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महत्वाकांक्षा से गुणा-भाग तक : तो यह है बंगाल के चुनावों के लिए BJP का ब्लूप्रिंट!

पश्चिम बंगाल में पिछले नतीजों से सबक लेकर अमित शाह की टीम ठेठ जमीन से अपना चुनाव अभियान फिर खड़ा कर रही है

Following a crushing bypoll defeat, Bengal BJP has descended into turmoil with escalating infighting and calls for leadership change.
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह BJP के प. बंगाई इकाई के नेताओं के साथ
अपडेटेड 13 जनवरी , 2026

हाल ही में BJP के बड़े नेता जब कोलकाता में पार्टी के हेस्टिंग्ज दफ्तर में इकट्ठा हुए, तो मेज पर चारों तरफ पर नक्शे और स्पैडशीट फैली थीं. अध्यक्षता संगठन के प्रमुखों और चुनाव मैनेजरों से घिरे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कर रहे थे. कोई बड़ी-बड़ी बातें नहीं हुईं, बस वह हुआ जिसे बैठक में शामिल एक शख्स ने “ईमानदार और असल सच्चाइयों की बैठक” कहा.

उस पार्टी के लिए जिसे कभी लगता था कि पश्चिम बंगाल भगवा लहर के लिए पककर तैयार है, मिजाज अब महत्वाकांक्षा से हटकर गुणा-भाग पर आ गया है. राज्य में BJP का उभार बहुत तेज लेकिन असमान रहा है. 2016 में पार्टी के पास विधानसभा की महज तीन सीटें और 10 फीसद वोट हिस्सेदारी थी. 2021 का चुनाव आते-आते पार्टी ने जनता के 38.10 फीसद वोट हासिल करके 294 में से 77 सीटें जीत लीं और मुख्य विपक्ष बनकर उभरी. कांग्रेस और वाम दलों का इस चुनाव में सफाया हो गया.

इस उछाल को 2019 के लोकसभा चुनाव में BJP के प्रदर्शन से ताकत मिली, जब उसने 40.7 फीसद वोटों के साथ 42 में से 18 सीटें जीतीं. अलबत्ता 2024 के आम चुनावों ने इस तेज बढ़ते रथ पर लगाम कस दी. BJP की सीटें घटकर 12 पर और वोट हिस्सेदारी 39 फीसद पर आ गई, जबकि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) 46.1 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ 29 सीटों पर पहुंच गई. इन आंकड़ों ने उस बात की तस्दीक कर दी जिसे बंगाल पर नजर रखने वाले पहले ही भांप रहे थे, और वह यह कि BJP ने राज्य में बढ़त तो बनाई लेकिन जड़ें नहीं जमा पाई है.

शाह के नए ब्लूप्रिंट में इसी सीमा को पहचाना गया है. पार्टी ने अंदरूनी तौर पर विधानसभा के सभी 294 निर्वाचन क्षेत्रों को तीन श्रेणियों में बांटा है. ‘श्रेणी ए’ में 162 सीटें हैं जहां उसकी संभावनाएं बहुत ज्यादा हैं; ‘श्रेणी बी’ में 49 सीटें हैं जिन्हें और ज्यादा संसाधनों की जरूरत है; और ‘श्रेणी सी’ में 83 सीटें हैं जहां वह अब भी कमजोर है. ये श्रेणियां बूथ स्तर की जांच-पड़ताल, पिछले चुनावों के मतदान प्रतिशत और जिलों से आई रिपोर्टों के आधार पर तय की गई हैं.

इस बारीक अभियान को संभालने के लिए राज्य को पांच अंचलों में बांटा गया है. पहले में पुरुलिया और बर्धमान आते हैं; दूसरे में हावड़ा, हुगली और मेदिनीपुर; तीसरे में कोलकाता महानगर और दक्षिण 24 परगना; चौथे में नबद्वीप और उत्तर 24 परगना; और पांचवें में उत्तर बंगाल, जो मालदा से लेकर सिलीगुड़ी संभाग तक फैला है.

हर अंचल में अब एक महामंत्री (संगठन), जो दूसरे राज्य से लाया गया है, और उसके साथ पार्टी का एक बड़ा नेता है. उन्हें जो काम सौंपा गया है, वह संगठन का आकलन करना, भरोसेमंद उम्मीदवारों की सूची बनाना, जरूरी संसाधनों का अनुमान लगाना और TMC की स्थानीय ताकतों और कमजोरियों का मूल्यांकन करना है. यही मूल्यांकन सीटों की नई श्रेणियां तय करने का आधार है.

