तमिलनाडु चुनाव में BJP को 234 सदस्यों वाली विधानसभा में सिर्फ एक सीट ही मिली. किसी भी अन्य परिस्थिति में इसे राज्य में BJP की चुनावी कमजोरी माना जाता. हालांकि, BJP को अपना वैचारिक दुश्मन बताने वाले विजय के शपथ ग्रहण समारोह में 10 मई को राज्य गीत टतमिल थाई वाझ्थु' (मां तमिल की स्तुति) से पहले 'वंदे मातरम्' बजाया गया.
मंच पर राज्य गीत से पहले बजता वंदे मातरम देखकर सब हैरान रह गए. इतना ही नहीं, नई सरकार की ओर से इस पर किसी ने माफी भी नहीं मांगी! तमिलनाडु में, जहां भाषा, द्रविड़ गर्व और सांस्कृतिक पहचान लंबे समय से राजनीति का आधार रही है, वहां यह कदम बड़ा राजनीतिक संकेत देता है.
सिर्फ एक विधायक और अपने कमजोर पड़ चुके गठबंधन के साथ BJP इन सभी घटनाक्रमों को बड़ी दिलचस्पी से देख रही थी. सरकार का समर्थन कर रही पार्टियों में से एक CPI ने इस पर औपचारिक आपत्ति जताई. पार्टी के राज्य सचिव एम. वीरापांडियन ने कहा कि तमिल थाई वाझ्थु को सबसे पहले स्थान मिलना चाहिए था. BJP ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की. उसे इसकी जरूरत भी नहीं थी.
इस 'वैचारिक समानता' को छोड़ दें तो चुनाव प्रचार के दौरान विजय और उनकी पार्टी तमिलगा वेट्री कजगम (TVK) ने BJP से अपने मतभेदों को स्पष्ट रूप से वैचारिक बताया था. विजय ने यहां तक कहा था, "BJP कहीं और जहर बो सकती है लेकिन हमारे तमिलनाडु में नहीं."
दिल्ली स्थित थिंक-टैंक काउंसिल फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक अंडरस्टैंडिंग के फेलो बनुचंदर नागराजन का तर्क है कि विजय एक नए तरह के द्रविड़ विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं. वह पारंपरिक तमिल प्रतीकों का इस्तेमाल कर युवा पीढ़ी को अपनी ओर लुभाने की कोशिश कर रहे हैं.
फिर भी BJP-RSS के लिए TVK का व्यापक राष्ट्रीय सांस्कृतिक ढांचे के को लेकर इस तरह का खुला रुख काफी चौंकाने वाला रहा. विजय ने एक और हैरान करने वाला कदम उठाते हुए शपथ ग्रहण के दौरान तमिलनाडु के नेताओं की पारंपरिक पोशाक वेष्टी के बजाय ब्लेज़र और ट्राउजर पहना.
विजय की राजनीति के पांच मुख्य सिद्धांत हैं- 1. पेरियार और ई.वी. रामासामी का सामाजिक न्याय 2. कामराज का ईमानदार प्रशासन 3. बी.आर. आंबेडकर का समान न्याय और समान अवसर 4. वेलु नचियार का सामाजिक समावेश व सांप्रदायिक सौहार्द 5. अंजलई अम्माल का जल व अन्य प्राकृतिक संसाधनों के लिए संघर्ष.
पारंपरिक DMK-AIADMK के द्रविड़ मॉडल, जो तर्कवाद, जाति-विरोधी आंदोलन और कल्याणकारी राजनीति पर केंद्रित था, उससे अलग विजय की राजनीति समावेशी तमिल गौरव, राष्ट्रवाद और महिला-नेतृत्व वाले प्रतीकों की ओर झुकाव रखने वाला है. यह बदलाव वैचारिक द्रविड़वाद से हटकर नई पीढ़ी के लिए अधिक नरम, महत्वाकांक्षी और भावनात्मक रूप से जुड़ी तमिल पहचान की राजनीति की ओर इशारा करता है.
