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छत्तीसगढ़ कैसे बना था माओवादियों का सबसे मजबूत ठिकाना?

2010 के बाद छत्तीसगढ़ में सरकार की जवाबी कार्रवाई मजबूत होने लगी. धीरे-धीरे माओवादियों के गढ़ में पुलिस-प्रशासन की पहुंच बढ़ी, जिससे राज्य के अधिकांश जिलों को नक्सल प्रभाव से मुक्त किया जा सका

सुरक्षाबलों ने छत्तीसगढ़ में कैसे किया नक्सलियों का सफाया (सांकेतिक तस्वीर)
सुरक्षाबलों ने छत्तीसगढ़ में कैसे किया नक्सलियों का सफाया (सांकेतिक तस्वीर)
अपडेटेड 19 अप्रैल , 2026

भारत में दशकों लंबे इतिहास के माओवाद कई राज्यों में जड़ें जमा चुका है और बाद में वहीं उसका सफाया भी हो गया. छत्तीसगढ़ वह आखिरी राज्य था, जहां सशस्त्र विद्रोह खत्म होने से पहले सबसे ज्यादा मजबूत हुआ.

ऐसे में यह जानना जरूरी है कि वहां इस आंदोलन की शुरुआत कब हुई और इसके प्रमुख पड़ाव क्या थे? एक आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, माओवादियों का पहला समूह 1968 में तत्कालीन अविभाजित मध्य प्रदेश के बस्तर जिले में पहुंचा था.

पड़ोसी आंध्र प्रदेश के खम्मम, आदिलाबाद और करीम नगर जिलों से आए समूह दक्षिण बस्तर के भोपालपट्टनम, उसूर और कोंटा इलाकों में डेरा डालने लगे, जहां उन्होंने अपनी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए बैठकें कीं. इस आंदोलन के सबसे सक्रिय कार्यकर्ताओं में से एक थे डॉ. आई.एस. मूर्ति, जो एक रजिस्टर्ड डॉक्टर थे और भोपालपट्टनम पुलिस स्टेशन के ठीक सामने रहते थे. वे माओवादी साहित्य बांटते थे और घर-घर जाकर मरीजों का इलाज करते समय अपनी विचारधारा का प्रचार भी करते थे.

इस क्षेत्र में माओवादियों की पहली भूमिगत बैठक 1968 में हुई थी. इसके बाद अगले कुछ वर्षों में उन्होंने अपनी संगठनात्मक संरचना तैयार की. 1974 में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब पहला माओवादी दस्ता बनाया गया. उसी साल बस्तर में माओवादियों ने अपना पहला हिंसक हमला किया, उन्होंने उसूर के पोलमपल्ली में हथियार और आभूषण लूटे.

इससे पहले, वर्तमान उत्तरी छत्तीसगढ़ में माओवादी नेटवर्क स्थापित करने की कोशिश की गई थी. 1971 में पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले से आए जोगी राव छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले (तब) के चिरमिरी पहुंचे. उन्होंने कोयला खदान के मजदूरों के बीच काम करना शुरू किया और माओवादी विचारधारा का प्रचार किया. हालांकि, पुलिस ने उन्हें पकड़कर बंगाल वापस भेज दिया.

दक्षिण छत्तीसगढ़ में 1974 से 1980 के बीच माओवादी गतिविधियों में कुछ समय के लिए ठहराव आया, लेकिन उसके बाद 1990 तक माओवादियों ने दुर्गम क्षेत्रों में अपने संगठन को मजबूत किया. 1980 में CPI (मार्क्सवादी लेनिनवादी) PWG (पीपुल्स वॉर ग्रुप) के गठन के साथ आंध्र प्रदेश में सात नए वन दल बनाए गए.

उसी साल माओवादी संगठन के जरिए एक दूरगामी निर्णय लिया गया. दंडकारण्य क्षेत्र जिसमें वर्तमान में कांकेर, नारायणपुर, जगदलपुर, बीजापुर, सुकमा और कोंडागांव के सात जिलों का एरिया आता था, उसे एक अलग हिस्से में बांटकर यहां के लिए माओवादियों की एक स्वतंत्र राज्य क्षेत्रीय समिति बना दिया गया. यह इलाका पहले आंध्र प्रदेश नक्सल समिति का हिस्सा था. एन. शिवाजी को इसका प्रमुख नियुक्त किया गया. स्पष्ट था कि माओवादियों की बस्तर को लेकर बड़ी योजनाएं थीं.

