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यूपी के उद्योग विभाग का भ्रष्टाचार कैसे सामने आया?

फर्जी अनुभव प्रमाण पत्रों पर करोड़ों के ठेके, अपात्र आवेदकों को प्लॉट आवंटन और रिस्की लोन जैसे कई मामलों पर CAG ने यूपी के उद्योग विभाग में भ्रष्टाचार को उजागर किया है

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सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 23 फ़रवरी , 2026

उत्तर प्रदेश विधानसभा में 19 फरवरी को पेश हुई भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की ताज़ा रिपोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (UPSIDA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. औद्योगिक विकास, निवेश आकर्षण और रोजगार सृजन के बड़े दावों के बीच यह रिपोर्ट बताती है कि 2017-18 से 2021-22 की अवधि में प्राधिकरण के भीतर प्रक्रियागत ढील, वित्तीय अनियमितताएं और निर्णय लेने में पारदर्शिता की कमी किस तरह जड़ें जमाए रही.

रिपोर्ट का सबसे गंभीर पहलू ठेकों और औद्योगिक भूखंडों के आवंटन से जुड़ा है. ऑडिट में सामने आया कि 255.75 करोड़ रुपए के विकास कार्य दो निजी कंपनियों को ऐसे अनुभव प्रमाण पत्रों के आधार पर दे दिए गए जिनका सत्यापन नहीं किया गया. बाद में ये प्रमाण पत्र संदिग्ध पाए गए और कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने पड़े. 143.22 करोड़ रुपए के 13 कॉन्ट्रैक्ट और 112.53 करोड़ रुपए के दो कॉन्ट्रैक्ट बिना विधिवत जांच के दिए गए थे. एफआईआर दर्ज होने के बावजूद वसूली सीमित रही और जिम्मेदार अधिकारियों पर ठोस कार्रवाई का अभाव भी रिपोर्ट में रेखांकित किया गया. 

CAG ने यह भी दर्ज किया कि 1.01 करोड़ से 63.41 करोड़ रुपए के बीच के 27 कॉन्ट्रैक्ट ऐसे ठेकेदारों को दे दिए गए जिनकी बोली क्षमता और वित्तीय सामर्थ्य का आकलन नहीं किया गया. नतीजा यह हुआ कि कई परियोजनाएं वर्षों तक अधूरी रहीं. 61 दिन से लेकर 2,600 दिन से अधिक की देरी दर्ज की गई. 14 परियोजनाएं मार्च 2024 तक लंबित थीं. इससे न केवल लागत बढ़ी बल्कि औद्योगिक क्षेत्रों के विकास की रफ्तार भी थमी.

रिपोर्ट में “लिक्विडेटेड डैमेज क्लॉज” को लेकर भी सवाल उठे. यूपी लोक निर्माण विभाग यानी पीडब्ल्यूडी की तुलना में नरम शर्तें लागू की गईं, जिसके कारण अधिकतम 10 प्रतिशत तक वसूली की जगह सिर्फ एक प्रतिशत तक की ही कटौती संभव हो सकी. इससे राजस्व को नुकसान पहुंचा. वित्तीय अनुशासन की स्थिति भी चिंताजनक पाई गई. यूपी सरकार से 41 करोड़ और नोएडा से 450 करोड़ रुपए के ऋण, दो सरकारी कंपनियों को 52.84 करोड़ रुपए के असुरक्षित ऋण, 57.23 करोड़ रुपए की सावधि जमा का समुचित रजिस्टर न होना और आयकर में छूट का लाभ न लेकर 184.43 करोड़ रुपए का भुगतान, ये सब आंतरिक नियंत्रण तंत्र की कमजोरी की ओर इशारा करते हैं; समय पर टीडीएस रिफंड का दावा न करने से 60.33 करोड़ रुपए का नुकसान अलग से हुआ.

