

शून्य पर पहुंचा एक्सपोर्ट 

लखनऊ चिकन और हस्तशिल्प एसोसिएशन के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट सुरेश चबलानी भी स्थिति को गंभीर मानते हैं. उनके मुताबिक, “त्योहारों और शादियों के सीजन में हम एक महीने में 15 करोड़ रुपए तक का निर्यात कर लेते थे. लेकिन इस बार ईद और शादी के सीजन में एक्सपोर्ट पूरी तरह से शून्य रहा. यह हमारे लिए अभूतपूर्व स्थिति है.” 

इस संकट का सबसे बड़ा असर कारीगरों पर पड़ा है, जो इस उद्योग की रीढ़ हैं. अधिकांश कारीगर महिलाएं हैं, जो घर से ही काम करती हैं और प्रति पीस कपड़े पर चिकनकारी करने के 300 से 500 रुपए के आधार पर भुगतान पाती हैं. काम रुकने का मतलब है कि उनकी आमदनी भी तुरंत रुक जाती है. चिकन के काम में लगी अलीगंज की रहने वाली नाजिमा खातून बताती हैं, “हमको जो कपड़ा मिलता है, उसी पर काम करके पैसा मिलता है. अब कपड़ा ही नहीं मिल रहा. घर में चार लोग हैं, खर्च कैसे चलेगा?” 

कारीगरों की इस परेशानी को फैशन डिजाइनर अस्मा हुसैन भी स्वीकार करती हैं, जो लंबे समय से चिकनकारी और आरी-जरदोजी कारीगरों के साथ काम कर रही हैं. वे कहती हैं, “एक्सपोर्ट में कम से कम 60 प्रतिशत की गिरावट आई है. खासकर पश्चिम एशिया के लिए तो पूरी तरह रुकावट है. इससे सीधे तौर पर कारीगरों के काम पर असर पड़ा है.” अस्मा यह भी बताती हैं कि केवल मांग में गिरावट ही समस्या नहीं है, बल्कि लागत भी बढ़ गई है. “पेट्रोलियम से जुड़ी अनिश्चितता के कारण कच्चे माल की कीमतें करीब 20 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं. ऊपर से शिपमेंट में देरी और फ्लाइट कैंसिलेशन ने स्थिति और खराब कर दी है.”

बिना बिके पड़ा हुआ है माल 

व्यापारियों के सामने भी बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. लखनऊ चिकन हस्तशिल्प एसोसिएशन के प्रेसिडेंट संजीव अग्रवाल बताते हैं, “हमने कच्चा माल खरीदा, कारीगरों को एडवांस दिया और माल तैयार कराया. लेकिन अब वह सब गोदाम में पड़ा है. करीब 2 करोड़ रुपए का माल बिना बिके पड़ा है.” वे आगे जोड़ते हैं, “यह एक्सपोर्ट क्वालिटी का माल है, जिसे भारत में उसी कीमत पर बेचना संभव नहीं है. यहां के ग्राहक उतनी कीमत देने को तैयार नहीं होते.” 

यह समस्या केवल एक शहर या उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का उदाहरण है कि कैसे वैश्विक संकट स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं. पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण न सिर्फ व्यापार बाधित हुआ है, बल्कि वहां के सामाजिक और आर्थिक हालात भी प्रभावित हुए हैं. शादियां टल रही हैं, कार्यक्रम रद्द हो रहे हैं और उपभोक्ताओं की प्राथमिकताएं बदल रही हैं. 

लखनऊ चिकनकारी एसोसिएशन के सेक्रेटरी संजीव झिंगरान कहते हैं, “दुबई और अन्य जगहों पर होने वाली प्रदर्शनियां टल गई हैं. ग्राहक भी अब खरीदारी को लेकर उतने उत्साहित नहीं हैं. लोग खर्च करने से बच रहे हैं.” इसका असर मांग पर साफ दिखाई दे रहा है. पहले जहां चिकनकारी के कपड़े त्योहारों, शादियों और खास मौकों के लिए खरीदे जाते थे, वहीं अब लोग जरूरी खर्चों को प्राथमिकता दे रहे हैं.

बाजार के डाइवर्सिफाई न होने से दिक्कतें 

पद्म श्री से सम्मानित रूना बनर्जी इस स्थिति को केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संकट भी मानती हैं. वह कहती हैं, “अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो कारीगर इस काम को छोड़ने के लिए मजबूर हो सकते हैं. यह केवल रोजगार का सवाल नहीं है, बल्कि उस विरासत का भी सवाल है, जिसने लखनऊ को एक अलग पहचान दी है.” 

विशेषज्ञों का मानना है कि चिकनकारी जैसे पारंपरिक उद्योग वैश्विक बाजारों पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं. ऐसे में जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई संकट आता है, उसका सीधा असर इन पर पड़ता है. लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दुर्गेश श्रीवास्तव बताते हैं, “हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट सेक्टर में एक्सपोर्ट का हिस्सा काफी बड़ा होता है. इसलिए भू-राजनीतिक तनाव, ट्रेड बैरियर्स और लॉजिस्टिक समस्याएं इन उद्योगों को सबसे पहले प्रभावित करती हैं. चिकनकारी इसका ताजा उदाहरण है.” वे यह भी सुझाव देते हैं कि ऐसे संकट से निपटने के लिए बाजार का विविधीकरण (Diversification) जरूरी है. “अगर हम केवल कुछ चुनिंदा देशों पर निर्भर रहेंगे, तो जोखिम बढ़ेगा. घरेलू बाजार को मजबूत करना और नए अंतरराष्ट्रीय बाजार तलाशना जरूरी है.” 

यूपी सरकार की ‘एक ज़िला एक उत्पाद’ (ओडीओपी) योजना ने चिकनकारी को नई पहचान जरूर दी, लेकिन मौजूदा संकट ने यह भी दिखा दिया है कि केवल पहचान काफी नहीं है. उद्योग को स्थिर और टिकाऊ बनाने के लिए दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत है.

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