लखनऊ में 19 फरवरी की सुबह उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के राजभवन कालोनी स्थित सरकारी आवास का दृश्य सामान्य राजनीतिक कार्यक्रमों से अलग था. आंगन में वैदिक मंत्रोच्चार गूंज रहा था, 101 “बटुक ब्राह्मण” कतार में बैठे थे और पाठक अपनी पत्नी नम्रता के साथ एक-एक कर उनके माथे पर तिलक लगा रहे थे. मालाओं से स्वागत, पुष्प वर्षा, अंगवस्त्र भेंट और सामूहिक भोजन. सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा, “बटुकों का सम्मान, हमारा सौभाग्य… आज हमारे घर पर देव स्वरूप छोटे बटुका ब्राह्मणों ने अतिथि स्वरूप उपस्थित होकर हमारे घर की धरा भूमि को धन्य किया.”
यह आयोजन केवल धार्मिक सम्मान भर नहीं था. इसके पीछे हाल के हफ्तों की एक पूरी राजनीतिक पृष्ठभूमि थी, जिसकी शुरुआत 18 जनवरी को प्रयागराज के माघ मेले से हुई. मौनी अमावस्या के दिन ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के समर्थकों को कथित तौर पर त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाने से रोका गया. आरोप लगा कि पुलिस के साथ झड़प के दौरान कुछ युवा ब्राह्मण शिष्यों की “शिखा” या “चोटी” खींची गई. प्रशासन ने कानून व्यवस्था का हवाला दिया, लेकिन संत पक्ष ने इसे धार्मिक अपमान बताया.
इसी घटनाक्रम के बाद पाठक ने सार्वजनिक तौर पर तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा, “चोटी छूना पाप है, खींचना महापाप है. कानून व्यवस्था बनाए रखने के कई तरीके होते हैं, पर धार्मिक प्रतीकों का अपमान स्वीकार नहीं.” एक अन्य मौके पर उन्होंने कहा, “सिख की पगड़ी या मुस्लिम की दाढ़ी छूना पाप है, उसी तरह ब्राह्मण की शिखा भी आस्था का विषय है. पुलिस को संयम रखना चाहिए.” यह बयान सीधे तौर पर प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाता दिखा, हालांकि उन्होंने किसी अधिकारी का नाम नहीं लिया. यही वह बिंदु था जहां यह मामला साधु-संत बनाम पुलिस की बहस से आगे बढ़कर सत्ता के भीतर की संवेदनशील राजनीति तक पहुंच गया.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के बीच बयानबाजी पहले से चल रही थी. उन्होंने मुख्यमंत्री को 40 दिन का अल्टीमेटम देते हुए कहा कि उनकी मांगों पर कार्रवाई हो और “यह साबित करें कि वह हिंदू हैं.” बाद में उन्होंने याद दिलाया कि अल्टीमेटम के 20 दिन पूरे हो चुके हैं और 11 मार्च को “लखनऊ चलो” का आह्वान किया.
शंकराचार्य का बयान और भी तीखा था. उन्होंने कहा, “जब आदित्यनाथ जी विधानसभा में दूसरों से जवाब मांगते हैं, उन्हें पहले हमारी मांगों का जवाब देना चाहिए.” उन्होंने यह भी कहा कि “डिप्टी चीफ मिनिस्टर्स भाजपा की इज्जत बचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन एक अड़ियल आदमी के आगे उनकी कोशिशें भी फेल हो रही हैं.” यह सीधा राजनीतिक संकेत था कि विवाद अब केवल धार्मिक नहीं, सत्ता की प्रतिष्ठा से भी जुड़ चुका है.
ऐसे माहौल में पाठक का 101 बटुक ब्राह्मणों का सम्मान कार्यक्रम कई अर्थों में देखा गया. पहला, यह संदेश कि वे ब्राह्मण समुदाय की भावनाओं के साथ खड़े हैं. दूसरा यह कि वे प्रशासनिक सख्ती और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन की वकालत कर रहे हैं. इसके अलावा यह भी कि BJP के भीतर ब्राह्मण प्रतिनिधित्व की राजनीति फिर से उभर रही है. राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद पार्टी नेतृत्व ने सवर्ण, खासकर ब्राह्मण मतदाताओं के बीच संवाद बढ़ाने की जिम्मेदारी पाठक को दी थी. उन्हें ब्राह्मण विधायकों से सीधे बात कर उनकी शिकायतें सुनने का काम सौंपा गया.