औद्योगिक भूखंडों के आवंटन में भी नियमों की अनदेखी सामने आई. कई मामलों में इंटरव्यू कमेटी और प्रोजेक्ट इवैल्यूएशन कमेटी के रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराए गए. कुछ आवेदकों की वार्षिक आय लाखों में थी जबकि प्रस्तावित परियोजनाओं की लागत दर्जनों करोड़ रुपए बताई गई. इसके बावजूद भूखंड आवंटित कर दिए गए. कोसी कोटवान और मथुरा औद्योगिक क्षेत्र-बी जैसे उदाहरणों में अधूरे आवेदन और अपर्याप्त वित्तीय क्षमता के बावजूद सिफारिशें की गईं. कुछ मामलों में आरक्षित धनराशि समय पर जमा नहीं हुई, फिर भी आवंटन रद्द करने में ढिलाई बरती गई. कानपुर देहात के जैनपुर औद्योगिक क्षेत्र में एक भूखंड अपात्र आवेदक को दिया गया जबकि मूल्यांकन के आधार पर वह अन्य पात्र संस्था को मिलना चाहिए था.

ई-नीलामी में पांच प्रतिशत वृद्धि लागू न करने से कम वसूली का मामला भी सामने आया. 37 मामलों में पूर्णता प्रमाण पत्र जारी किए बिना उत्पादन शुरू होने की बात ऑडिट में दर्ज है, जो नियामकीय निगरानी की कमजोरी दर्शाती है. रिपोर्ट ने निवेश और रोजगार के दावों पर भी प्रश्नचिह्न लगाया. 2017-18 से 2021-22 के दौरान 322 करोड़ से 2,694 करोड़ रुपए निवेश और 35 हजार रोजगार सृजन के दावों को ऑडिट ने पुष्ट नहीं पाया. यह निष्कर्ष राजनीतिक रूप से संवेदनशील है क्योंकि औद्योगिक विकास मौजूदा सरकार की प्रमुख उपलब्धियों में गिना जाता रहा है. परफ्यूम पार्क, कन्नौज का उदाहरण भी गौर करने लायक है. 25 करोड़ की स्वीकृत राशि के स्थान पर 26 करोड़ रुपए जारी किए गए. मूल राशि वापस ली गई, लेकिन 1.48 करोड़ रुपए का ब्याज वसूल नहीं किया गया. अधिकार क्षेत्र से बाहर के औद्योगिक क्षेत्रों पर 7.67 करोड़ रुपए खर्च किए गए जिनकी वसूली नहीं हो सकी.

UPSIDA ने विधानसभा में पेश स्पष्टीकरण में कहा है कि जिन मामलों में अनियमितताएं पाई गईं, वहां कॉन्ट्रैक्ट निरस्त किए गए, एफआईआर दर्ज कराई गई और वसूली की कार्रवाई जारी है. प्राधिकरण के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “ऑडिट आपत्तियों को गंभीरता से लिया गया है. कई प्रक्रियाओं को अब डिजिटल और पारदर्शी बनाया गया है ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति न बने.” 

राज्य सरकार की ओर से भी कहा गया कि दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी और सिस्टम को दुरुस्त किया जा रहा है. विपक्ष ने इस रिपोर्ट को चुनावी साल में बड़ा मुद्दा बनाने के संकेत दिए हैं. समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता धर्मेंद्र सिंह ने कहा, “सरकार निवेश और रोजगार के बड़े दावे करती है, लेकिन CAG की रिपोर्ट बताती है कि जमीन पर तस्वीर अलग है. यह उद्योग नीति की पारदर्शिता पर सवाल है.” 

कांग्रेस नेताओं ने भी उच्चस्तरीय जांच की मांग की है और कहा है कि जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि औद्योगिक विकास की छवि पर चोट चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकती है. राजनीतिक विश्लेषक अभिनव सिंह बताते हैं, “चुनावी साल में प्रशासनिक जवाबदेही और भ्रष्टाचार के आरोप संवेदनशील मुद्दे बन जाते हैं. अगर विपक्ष इसे नौकरशाही और राजनीतिक संरक्षण के सवाल से जोड़ने में सफल होता है तो यह BJP के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है. दूसरी ओर, यदि सरकार दोषियों पर कार्रवाई, वसूली और प्रक्रियागत सुधार के ठोस उदाहरण सामने रखती है तो नुकसान सीमित भी रह सकता है.” 

इस पूरी रिपोर्ट का सार यह है कि औद्योगिक विकास की महत्वाकांक्षी योजनाओं के बीच संस्थागत पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन की बुनियाद मजबूत होना जरूरी है. वरना निवेश, रोजगार और विकास के दावे कागजों तक सीमित रह जाते हैं. चुनावी परिदृश्य में यह मुद्दा सिर्फ प्रशासनिक नहीं, राजनीतिक जवाबदेही का भी प्रश्न बन चुका है.

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