शाह का निर्देश साफ हैं : उन जगहों पर ध्यान दें जहां BJP जीत सकती है, उन जगहों पर नहीं जहां वह केवल शोर-शराबा मचा सकती है. उन्होंने नया कॉलेजियम मॉडल लाकर नेतृत्व के ढांचे को भी सपाट बना दिया है. अभियान का कोई एक चेहरा नहीं है, इसके बजाय चार बड़े नेता- शमिक भट्टाचार्य, सुवेंदु अधिकारी, सुकांत मजूमदार और दिलीप घोष- अंचलों के कामकाज का संचालन कर रहे हैं. मकसद गुटीय प्रतिद्वंद्विताओं को खत्म करना और स्थानीय जवाबदेही को मजबूत करना है. 

2021 में जब BJP ने दलबदलुओं और सेलेब्रिटी के लिए अपने दरवाजे खोल दिए थे और उनमें से कई दागदार या जड़विहीन थे, तो उसके बाद कार्यकर्ताओं की तरफ से काफी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. इस बार पार्टी सोच-समझकर चयन कर रही है. केवल साफ-सुथरी छवि और स्थानीय विश्वसनीयता वाले लोगों पर विचार किया जा रहा है. BJP के एक बड़े नेता कहते हैं, “उधार के चेहरों के साथ बंगाल नहीं जीता जा सकता. हम अपने कार्यकर्ताओं की तरफ वापस जा रहे हैं.”

संघ परिवार की वापसी ने इस नई दशा-दिशा को और मजबूती दी है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), वनवासी कल्याण आश्रम, भारतीय मजदूर संघ, विश्व हिंदू परिषद और सेवा भारती, जिन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में बालिश्त भर की दूरी बना रखी थी, अब जमीनी अभियान का हिस्सा बन गए हैं. वे BJP की छवि निखारने और भरोसा बहाल करने के लिए ए और बी श्रेणी के निर्वाचन क्षेत्रों में जनकल्याण कार्यक्रम, संत प्रवास, मंदिर से जुड़े आयोजन और सांस्कृतिक मेलजोल के कार्यक्रम चला रहे हैं.

BJP के अंदरूनी लोग अलबत्ता स्वीकार करते हैं कि संख्याएं ढांचागत रुकावट पैदा कर रही हैं. विधानसभा के 146 निर्वाचन क्षेत्र ऐसे हैं जहां मुसलमान आबादी 25 फीसद से 90 फीसद तक है. 2021 में TMC ने इनमें से 131 सीटें, BJP ने 14 और इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) ने एक सीट जीती थी. राज्य BJP के एक पदाधिकारी कहते हैं, “यह हमारी सबसे बड़ी रुकावट है. पहले ध्रुवीकरण ने ममता बनर्जी के पक्ष में मुस्लिम वोटों को एकजुट करने में मदद की, जबकि हमारे पक्ष में विपरीत ध्रुवीकरण कुछ ही हिस्सों में कारगर रहा.”

2021 के चुनावों में कांग्रेस-वाम-आइएसएफ के गठबंधन और असदुद्दीन औवेसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलिमीन के चुनाव में उतरने के बावजूद मुस्लिम वोट बंटा नहीं. इस बार BJP की कुछ उम्मीदें इस बात पर टिकी हैं कि TMC के पूर्व विधायक हुमायूं कबीर का अति-मुस्लिम राष्ट्रवाद और अपना संगठन चुनाव में उतारना मुस्लिम वोटों को बांटने में मदद कर सकता है.

इस सच्चाई ने पार्टी को अपना सुर बदलने के लिए मजबूर किया. BJP ने अपनी हिंदुत्व की पहचान को तिलांजलि नहीं दी बल्कि इसका सुर मद्धिम किया है. पार्टी के रणनीतिकार महाराष्ट्र, दिल्ली और हाल के बिहार चुनावों की तरफ इशारा करते हैं जहां कम आक्रामक रवैये की बदौलत कुछ मुस्लिम मतदाताओं ने दूसरे विकल्पों पर विचार किया. 

BJP की बंगाल इकाई को उम्मीद है कि राजकाज, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, ग्रामीण इलाकों में बकाया मजदूरी और कल्याणकारी कार्यक्रमों में धन के रिसाव से उसे मिली-जुली आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में पैठ बनाने में मदद मिल सकती है. BJP के अंदरूनी लोगों का मानना है कि यही वह जगह है TMC के खिलाफ “महा जंगलराज” का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आरोप कारगर होगा. 

इस बीच चुनाव आयोग (EC) की तरफ से किया जा रहा बंगाल की मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) विधानसभा चुनाव से पहले टकराव का बड़ा मुद्दा बन गया. अभी चल रहे EC के सत्यापन अभियान में 1.18 करोड़ विसंगतियां सामने आईं और मृत्यु, दोहराव और पते के मिलान में गड़बड़ी का हवाला देते हुए मतदाता सूचियों से करीब 58.4 लाख नाम हटा दिए गए.

