“निशांत-प्रशांत, मैं और नीतीश बाबू. यह पहेली मैं आपके सामने रख रहा हूं कि हम चारों में क्या एकरूपता है?” नीतीश कुमार और खुद को एक बताने के 12 दिन के बाद आरसीपी सिंह (रामचंद्र प्रसाद सिंह) ने जब यह पहेली पत्रकारों के सामने रखी तो वे बुझौव्वल कम खेल रहे थे, अपनी आगामी राजनीतिक योजना को ज्यादा जाहिर कर रहे थे.
उनकी इस टिप्पणी के बाद यह लगभग साफ था कि वे और जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर अब JDU में एंट्री की योजना बना रहे हैं और नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के राजनीतिक मार्गदर्शक के रूप में अपनी भूमिका तलाश रहे हैं.
बिहार विधानसभा चुनाव में असफलता के बाद जिस तरह प्रशांत किशोर के नई राह तलाशने की खबरें सामने आने लगी हैं. उसमें यह नया पॉलिटिकल डेवलपमेंट है. इससे पहले खबर आई थी कि वे प्रियंका गांधी के जरिये कांग्रेस के साथ जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं. तब यूपी चुनाव में कांग्रेस की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं उठी थीं. मगर इन दिनों बिहार चुनाव में यह नई चर्चा है कि क्या प्रशांत किशोर अब आरसीपी सिंह के जरिये JDU में अपनी राह तलाश रहे हैं.
दरअसल ऐसी कोशिशें आरपीसी सिंह पिछले एक पखवाड़े से कर रहे हैं. 11 जनवरी को पटेल-कुर्मी समाज के मकर संक्रांति भोज के मौके पर उन्होंने पहली बार नीतीश को लेकर अपने बदले विचार जाहिर किए थे. तब उस आयोजन में नीतीश कुमार भी पहुंचे थे. वहां नीतीश को लेकर पत्रकारों के सवाल पर उन्होंने कहा था, “आपको कहां से लगता है कि हम लोग दो हैं, हम लोग तो एक ही हैं. हम उनके साथ 25 वर्षों तक रहे. जितना हम उनको जानते हैं, कोई और जानता है क्या!”
तब से ऐसी खबरें आने लगी थीं कि आरसीपी सिंह अब JDU में घरवापसी चाहते हैं. मीडिया में उसके बाद से लिखा जाने लगा कि वे नीतीश कुमार के बेटे निशांत के लिए उसी तरह की भूमिका निभा सकते हैं, जो काम बैरम खान ने अकबर के लिए किया गया था यानी राजनीतिक मार्गदर्शक का. उस वक्त तक यह जाहिर नहीं था कि वे अपने साथ प्रशांत किशोर की भी एंट्री के लिए प्रयासरत हैं.
यह सच है कि राजस्व सेवा के अधिकारी रह चुके आरसीपी सिंह एक जमाने में नीतीश के काफी करीब रहे हैं. जब नीतीश कुमार केंद्र सरकार में मंत्री थे तब वे एक लंबे अरसे तक उनके निजी सचिव रहे, उनके विभाग में उन्होंने प्रधान सचिव की भी भूमिका निभाई. 2010 में उन्होंने स्वैच्छिक अवकाश ले लिया और JDU में शामिल हो गए. फिर नीतीश कुमार ने उन्हें राज्यसभा भेजा. धीरे-धीरे आरसीपी सिंह JDU में महत्वपूर्ण होते गए. 2015 और 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने ही पार्टी की कमान संभाली थी. उसके बाद उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बनाया गया.
आरसीपी और नीतीश की इस निकटता की बड़ी वजह यह भी मानी जाती है कि वे नीतीश के स्वजातीय (कुर्मी) हैं और उनके गृह जिला नालंदा के रहने वाले हैं. आरसीपी की सांगठनिक क्षमता बेहतरीन मानी जाती है और पार्टी के संगठन को पहली बार उन्होंने ही औपचारिक रूप दिया था. उनके पार्टी छोड़ने के बाद भी उनकी बनाई व्यवस्था ही JDU में काम कर रही है.
