दरभंगा के सांसद गोपालजी ठाकुर ने 24 मई को सोशल मीडिया पर केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी का एक पत्र शेयर किया. इसमें जयंत चौधरी ने उन्हें बताया था, “केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने अवगत कराया है कि बोर्ड द्वारा शैक्षणिक सत्र 2026-27 से माध्यमिक स्तर पर CBSE पाठ्यक्रम में मैथिली भाषा को सम्मिलित किया गया है.”
इस फैसले को गोपालजी ठाकुर ने मैथिली भाषा के लिए बड़ी उपलब्धि बताया. इसके बाद सत्ता पक्ष के राजनेताओं में इस फैसले को लेकर पीएम मोदी और केंद्र सरकार का आभार जताने की होड़ लग गई. बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए लिखा, “मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और मातृभाषा मैथिली को शिक्षा व्यवस्था में सशक्त स्थान दिलाने की दिशा में लिया गया यह निर्णय ऐतिहासिक एवं अत्यंत स्वागतयोग्य है.”
मिथिला क्षेत्र के कई जनप्रतिनिधियों ने भी इसी तरह की पोस्ट लिखीं. मगर जहां सत्ता पक्ष के राजनेताओं में इस फैसले को लेकर अत्यधिक उत्साह नजर आया, वहीं मिथिला के आम लोगों और मैथिली भाषा के लिए कई वर्षों से संघर्ष करने वालों में इस फैसले को लेकर वैसा उत्साह नजर नहीं आया.
इस उदासीनता को सोशल मीडिया यूजर उदय नारायण झा की इस पोस्ट के जरिए समझा जा सकता है. उन्होंने लिखा, “तीन दिनों से खूब चर्चा हो रही है कि मैथिली को CBSE के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है और इसके लिए धन्यवाद का दौर चल रहा है. लेकिन आपको जानना चाहिए कि इस फैसले के तहत मैथिली को वैकल्पिक विषय के तौर पर रखा गया है, यह अनिवार्य विषय नहीं है. मैथिली ही नहीं, संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं को इस श्रेणी में रखा गया है. यह कोई खास उपलब्धि नहीं है.”
दरअसल मैथिली मिथिला क्षेत्र की भाषा है और इसे बिहार के साथ नेपाल के बड़े इलाके में भी बोला, लिखा और पढ़ा जाता है. 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में 1.35 करोड़ लोग मैथिली भाषी हैं. इस भाषा का इतिहास काफी पुराना माना जाता है. विद्यापति इस भाषा के आदिकवि माने जाते हैं. अब तक उपलब्ध जानकारी के मुताबिक ज्योतिरीश्वर ठाकुर ने 14वीं सदी में इस भाषा की पहली गद्य पुस्तक ‘वर्ण रत्नाकर’ लिखी थी. 2003 में इस भाषा को संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल कर भारतीय भाषा के रूप में मान्यता दी गई. इसकी अपनी लिपि भी है, जिसे तिरहुता लिपि कहा जाता है.
पिछली सदी के शुरुआती वर्षों तक मैथिली भाषा में साहित्य रचना के साथ-साथ सरकारी कामकाज भी हुआ करता था. मगर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी के आह्वान पर जब हिंदी को मजबूत करने का अभियान चला तो मैथिली भाषी समाज ने हिंदी को अपनाया. इसकी वजह से मैथिली भाषा की स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होती गई और इसकी छवि हिंदी की एक बोली जैसी बन गई. हालांकि बाद के वर्षों में मैथिली भाषियों ने संघर्ष कर इसे स्वतंत्र भाषा का दर्जा दिलाया. आज भी मैथिली भाषा को आगे बढ़ाने के लिए लगातार अभियान चलाए जाते हैं.
ऐसे में जब CBSE बोर्ड ने मैथिली भाषा को अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया तो राजनेताओं ने इसे बड़ी उपलब्धि माना. मगर इस भाषा के पैरोकारों का कहना है कि संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल होने की वजह से मैथिली को यह अधिकार काफी पहले ही मिल जाना चाहिए था. देर से हुआ यह फैसला स्वागत योग्य तो है मगर इसे कोई बड़ी उपलब्धि नहीं माना जा सकता.