हिंदी की बात करें तो विजय ने शिवकाशी से अपनी पार्टी की हिंदी भाषी विधायक एस. कीर्तना को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया है. इससे यह संकेत मिलता है कि वे अपने पहले के नेताओं की तरह हिंदी के प्रति कठोर रुख नहीं रखते. DMK और AIADMK के नेता जब सत्ता में थे तो संवाद के लिए अंग्रेजी या तमिल का इस्तेमाल करते थे.
BJP को TVK सरकार के साथ तालमेल बिठाने के लिए किसी औपचारिक गठबंधन की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह सरकार DMK की तरह केंद्र के खिलाफ सांस्कृतिक युद्ध छेड़ती नजर नहीं आ रही है. यह शिक्षा, भाषा और धार्मिक धर्मांतरण जैसे मुद्दों पर BJP के एजेंडे का विरोध करने के बजाय उसे सहन करती है. यह तमिलनाडु की राजनीति में एक संरचनात्मक बदलाव का प्रतिनिधित्व करती है.
कुछ मायनों में संघवाद, भाषा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को लेकर पूर्व DMK सरकार और केंद्र के बीच एक दशक से चल रहा निरंतर टकराव शायद अब समाप्त हो चुका है. विजय ने अब तक इस तरह के संघर्ष में कोई रुचि नहीं दिखाई है. वंदे मातरम गाए जाने ने किसी भी नीतिगत बयान से कहीं अधिक स्पष्ट रूप से इसकी पुष्टि की.
इसके साथ ही तमिलनाडु की राजनीति में जो स्थिति पैदा हुई है, उससे BJP को यहां विस्तार करने का मौका मिल गया है. AIADMK में टूट के बाद यह संभावना और ज्यादा बढ़ गई है. AIADMK अब विजय को चुनाव के बाद दिए गए समर्थन को लेकर आपस में बंटी हुई है.
कुछ ही सप्ताह पहले तक राजनीतिक रूप से असंभव लगने वाले घटनाक्रम में विजय को AIADMK के 24 विधायकों का समर्थन हासिल हुआ. विश्वास मत में उनका समर्थन करने वाले 144 विधायकों में से 24 विधायक AIADMK पार्टी से पाला बदलकर विजय के साथ आने वाले थे. उन्होंने TVK सरकार के खिलाफ मतदान करने के पार्टी के निर्देश का उल्लंघन किया था. इस खुले विद्रोह ने AIADMK को दिसंबर 2016 में जे. जयललिता की मृत्यु के बाद से सबसे गहरे आंतरिक संकट में धकेल दिया है.
AIADMK का इतिहास अपने आप में एक अनोखी कहानी है. 2016 में 136 सीटों से गिरकर AIADMK 2021 में 66 सीटों पर आ गई और अब इस चुनाव में उसे 47 सीटें मिली हैं. इन 47 विधायकों में से आधे ने 13 मई को विश्वास मत के दौरान पार्टी के व्हिप का उल्लंघन किया. AIADMK की संगठनात्मक पहचान अभी भी एक पारंपरिक नेतृत्व मॉडल से गहराई से जुड़ी हुई है, जिससे युवा मतदाता तेजी से अलग होते जा रहे हैं.
BJP के लिए यह स्थिति एक विरासत भी है और एक प्रलोभन भी. अब तक तमिलनाडु में पार्टी की रणनीति एक तय फार्मूले पर आधारित रही थी. AIADMK के साथ गठबंधन करना, शहरी और पश्चिमी क्षेत्रों में धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत करना और DMK-विरोधी भावना के बढ़ने का इंतजार करना.
के. अन्नामलाई के नेतृत्व में 2021 के बाद BJP की मौजूदगी बढ़ी, खासकर कोंगु क्षेत्र और युवा शहरी मतदाताओं के बीच. हालांकि 2026 के चुनावों से पहले अन्नामलाई को किनारे किए जाने और BJP के कमजोर पड़ चुकी AIADMK के साथ फिर से गठबंधन करने को अब व्यापक रूप से उस गठबंधन की रफ्तार खोने की वजह माना जा रहा है.
