अपने दफ्तर में बैठकर सहयोगियों के साथ एनकाउंटर की जानकारी कंप्यूटर पर अपडेट करते हुए पखांजुर के थाना प्रभारी लक्ष्मण केंवट बहुत खुश हैं. उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव हैं. बीएसएफ और डीआरजी (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड) की जिस टीम को लक्ष्मण लीड कर रहे थे उसे माओवादी अभियान के चार दशकों की सबसे बड़ी सफलता मिली है.
16 अप्रैल को 29 माओवादियों के एनकाउंटर के बाद लक्ष्मण के निजी एनकाउंटर का आंकड़ा 73 तक पहुंच गया है. 6 बार वीरता के गैलेंट्री अवार्ड विजेता थाना प्रभारी लक्ष्मण केंवट कहते हैं, ''हमने अपनी रणनीति में बदलाव किया और सफलता हाथ लगी, यकीन मानिए यह सिलसिला जारी रहेगा.''
दरअसल केंवट का इशारा इस हमले के दौरान अपनाई गई नई रणनीति से है, जिसका एक अहम पहलू यह था कि माओवादियों को जवानों की मौजूदगी का पता चलने के बाद भी जवान पीछे नहीं लौटे. मौके पर ही जवानों ने कई समूह बनाते हुए अलग-अलग होकर माओवादियों को घेर लिया. बस्तर आईजी पी सुंदरराज के मुताबिक छोटे बेठिया के पास कलपर और हिदुर गांव के बीच सुरक्षाबलों को माओवादियों के जमा होने की सूचना मिली थी. माओवादी लोकसभा चुनाव को प्रभावित करने के मकसद से बड़े हमले को अंजाम देने की योजना बना रहे थे. मुखबिर से मिली इस सूचना के आधार पर डीआरजी और बीएसएफ की टीम छोटे बेठिया से 13 नालों और एक नदी को पार करते हुए पैदल कलपर गांव की ओर सर्च ऑपरेशन के लिए रवाना हुई.
कलपर और हिदुर का इलाका चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है. गांव के हर दूसरे मोहल्ले में माओवादियों ने अपने मारे गए साथियों की याद में स्मारक बनाया है. जगह-जगह पर माओवादियों के बैनर पोस्टर नजर आते हैं. सड़क बनाने की कोशिशों में नाकाम हुई सीमेंट की मिक्सर मशीनें कबाड़ होकर पड़ी हुई हैं. जगह-जगह बांस के झुरमुट हैं. अब तक माओवादियों ने इस क्षेत्र में सड़क और पुल नहीं बनने दिया है. चलने के लिए जो कच्चे रास्ते हैं, वे भी नालों के बहाव की वजह से जगह-जगह से कट गए हैं, बारिश के दिनों में यह क्षेत्र मुख्य मार्ग से कट जाता है. ऐसे ही दुर्गम रास्ते को पारकर सुरक्षाबलों के 150 जवान में पैदल चलकर हिदुर और कलपर के बीच पहाड़ी पर पहुंचे.
इस ऑपरेशन को लीड कर रहे टीआई लक्ष्मण केंवट बताते हैं कि माओवादियों के बाहरी घेरे ने पटाखे फोड़कर माओवादियों को जवानों की मौजूदगी का संकेत दे दिया था. इससे पहाड़ी के ऊपर बैठे माओवादी सतर्क हो गए. दोपहर 12 बजे के आसपास सुरक्षाबल के जवानों पर हल्की फायरिंग शुरू हो गई. बीएसएफ के इंसपेक्टर रमेश चौधरी की जांघ में गोली लगी. उन्हें बचाने की कोशिश करते हुए माओवादियों की एक गोली डीआरजी के जवान सूर्यवंशी श्रीमाली के कंधे को चीरती हुई निकल गई.
सुरक्षाबलों ने इन दोनों घायलों को प्राथमिक उपचार देने के बाद भी सर्च ऑपरेशन जारी रखा. उन्हें अब तक माओवादियों की मौजूदगी का पुख्ता सबूत मिल चुका था. इसके बाद सुरक्षाबलों ने चारों ओर से घेराबंदी कर हैवी फायरिंग शुरू कर दी. माओवादियों ने भागने के लिए नाले का सहारा लिया तो वहां मौजूद डीआरजी के जवानों ने उनपर जमकर फायरिंग की. 4 घंटे तक चली इस मुठभेड़ के बाद जब जवानों ने सर्च ऑपरेशन शुरू किया तो एक-एक कर 29 माओवादियों के शव, एके-47, एसएलआर बंदूकें, 303 राइफलें समेत कुछ अन्य अत्याधुनिक हथियार बरामद हुए.
मारे गए माओवादियों में 15 महिलाएं और 14 पुरूष शामिल थे. यह माओवादियों के खिलाफ बीते चार दशकों से चल रहे अभियान के इतिहास में उन्हें हुआ सबसे बड़ा नुकसान था. इस ऑपरेशन से जुड़ी रणनीति के बारे में और जानकारी देते हुए बीएसएफ के डीआईजी आलोक कुमार कहते हैं, ''यह बीएसएफ का इंटेलिजेंस बेस ऑपरेशन था, इसमें माओवादियों को चारों ओर से घेरने की रणनीति बनाकर ऑपरेशन को अंजाम दिया गया.'' इस ऑपरेशन में 25 लाख का ईनामी माओवादी शंकर राव और 8 लाख की ईनामी माओवादी ललिता मंडावी शामिल है. शंकर राव उत्तर बस्तर में माओवादियों की सप्लाई चेन सम्हालने वाला एरिया कमेटी का प्रमुख था. ललिता डिविजनल एरिया कमेटी रैंक में शामिल थी.