राजधानी पटना में मैथिली भाषा के उत्थान के लिए काम करने वाली प्रमुख संस्था चेतना समिति के उपाध्यक्ष उमेश मिश्र कहते हैं, “मैथिली बिहार राज्य की इकलौती ऐसी भाषा है, जिसे संविधान ने मान्यता दी है. ऐसे में हम लगातार यह मांग करते रहे हैं कि बिहार सरकार मैथिली को राज्य के स्कूलों में भाषा और माध्यम दोनों के रूप में लागू करे. मगर बिहार सरकार ने अब तक हमारी मांग नहीं मानी है. असल मांग तो इस भाषा को प्राथमिक शिक्षा का माध्यम बनाने की है. अभी तो इसे विषय के रूप में भी नहीं पढ़ाया जा रहा है. इसके साथ ही बिहार के सरकारी दफ्तरों में, खासकर ग्रामीण इलाकों के कार्यालयों में, इसे राजकाज की भाषा के रूप में अपनाया जाना चाहिए. इसी तरह मैथिली भाषा की पत्र-पत्रिकाओं को सरकार का जनसंपर्क विभाग मान्यता नहीं देता. जब तक यह बाजार और कामकाज की भाषा नहीं बनेगी, तब तक इसके संवैधानिक महत्व का क्या मतलब है?”
जैसा उमेश मिश्र कहते हैं, मैथिली भाषा के दूसरे जानकार भी कमोबेश वैसी ही राय रखते हैं. उनका मानना है कि मैथिली को 2003 में संवैधानिक मान्यता तो मिल गई मगर उससे जुड़े दूसरे अधिकार देने में लगातार टालमटोल की जाती रही है.
हालांकि इसके साथ सवाल यह भी है कि अगर मैथिली को स्कूलों में भाषा या माध्यम के रूप में स्वीकार कर लिया जाए, तो क्या मिथिला के लोग अपने बच्चों को इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित करेंगे? उमेश मिश्र कहते हैं, “आजादी के बाद मैथिली एक विषय के तौर पर स्कूलों में पढ़ाई जाती थी. हमने खुद 1968 तक स्कूलों में इसे पढ़ा है. बाद के वर्षों में किसी वजह से इसे बंद कर दिया गया और तब से यह बंद ही है.”
वहीं मैथिली भाषा के लेखक एवं जेएनयू में प्रोफेसर देवशंकर नवीन कहते हैं, “मैथिली के साथ अब तक सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा है कि इस भाषा में बाल शिक्षा नहीं हो सकी. हम लोग जब दसवीं कक्षा में पहुंचे, तब पहली बार किसी छपी हुई किताब में मैथिली देखने का मौका मिला. इसलिए इस पहल को एक शुभ शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए. लेकिन इस शुरुआत में इतनी देरी हो गई है कि मैथिल समाज अब इस भाषा से काफी दूर चला गया है. मैथिली के मूल शब्द और क्रियापद भी लगातार विलुप्त हो रहे हैं. ऐसे में इस पहल को लेकर मिथिला समाज कितना उत्साह दिखाएगा, यह कहना मुश्किल है.”
देवशंकर नवीन की चिंता जायज है, मगर हाल के दशकों में मैथिली में भाषाई एक्टिविज्म बढ़ा है. ऐसे में इस खबर के आने से पहले ही मिथिला के कुछ एक्टिविस्टों ने बिहार के CBSE स्कूलों को प्रेरित करना शुरू कर दिया था कि वे अपने यहां तीसरी भाषा के रूप में मैथिली को शामिल करें और इसकी स्वीकृति के लिए CBSE बोर्ड को प्रस्ताव भेजें. ऐसे ही एक बड़े अभियान से जुड़े मैथिली भाषा के साहित्यकार एवं एक्टिविस्ट किसलय कृष्ण कहते हैं, “दरअसल सांसद महोदय को भले ही 24 मई को इसकी जानकारी मिली हो, मगर CBSE ने इस संबंध में 19-20 अप्रैल को ही पत्र जारी कर दिया था. हम लोग तभी से इस दिशा में सक्रिय हैं. 26 अप्रैल से मैथिली लिंग्विस्टिक रिसर्च काउंसिल नामक संस्था के तहत मिथिला क्षेत्र में लगातार घूमकर CBSE से मान्यता प्राप्त स्कूलों से संपर्क किया जा रहा है, क्योंकि उन्हें 31 मई तक इस संबंध में सूचना भेजनी है. हमारे प्रयास से अब तक लगभग 40 स्कूल अपनी मांग भेज चुके हैं.”

