scorecardresearch

पुणे में कस्बा गणपति के 'सदियों पुराने' सिंदूर पर रिसर्च क्यों की जा रही है?

पिछले महीने कस्बा गणपति की प्रतिमा से करीब 900 किलो मोटी सिंदूर की परत को वैज्ञानिक तरीके से हटाया गया, जिससे प्रतिमा अपने मूल रूप में प्रकट हुई

कस्बा गणपति की तस्वीर
कस्बा गणपति की तस्वीर
अपडेटेड 15 जनवरी , 2026

पुणे के ऐतिहासिक कस्बा गणपति मंदिर से हटाई गई सिंदूर की परतों का अब पुरातत्व विभाग और डेक्कन कॉलेज एक शोध या विश्लेषण करने जा रहा है. मंदिर के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है.

इस सिंदूर पर रिसर्च के जरिए एक्सपर्ट्स को इस मंदिर की सदियों पुरानी प्रचलित धार्मिक प्रथाओं के बारे में जानकारी हासिल करने में मदद मिलेगी. 15 दिसंबर से मंदिर को दो सप्ताह के लिए बंद कर दिया गया था, ताकि वैज्ञानिक तरीके से सिंदूर हटाया जा सके.

मूर्ति से लगभग 900 किलो सिंदूर निकाला गया है. सिंदूर हटाए जाने के बाद मूर्ति अपने मूल स्वरूप में सामने आई. करीब दो फीट ऊंची इस गणपति प्रतिमा में चार हाथ हैं और सूंड बाईं ओर है.

एक अधिकारी ने कहा, "मूर्तिकला को देखने से ऐसा लगता है कि यह मूर्ति 15वीं-16वीं शताब्दी की हो सकती है. यह भी संभव है कि यह मूर्ति शिवपूर्वकाल यानी छत्रपति शिवाजी महाराज से पहले के युग की हो सकती है." कस्बा गणपति को पुणे का ग्रामदेवता माना जाता है. यहां के लोगों के बीच ऐसी मान्यता है कि भगवान गणेश की यह मूर्ति स्वयं प्रकट हुई है.

ऐसा माना जाता है कि इस मूर्ति की स्थापना छत्रपति शिवाजी महाराज की मां राजमाता जीजाबाई ने लगभग 1636 में करवाई थी. कस्बा गणपति को गणेश उत्सव के दौरान भगवान की पांच 'मनाचे गणपति' मूर्तियों में से पहली मूर्ति होने का गौरव प्राप्त है. इसका अर्थ है कि पुणे में उत्सव के अंत में यहां स्थापित मूर्ति को सबसे पहले जल विसर्जित किया जाता है. शहर में गणेश उत्सव की शुरुआत 1893-94 में हुई थी.

कस्बा गणपति की मूर्ति पर सप्ताह में कम से कम दो बार सिंदूर लगाया जाता है और एक अनुमान के मुताबिक एक बार में लगभग 100 ग्राम सिंदूर लगाया जाता है. महाराष्ट्र के पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय के अधिकारियों ने बताया कि इसी वजह से दशकों से मूर्ति पर सिंदूर की परतें जमा होती जा रही हैं.

पुणे के कस्बा पेठ में स्थित इस मंदिर का पुनर्निर्माण भगवान गणेश के भक्त पेशवाओं के शासनकाल में हुआ था, लेकिन संभवतः तब भी मूर्ति पर लगे सिंदूर की परतें नहीं हटाई गई थीं. सदियों से इसी कारण मूल मूर्ति पर सिंदूर की मोटी परतें चढ़ गई हैं.

दिसंबर में सिंदूर की निचली परतें गलने लगीं और चूर्ण के रूप में गिरने लगीं, जिसके बाद मंदिर अधिकारियों ने पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय, पुणे स्थित दक्कन कॉलेज स्नातकोत्तर एवं अनुसंधान संस्थान और स्वतंत्र विशेषज्ञों से इस संदर्भ में मार्गदर्शन मांगा कि इसका क्या करना चाहिए. इसके बाद सिंदूर हटाने का काम शुरू हुआ.

निकाले गए सिंदूर का विश्लेषण दक्कन कॉलेज में किया जाएगा. पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय के सहायक निदेशक विलास वाहाने ने कहा, “हम सिंदूर की विभिन्न परतों की सामग्री का विश्लेषण करने की योजना बना रहे हैं. इससे इसकी सामग्री का अंदाजा लग सकेगा.”

सिंदूर की प्रत्येक परत के विश्लेषण से उसकी संरचना और स्वरूप का पता चलेगा. साथ ही यह भी कि सदियों से भगवान की पूजा में सिंदूर के अलावा किन सामग्रियों का उपयोग किया जाता रहा है. इन विवरणों को लिखित सबूत के तौर पर रखा जाएगा. हालांकि, निदेशालय ने मंदिर ट्रस्ट से आग्रह किया है कि वे हर दो साल में गणपति की मूर्ति से जमा हुआ सिंदूर साफ करें.

Advertisement
Advertisement