सुरक्षाबल जवानों का मानना है कि माओवादी मोर्चे पर मिल रही सफलता के पीछे बदली हुई रणनीति है. पहले सीआरपीएफ ही माओवादियों के खिलाफ सर्च अभियान चलाती थी. क्षेत्र की भौगोलिक जानकारी नहीं होने की वजह से इस अर्धसैन्य बल के जवान अक्सर माओवादी हमलों का शिकार हो जाते थे. दूसरी तरफ खुफिया तंत्र कमजोर होने की वजह से कई बार जवान माआवोदियों के एंबुश में फंस जाते थे. ऐसे हमलों से बचाव और माओवादियों से लड़ने के लिए सुरक्षाबल के जवानों को गोरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग देने के लिए एक इंस्टीट्यूट भी बनाया गया लेकिन इसके कुछ खास नतीजे नहीं मिले.
इसके बाद आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों और स्थानीय युवकों को चुनकर उन्हें सहायक आरक्षक बनाया गया. इन्हें जिला रिजर्व गार्ड यानी डीआरजी कहा गया. इन जवानों को क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और माओवादियों के हमला करने के रणनीति की सटीक जानकारी होती है. अब केंद्रीय सुरक्षाबल भी ऑपरेशन लॉन्च करने के दौरान बस्तर फाईटर्स (स्थानीय युवाओं को मिलाकर बनाया गया और एक सुरक्षाबल) और डीआरजी के जवानों को साथ लेकर चलते हैं. इन बदलावों के कारण माओवादी मोर्चे पर सुरक्षाबलों को सफलता मिल रही है.
नीतिगत स्तर पर भी कई बदलाव किए गए. पहला बदलाव ये हुआ है कि अब नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी यानी एनआईए और राज्य के खुफिया विभाग के बीच समन्वय बढ़ा है. माओवादियों के एरिया कमेटियों के अनुपात में ही सुरक्षाबलों के अधिकारी नियुक्त किए गए हैं. ये जमीनी स्तर पर मुखबिरों के जरिए सूचनाएं इकट्ठा करते हैं. इसके अलावा माओवादियों की हर एरिया कमेटी की सूचनाएं इकट्ठा करना एक टीम की जिम्मेदारी है. यह टीम उस एरिया कमेटी के माओवादियों के मूवमेंट पर नजर रखती है. तीसरी महत्वपूर्ण पहल यह हुई कि सूचनाएं मिलने के बाद और ऑपरेशन शुरू करने से पहले नजदीकी जिले के सुरक्षाबलों के साथ समन्वय बनाया जाता है. ताकि एक जिले में जब नक्सलियों को घेरा जाए तो दूसरे जिले और पास के कैंप के जवान उनके भागने का रास्ता रोक सकें. अब खुफिया तंत्र मजबूत होने के कारण समय पर माओवादियों के मौजूदगी की सूचना मिल रही है.
अप्रैल की 16 तारीख को हुए आपरेशन में भी तकनीक के बजाय लोकल खुफिया सपोर्ट का अहम रोल रहा. स्थानीय पुलिस को मुखबिर से मिली सूचना और पुलिस तक पहुंची रिपोर्ट में समानता होने के कारण ऑपरेशन लांच करना तय किया गया. जवान ऑपरेशन के लिए देर रात ग्रामीणों की नजरों से बचते हुए उस जगह तक जल्दी पहुंचने में कामयाब हुए जहां माओवादियों की मौजूदगी थी.
इस एनकाउंटर की गूंज राजनीतिक गलियारों में भी सुनाई पड़ी. पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पहले इसे लेकर संदेह जताया लेकिन बाद में जवानों की बहादुरी की प्रशंसा की. बघेल ने 17 अप्रैल को कहा, '' हमारी सरकार में फर्जी एनकाउंटर नहीं हुए, मौजूदा सरकार में फर्जी एनकाउंटर में बढ़ोतरी हुई है.'' हालांकि शाम होते-होते पूर्व मुख्यमंत्री अपने बयान से पलट गए. फिर उनका कहना था, ''29 माआवोदी मारे गए यह बड़ी घटना है. 5 साल में हमारी सरकार के दौरान जो नीति रही है, उससे सफलता मिली है.'' हालांकि इस घटना को लेकर अब तक किसी मानवाधिकार संगठन ने संदेह नहीं जताया है. वहीं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा है, '' नक्सलियों के सामने शांति वार्ता का प्रस्ताव खुला है, अगर माओवादी वार्ता के लिए तैयार हों तो उनके साथ न्याय किया जाएगा.''
इस एनकाउंटर के बाद सुरक्षाबलों के हौसले बुलंद हैं लेकिन सतर्कता की चिंता भी है. जब-जब माओवादियों को बड़ा नुकसान होता है, उसके बाद वे अपने कैडर का मनोबल बढ़ाने के लिए आईईडी ब्लास्ट, सड़क निर्माण की गाड़ियों को आग लगाने जैसी वारदातों को अंजाम देते हैं. बस्तर संभाग में माओवादियों पर बढ़ते दबाव के कारण दुर्ग संभाग के मोहला-मानपुर, राजनांदगांव और कवर्धा जैसे कम संवेदनशील जिलों में भी माओवादी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं, यह सुरक्षाबलों को और सतर्क रहने का स्पष्ट संकेत है.