BJP के सामने सवाल यह है कि क्या वह AIADMK के टूट रहे राजनीतिक ढांचे को अपने अंदर समाहित करे. यानी कि पार्टी AIADMK के नेता-कार्यकर्ताओं के नेटवर्क के साथ क्षेत्रीय वोट बैंक को अपने संगठन में जगह दे. दूसरा विकल्प यही है कि जमीन से अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश करे. पहला रास्ता अल्पकालिक लाभ दे सकता है लेकिन दूसरा रास्ता BJP के लिए लंबे समय तक टिकाऊ साबित हो सकता है.
विजय का जबरदस्त उभार BJP की इस रणनीतिक गणना को जटिल बनाता है लेकिन जरूरी नहीं कि उसे रोकता हो. TVK अब उस महत्वाकांक्षी राजनीतिक क्षेत्र का बड़ा हिस्सा अपनी ओर आकर्षित कर चुकी है, जहां BJP अपनी पकड़ बढ़ाना चाहती थी. जैसे पहली बार वोट देने वाले युवा, डिजिटल रूप से सक्रिय युवा वर्ग, शहरी मध्यम वर्ग और वे लोग जो पारंपरिक द्रविड़ दलों से अलग कोई विकल्प तलाश रहे हैं.
साथ ही, विजय का उभरना उस BJP-विरोधी एकजुटता को भी तोड़ता है, जिसने लंबे समय तक तमिल राजनीति के बड़े हिस्से को एकजुट रखा था. इस तरह तमिलनाडु के लोगों के मतों में यह बिखराव BJP को वह राजनीतिक अवसर देता है, जो उसे पहले कभी नहीं मिला था.
असल चुनौती सांस्कृतिक है. BJP को भाषा की राजनीति, संघीय संवेदनशीलता और उत्तर भारतीय राजनीतिक दल की धारणाओं से उपजे प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है. तमिलनाडु के मतदाताओं ने ऐतिहासिक रूप से उन पार्टियों को प्राथमिकता दी है जो राज्य की राजनीतिक विचारधारा से गहराई से जुड़ी हुई मानी जाती हैं.
यही कारण है कि अन्नामलाई का महत्व था और इसीलिए कई लोग आज भी उनकी बर्खास्तगी को एक रणनीतिक गलती मानते हैं. उन्होंने पश्चिमी तमिलनाडु में एक ऐसी राजनीतिक पहचान का निर्माण शुरू किया था जो कम से कम सैद्धांतिक रूप से BJP के लिए एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान की तरह दिखती थी.
हालांकि, तमिलनाडु ही दक्षिणी राज्यों में BJP की एकमात्र निराशा नहीं है, केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे ने 102 सीटों पर शानदार जीत हासिल करते हुए वाम लोकतांत्रिक मोर्चे के एक दशक के शासन का अंत किया और BJP को एक सुनियोजित अभियान के बावजूद केवल तीन विधानसभा सीटें ही मिलीं.
राष्ट्रीय स्तर पर, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) 21 राज्यों में सत्ता में है. राष्ट्रीय स्तर पर किसी पार्टी का ऐसा विस्तार इंदिरा गांधी की कांग्रेस के बाद से नहीं देखा गया था. इन सबके बावजूद इस राष्ट्रीय दल को दक्षिण में अभी भी कड़ा विरोध का सामना करना पड़ रहा है.
तमिलनाडु में विशेष रूप से पुरानी द्रविड़ प्रणाली कमजोर होती दिख रही है लेकिन अभी तक कोई स्थिर राजनीतिक विकल्प स्थापित नहीं हो पाया है. इस बदलाव का कारण BJP नहीं है. AIADMK का पतन, विजय का उदय या शपथ ग्रहण समारोह में वंदे मातरम का अप्रत्याशित आह्वान BJP की रणनीति या साजिश का हिस्सा नहीं है. फिर भी, BJP सतर्क है और शायद लंबे समय बाद पहली बार उसके पास यह मानने का कारण है कि तमिलनाडु धीरे-धीरे और अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, उसकी दिशा में आगे बढ़ रहा है.