पिछले कुछ महीनों में उनकी सक्रियता परशुराम सेना, ब्राह्मण सभा की महिला विंग और अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा जैसे संगठनों के कार्यक्रमों में बढ़ी है. इस पृष्ठभूमि में प्रयागराज की घटना ने एक अवसर और चुनौती दोनों पैदा की. विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि प्रदेश में ब्राह्मणों की अनदेखी हो रही है. पिछले साल कानपुर में मंत्री प्रतिभा शुक्ला ने थाने पर धरना देते हुए ब्राह्मणों के साथ भेदभाव का आरोप लगाया था और अप्रत्यक्ष रूप से पाठक की भूमिका पर भी सवाल उठाए थे. ऐसे आरोपों के बीच अगर संत समाज का एक बड़ा चेहरा सरकार से नाराज दिखे, तो उसका असर चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है.
पाठक ने हालांकि सावधानी बरती. उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद के अल्टीमेटम या मुख्यमंत्री से उनके टकराव पर सीधा बयान देने से परहेज किया. उनका फोकस पुलिस की संवेदनशीलता और धार्मिक प्रतीकों के सम्मान तक सीमित रहा. राजनीतिक विश्लेषक इसे एक सुविचारित संदेश मानते हैं. एक तरफ धार्मिक भावनाओं के पक्ष में खड़ा होना, दूसरी तरफ सरकार की छवि को नुकसान न पहुंचने देना. राजनीतिक विश्लेषक सुशील पांडेय बताते हैं कि वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव जैसे नजदीक आ रहे हैं राजनीतिक और सामाजिक समीकरण को साधने की कवायद तेज हुई है. ब्राह्मण मतदाता परंपरागत रूप से BJP के साथ रहे हैं, लेकिन समय-समय पर असंतोष की खबरें भी आती रही हैं. यदि संत समाज का एक प्रभावशाली वर्ग नाराज होता है, तो विपक्ष इसे मुद्दा बना सकता है.
इस बीच शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का रुख नरम नहीं हुआ है. उन्होंने अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग दोहराई है और चेतावनी दी है कि मांगें पूरी न होने पर लखनऊ में संतों की बैठक होगी. उनका “लखनऊ चलो” आह्वान सरकार के लिए प्रतीकात्मक दबाव बनाता है. हालांकि प्रशासनिक स्तर पर अब तक इस मामले में किसी बड़ी कार्रवाई की घोषणा नहीं हुई है.
पूरे घटनाक्रम का एक सांस्कृतिक आयाम भी है. शिखा, पगड़ी या दाढ़ी जैसे धार्मिक प्रतीकों को लेकर संवेदनशीलता का सवाल नया नहीं है. लेकिन जब यह सवाल चुनावी वर्ष की ओर बढ़ते प्रदेश में उठता है, तो उसका राजनीतिक अर्थ बढ़ जाता है. पाठक ने हाल ही में एक फिल्म की भी आलोचना की, जिसके शीर्षक में ब्राह्मणों को लेकर विवाद था. उन्होंने कहा कि फिल्म उद्योग भारतीय संस्कृति और खासकर ब्राह्मण समुदाय को निशाना बना रहा है. इस बयान ने उनके रुख को और स्पष्ट किया कि वे खुद को समुदाय की आवाज के रूप में स्थापित करना चाहते हैं. BJP के भीतर भी यह माना जाता है कि प्रदेश की राजनीति में सामाजिक संतुलन बनाए रखना आसान नहीं. ओबीसी, दलित, सवर्ण, सभी वर्गों को साधना पड़ता है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि मजबूत प्रशासक और हिंदुत्व के चेहरे की रही है, लेकिन पार्टी के भीतर अलग-अलग सामाजिक समूहों के प्रतिनिधियों की भूमिका भी अहम होती है. पाठक का हालिया रुख बताता है कि वह अपनी राजनीतिक जमीन को स्पष्ट रूप से चिह्नित कर रहे हैं.
आने वाले हफ्तों में नजर रहेगी कि स्वामी अविमुक्तरेश्वरानंद का 11 मार्च को लखनऊ चलो आह्वान कितना असर दिखाता है और सरकार किस तरह प्रतिक्रिया देती है? फिलहाल इतना साफ है कि माघ मेले की एक घटना ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण प्रतिनिधित्व, धार्मिक प्रतीक और सत्ता संतुलन के सवाल को फिर से केंद्र में ला दिया है. ब्रजेश पाठक का आयोजन इस बड़े राजनीतिक समीकरण का हिस्सा है, जिसमें आस्था, सम्मान और चुनावी रणनीति तीनों एक साथ चलते दिखाई दे रहे हैं.