1985 तक, माओवादियों ने सुकमा कोंटा, एटापल्ली, बैलाडीला, बसागुडा आदि में और भी दल बना लिए थे और उत्तरी बस्तर के पंखाजुर पुलिस स्टेशन तक अपना प्रभाव फैला लिया था. दूरदराज के गांवों में भी माओवादी संगठनों का गठन हो रहा था. जबकि महिलाओं, श्रमिकों और अन्य हाशिए पर पड़े समूहों के हितों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले कई अन्य संगठन भी उभर आए थे.

इनमें प्रमुख थे दंडकारण्य आदिवासी किसान मजदूर संघ और क्रांतिकारी आदिवासी महिला संघ थे. आखिरकार 3 मई को पुलिस और माओवादियों के बीच पहली मुठभेड़ पंखाजुर के तालबेदी गांव में हुई, जिसमें एटापल्ली दल के प्रमुख गणपति शहीद हो गए. हालांकि, माओवादियों का संगठन मजबूत होता चला गया.

1987 में बस्तर जिला समिति का गठन हुआ और अगले वर्ष अबूझमद दलम की स्थापना हुई, जिसका नाम माओवादियों के अंतिम ठिकाने से मिलता-जुलता था. 1989 में केशकल दलम का गठन हुआ और 1990 में दो और दलम बनाए गए: भानुप्रतापुर दलम और कोंडागांव दलम.

इन माओवादी संगठनों के फैलाव के मैप पर ध्यान देने से यह स्पष्ट हो जाता है कि माओवादियों के मन में उत्तर की ओर बढ़ने की योजना थी. ताकि वे आखिरकार बिहार और पूर्वी मध्य प्रदेश के पड़ोसी जिलों जैसे सरगुजा और शहडोल में अपने साथियों के साथ मिलकर काम कर सकें.

ऐसा नहीं था कि राज्य को इसकी जानकारी नहीं थी, लेकिन माओवादी केवल बैठकों और अपनी विचारधारा पर चर्चा तक ही सीमित थे. इसके लिए किसी को तब तक गिरफ्तार करना आसान नहीं था, जब तक कि उनका अंतिम उद्देश्य ज्ञात न हो. 1989 में, मध्य प्रदेश सरकार ने इस बढ़ती समस्या से निपटने के लिए दंतेवाड़ा में एक नया पुलिस जिला बनाया.

दो प्रमुख माओवादी नेता, राजन्ना और रामन्ना, गिरफ्तार किए गए, लेकिन उन्होंने जगदलपुर में एक साहसिक जेलब्रेक को अंजाम दिया. इसके बाद माओवादी गतिविधियां पूर्व की ओर बढ़ीं और राजनांदगांव, मानपुर और बालाघाट में इन्होंने अपना विस्तार किया.  

बस्तर में माओवाद का अगला चरण 1990 से 2000 के बीच का है. इस दौरान माओवादियों के कई प्रमुख नेता उभरे. 1990 में नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजु का उदय हुआ, जो आगे चलकर CPI (माओवादी) के महासचिव बने. मई 2025 में पुलिस मुठभेड़ में उनकी मृत्यु हो गई.

1992 तक, माओवादी इतने मजबूत हो चुके थे कि वे औद्योगिक परियोजनाओं के खिलाफ आंदोलन कर सकते थे. चाहे वह बॉक्साइट खदानें हों या प्रस्तावित रेल लाइन. उसी वर्ष, दंडकारण्य को गुरिल्ला क्षेत्र घोषित किया गया, जो राज्य के खिलाफ एक व्यापक युद्ध का संकेत था. 1990 के दशक के मध्य तक, बिहार में शक्तिशाली गुट माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (MCC) मध्य प्रदेश में स्थित सरगुजा में अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रहा था.

एक और बड़ा नाम जो सामने आया, वह था, मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति. भूपति ने 2025 में गढ़चिरोली में आत्मसमर्पण किया था. उसे दंडकारण्य विशेष क्षेत्रीय समिति का प्रमुख नियुक्त किया गया था, जिसकी नींव उसी वर्ष पड़ी थी. 1996 में पुलिस ने सरगुजा जिले के लोढ़ा गांव में MCC के प्रमुख नेताओं जैसे- प्रसिद्ध ठाकुर और तिभु को गिरफ्तार किया. 2000 तक MCC और PWG दोनों ने सरगुजा में लगभग 15 दस्ते बना लिए थे. वे दिखावटी अदालतें लगाते थे और 'सजा' देते थे.