हालांकि 2022 आते-आते नीतीश और आरसीपी के संबंध खराब होने लगे. इसकी वजह यह बताई जाती है कि उन्होंने नीतीश की इच्छा के बिना केंद्र सरकार में मंत्री का पद स्वीकार कर लिया था. बाद में संबंध इतने बिगड़े की आरसीपी को JDU छोड़ना पड़ा. फिर कुछ दिनों के लिए वे BJP में चले गए और बाद में उन्होंने अपनी पार्टी ‘आप सबकी आवाज’ बनाई और मई, 2025 में उन्होंने पार्टी का विलय जन सुराज में कर दिया.
कहा जा रहा है कि JDU की कोर वोटर मानी जाने वाली कुर्मी बिरादरी आरसीपी की JDU में वापसी चाहती है. इस जाति और पटेलों के संगठन से जुड़े कई लोग लगातार इसके लिए अभियान चला रहे हैं और सोशल मीडिया पर टिप्पणी कर रहे हैं. मगर आरसीपी की घर वापसी में सबसे बड़ी बाधा JDU के पूर्व अध्यक्ष ललन सिंह हैं.
पिछले दिनों जब पत्रकारों ने ललन सिंह से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, “कुछ लोगों ने पार्टी को 72 सीटों से 42 पर पहुंचा दिया था मगर JDU के कार्यकर्ताओं औऱ बिहार की जनता ने नीतीश कुमार को फिर से 42 से 85 पर पहुंचा दिया है. अब ऐसे लोगों की नीतीश कुमार को कोई जरूरत नहीं है.” उनका इशारा आरसीपी की तरफ था. वहीं जब ललन सिंह से प्रशांत किशोर के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, “कौन प्रशांत किशोर? वही जो नीतीश कुमार को फिनिश करने की बात करता था. वही, जिसने कहा था कि अगर JDU को 25 सीटों से अधिक आ जाएगा तो राजनीति छोड़ देगा. हम लोगों को तो 85 सीटें आ गईं, क्या अभी भी वह आदमी पॉलिटिक्स कर रहा है?”
नीतीश कुमार के करीबी माने जाने वाले ललन सिंह की ये तल्ख टिप्पणियां जाहिर करती हैं कि वे आरसीपी या प्रशांत किशोर की JDU में वापसी के सख्त खिलाफ हैं. ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि क्या नीतीश चाह कर भी अपने करीबी ललन सिंह की राय की अनदेखी कर आरपीसी की फिर से पार्टी में वापसी करा पाएंगे? खास कर तब जब इस बयान के दो दिन बाद नीतीश खुद ललन सिंह से मिलने उनके आवास पर पहुंच गए थे. माना जाता है कि इस मुद्दे पर वे ललन सिंह से अपनी राय जाहिर करने वहां पहुंचे थे.
आरसीपी का विरोध सिर्फ ललन सिंह ही नहीं कर रहे. JDU में नालंदा और कुर्मी कैंप के नेता माने जाने वाले मंत्री श्रवण कुमार और नालंदा के सांसद कौशलेंद्र भी आरसीपी की JDU में संभावित एंट्री का विरोध कर रहे हैं. श्रवण कुमार कहते हैं, “पार्टी में एंट्री देना तो बड़े नेताओं का काम है, मगर जिस व्यक्ति ने JDU को 25 से अधिक सीटें मिलने पर संन्यास लेने की बात कही थी, उसके और उसकी पार्टी के लोगों की JDU में क्या जरूरत है?”
इन विरोधी प्रतिक्रियाओं के जवाब में आरसीपी सिंह यह बात जरूर कहते हैं, “सरस्वती अगर किसी की जिह्वा पर बैठ जाए तो इतिहास बदल जाता है. इसलिए मैं सार्वजनिक जीवन में सक्रिय सभी लोगों से कहना चाहता हूं कि तीखी से तीखी बात को मधुर भाषा में बोलें.” मगर उनकी यह विनम्रता उनके नए राजनीतिक मिशन को सफलता दिला पाएगी यह आने वाले दिनों में देखने वाली बात होगी.

