लोकसभा 2024 के नतीजे आने के बाद से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बीजेपी में बड़ी पूछ है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नतीजे आने के बाद अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए नीतीश कुमार को बिहार में 'बड़ा भाई' घोषित कर दिया. बिहार में बीजेपी के सुर पूरी तरह से बदले हुए हैं और लग रहा है कि नीतीश का नेतृत्व पार्टी ने स्वीकार कर लिया है.
ऐसे में बिहार में समय से पहले विधानसभा चुनाव होने की बात चलने लगी है. लेकिन जब एक साल में राज्य में विधानसभा चुनाव होने ही हैं तो फिर अभी क्यों? इसके अलावा यह जानना भी जरूरी हो जाता है कि अगर अभी बिहार में चुनाव हुए तो किस पार्टी को सबसे ज्यादा फायदा होगा और खुद नीतीश कुमार इस बारे में क्या सोचते हैं.
हाल ही में बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मीडिया से बातचीत में नीतीश कुमार के नेतृत्व को बीजेपी के समर्थन की बात कही. उन्होंने कहा, "हम 1996 से नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ रहे हैं और आगे भी लड़ते रहेंगे. और इसमें दिक्कत क्या है?" दिलचस्प है कि सम्राट चौधरी का बयान इसी साल फरवरी में उनके तरफ से दिए गए उस बयान से ठीक उलट है जिसमें उन्होंने कहा था कि बीजेपी एक दिन बिहार में स्वतंत्र रूप से शासन करेगी.
यह बदलती बयानबाजी बीजेपी के उस व्यावहारिक नजरिए को दिखाती है, जो न केवल बिहार में बल्कि केंद्र में भी एक स्थिर गठबंधन के लिए नीतीश को अपने साथ रखने की जरूरत को पहचानती है. बीजेपी के रुख में यह बदलाव लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद आया जिसमें पार्टी को साधारण बहुमत भी नसीब नहीं हुई. नीतीश की पार्टी जदयू के 12 सांसद अब पार्टी के लिए केंद्र की सत्ता में बने रहने के लिए जरूरी हो गए हैं. चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के बाद एनडीए की दूसरा सबसे महत्वपूर्ण घटक अब जदयू हो गई है.
मोलभाव में माहिर नीतीश को अपनी स्थिति का फायदा उठाकर काम बनाना बखूबी आता है. समय से पहले विधानसभा चुनाव करवाने की बात ने पटना में तब जोर पकड़ा जब जेडीयू को मोदी कैबिनेट में सिर्फ एक कैबिनेट और एक राज्य मंत्री का पद मिला. दोनों मंत्रियों को मिले विभाग भी कुछ खास नहीं थे.
इंडिया टुडे की रिपोर्ट में अमिताभ श्रीवास्तव लिखते हैं, "दरअसल भाजपा भी अपनी दीर्घकालिक आकांक्षाओं और तात्कालिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाती दिख रही है. सम्राट चौधरी और भाजपा के अन्य लोगों के लिए, नीतीश के साथ बने रहना चुनावी किस्मत को सुरक्षित रखने के लिए एक रणनीतिक कदम है जो इस कठोर वास्तविकता को रेखांकित करता है कि राजनीति में सिर्फ आप ही नहीं बल्कि परिस्थितियों की मांग मायने रखती है."
समय से पहले बिहार में विधानसभा चुनाव करवाने वाली बात पर अमिताभ बताते हैं कि जेडीयू या बीजेपी नेताओं की ओर से इस बारे में कोई औपचारिक बयान नहीं आया है, लेकिन चर्चा है कि बिहार में समय से पहले विधानसभा चुनाव हो सकते हैं. जेडीयू के एक वरिष्ठ नेता का कहना है, "मुख्यमंत्री ने केंद्र से कुछ बड़ा पाने के बदले में कम पदों पर समझौता किया हो, ऐसा मुमकिन है." यह राज्य के लिए विशेष पैकेज, समय से पहले विधानसभा चुनाव या दोनों हो सकता है.
जदयू नेता के मुताबिक, "जब जनवरी में नीतीश बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए में फिर से शामिल हुए, तो पार्टी के भीतर सुझाव थे कि वे बिहार विधानसभा चुनावों को आगामी लोकसभा चुनावों के साथ जोड़ना चाहते हैं. हालांकि बीजेपी की हिचकिचाहट के कारण ऐसा नहीं हो सका, लेकिन मुख्यमंत्री अब झारखंड के साथ एक साथ चुनाव कराने के लिए मजबूत स्थिति में हैं, जहां नवंबर में चुनाव होने हैं."
अमिताभ श्रीवास्तव ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि समय से पहले चुनाव करवाने से क्या परिणाम सामने आ सकते हैं. दरअसल इससे जेडीयू के लिए कई उद्देश्य पूरे हो सकते हैं. सबसे पहले, पार्टी एक बार फिर बिहार में ‘बड़ा भाई’ बन जाएगी और बीजेपी से ज्यादा सीटें जीतेगी. लोकसभा चुनाव में नीतीश को बीजेपी से एक सीट कम पर चुनाव लड़ना पड़ा था.
दूसरा, बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के साथ नीतीश की नई-नई बढ़ी हुई ताकत के कारण, बीजेपी और चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) दोनों के ही नीतीश के साथ तालमेल बिठाने और नेतृत्व की भूमिका में आने की उम्मीद है. 2020 के विधानसभा चुनावों में, चिराग ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा था और उन्हें एनडीए के वोटों को बांटकर कम से कम एक दर्जन जेडीयू उम्मीदवारों को हराने वाले के रूप में देखा गया था. अब केंद्रीय मंत्री चिराग ऐसा कोई जोखिम नहीं उठा सकते.
राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण यह है कि राजद के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के पास संख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण कुशवाहा समुदाय के बीच अपनी नई-नई पकड़ को मजबूत करने के लिए कम समय होगा. भले ही आरजेडी बिहार में 23 लोकसभा सीटों में से केवल चार पर ही जीत हासिल कर सकी, लेकिन पार्टी को 22.14 प्रतिशत वोट मिले, जो राज्य में सभी राजनीतिक दलों में सबसे ज्यादा थे.
अमिताभ आंकड़ों की बात समझाते हुए लिखते हैं, "दरअसल, बीजेपी का वोट शेयर 2019 के लोकसभा चुनावों में 23.6 प्रतिशत से गिरकर 2024 में 20.5 प्रतिशत रह गया, जबकि जेडीयू का वोट शेयर 21.8 प्रतिशत से गिरकर 18.5 प्रतिशत रह गया. इसके उलट, आरजेडी का वोट शेयर 2019 के पिछले लोकसभा चुनाव में 15.4 प्रतिशत से बढ़कर अब 22.1 प्रतिशत हो गया है. जेडीयू के कुछ अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि पहले विधानसभा चुनाव होने से तेजस्वी यादव और उनकी आरजेडी को बिहार में एनडीए के लिए बड़ा चुनावी खतरा बनने से रोका जा सकता है."
निर्धारित समय से पहले चुनाव करवाने के बारे में बीजेपी और जेडीयू की तरफ से फिलहाल तो कोई बयान नहीं आया है, लेकिन तेजस्वी ने विधानसभा चुनावों को लोकसभा चुनावों के साथ कराने के नीतीश के विचार को मुखरता से उठाया है. अब विकासशील इंसान पार्टी के संस्थापक और आरजेडी गठबंधन के सहयोगी मुकेश सहनी ने भी इसी बात को दोहराया और कहा कि विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं, लेकिन नीतीश इस साल चुनाव कराने की कोशिश कर सकते हैं.