2001 से 2010 के बीच का अगला दशक माओवादियों के लिए सैन्य दृष्टि से सबसे शक्तिशाली काल था. 1 नवंबर, 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के कुछ महीनों बाद, 2001 में माओवादियों ने दंडकारण्य को 'मुक्त क्षेत्र' घोषित कर दिया. दूसरे शब्दों में कहें तो एक ऐसा क्षेत्र जहां सरकार का शासन समाप्त हो जाए. अगले वर्ष छत्तीसगढ़ ने बलरामपुर में एक नया पुलिस जिला स्थापित किया. इसके बाद 2004 में सूरजपुर में माओवादियों के नियंत्रण से निपटने के लिए एक नया पुलिस जिला बनाया.

21 सितंबर 2004 को, PWG और MCC ने मिलकर CPI (माओवादी) का गठन किया. एक नई उत्तर छत्तीसगढ़ राज्य समिति बनाई गई. हालांकि, 2004 से 2009 के बीच, प्रभावी पुलिस कार्रवाई ने राज्य के उत्तरी भागों में माओवाद के प्रसार को रोक दिया. इस सफलता के अन्य कारण थे, जिनमें माओवादियों के छिपने के लिए जंगलों का अभाव और स्थानीय लोगों का समर्थन न होना प्रमुख था. उत्तर छत्तीसगढ़ के जंगल मुख्य रूप से शाल के हैं, जिसकी वजह से वहां दूर तक साफ-साफ सबकुछ दिखाई देता है. वहीं, दक्षिण बस्तर के घने जंगलों (बीजापुर, नारायणपुर, सुकमा आदि) के मुकाबले उत्तर छत्तीसगढ़ में जंगल बिखरे हुए और टुकड़ों में फैले हैं.

2011 से अब तक, माओवादियों ने पूर्व और पश्चिम की ओर विस्तार करने का प्रयास किया. नक्सलियों ने इस पूर्वी योजना के तहत छत्तीसगढ़ के धमतरी, गरियाबंद और महासमुंद जिलों तथा ओडिशा के नवरंगपुर, नुआपड़ा, बोलंगीर और बरगढ़ जिलों को मिलाकर एक राज्य समिति क्षेत्र का गठन किया.

पश्चिम में माओवादियों ने महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ क्षेत्र का गठन किया ताकि तीनों राज्यों के त्रिकोणीय जंक्शन क्षेत्र में अपना विस्तार कर सकें. इसका उद्देश्य एक नया मोर्चा खोलना भी था, ताकि दक्षिण छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों के जरिए बनाए जा रहे दबाव को कम किया जा सके. हालांकि, पश्चिमी क्षेत्र में गांवों में समर्थन की कमी के कारण स्थानीय भर्ती बहुत कम थी.

राज्य के जरिए की गई जवाबी कार्रवाई देरी से शुरू हुई, लेकिन 2010 के बाद कार्रवाई तेज हो गई. धीरे-धीरे नक्सली बेल्ट में 'सुरक्षा शून्य' वाले क्षेत्र कम होने लगे. एक-एक करके जिले माओवादियों से मुक्त होने लगे. सबसे पहले जगदलपुर, फिर दंतेवाड़ा, जो संयोगवश 2015 तक वामपंथी उग्रवाद (LWE) जिले के रूप में कुख्यात था.

2013 में माओवादियों ने जगदलपुर जिले के झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं का खूनी नरसंहार किया था. 2023 के बाद सुरक्षा शिविरों का विस्तार मुख्य रूप से नारायणपुर, बीजापुर और सुकमा में हुआ, क्योंकि ये जिले सबसे अधिक प्रभावित रहे.

दक्षिण छत्तीसगढ़ में हि़डमा के नेतृत्व में माओवादियों का सबसे प्रशिक्षित और सबसे घातक सशस्त्र समूह बटालियन नंबर 1 था. हालांकि, उसके बाद से तीन वर्षों के भीतर, सुरक्षा बलों के जरिए बेहतर हथियारों, तकनीकी खुफिया जानकारी और ड्रोन तथा बख्तरबंद वाहनों के इस्तेमाल के कारण नक्सली मारे गए या फिर समर्पण के लिए मजबूर हुए.

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