दिसंबर में प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से तमाम जिलों में 24 लाख मृत, 12 लाख लापता और 10 लाख एकाधिक प्रविष्ठियों वाले मतदाताओं का पता चला. यह राज्य के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा सफाई अभियान है. अर्थशास्त्री अमृत्य सेन, क्रिकेटर मोहम्मद शमी और बंगाली अभिनेता देव के परिवार सरीखे कई जाने-माने लोगों को भी नोटिस गए, जिससे प्रशासनिक जांच-पड़ताल सार्वजनिक तमाशे में बदल गई.

TMC ने मनमाने ढंग से नाम हटाने, अपारदर्शी सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल और अल्पसंख्यक-बहुल सीमांत जिलों के खिलाफ पक्षपात का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, साथ ही EC पर तकनीकी काम को BJP से जुड़े विक्रेताओं को “आउटसोर्स करने” का आरोप लगाया. जवाब में BJP का कहना है कि पुनरीक्षण से खासकर मुर्शिदाबाद, माल्दा और उत्तर 24 परगना में “फर्जी मतदाताओं” और गैरकानूनी प्रविष्ठियों का खुलासा हो रहा है. 

दोनों पार्टियों ने अब अपनी पूरी मशीनरी झोंक दी है. BJP की बूथ कमेटियां मतदाता सूचियों का दोबारा सत्यापन कर रही हैं, तो TMC घर-घर जाकर मतदाता जागरूकता अभियान चला रही है. इस तरह SIR की प्रक्रिया, जिसके दायरे में 7.9 करोड़ से ज्यादा पंजीकृत मतदाता आए, 2026 की पहली जंग बन गई.

इन घटनाओं के अलावा शाह का जोर संगठन की योजना को मजबूत बनाने पर है, जो चुनाव अभियान के संयोजन से कहीं ज्यादा गहरे जाती है. पार्टी ने 42 संसदीय क्षेत्र क्लस्टर बनाए हैं, जिनकी निगरानी डिजिटल डैशबोर्ड करते हैं, जो बूथ स्तर पर मेलजोल, मीडिया में आई रिपोर्ट और धन के प्रवाह पर नजर रखते हैं. इस डेटा के आधार पर अभियान को लगातार बदला और तय किया जाता है, जिससे उसी वक्त सुधार कर पाना मुमकिन होता है. यह कॉन्सेप्ट गुजरात और उत्तर प्रदेश से उधार ली गई है, लेकिन इसे बंगाल की भाषाई और सांस्कृतिक बारीकियों के हिसाब से ढाला गया है.

फिर भी TMC मजबूत प्रतिद्वंद्वी बनी हुई है. लक्ष्मीर भंडार और दुआरे सरकार से कन्याश्री तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जनकल्याण का स्थापत्य ग्रामीण इलाकों में खासकर महिलाओं के बीच गहरी वफादारी सुनिश्चित करता है. ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने प्रतिक्रियाशील डिजिटल कंट्रोल रूम बनाया है जो ‘दीदी के बोलो’ के जरिए मतदाताओं की शिकायतों पर नजर रखता है. यह मशीनरी मतदाताओं के साथ TMC के जुड़ाव को लगातार बनाए रखती है.

इंडियन पोलिटिकल एक्शन कमेटी (आइ-पीएसी या आइपैक) के कोलकाता दफ्तर पर हाल में ED का छापा चुनावों से पहले राजनैतिक मुद्दा बन गया. ममता ने आनन-फानन इस मौके को झपटते हुए छापे को BJP की अगुआई वाले केंद्र की बदले की कार्रवाई बताया और खुद को बंगाल की तारणहार के तौर पर पेश किया. BJP के नेताओं का कहना है कि यह आक्रामकता राजनैतिक हिंसा की तरफ ले जाती है, जो अब बंगाल की राजनीति का पर्याय बन गई है. 

BJP ने इस घटना के नतीजे का इस्तेमाल ममता को न्याय में बाधा डालने वाली नेता के तौर पर पेश करने के लिए किया और ‘कानून बनाम अराजकता’ का नैरेटिव आगे बढ़ाया. ममता के लिए यह नाफरमानी के जरिए नैतिक जमीन दोबारा हासिल करने की कोशिश थी, जबकि BJP के लिए यह TMC को भ्रष्टाचार और भय से घबराई हुई हुकूमत के तौर पर पेश करने का मौका था.

BJP की मौजूदगी ने बंगाल के राजनैतिक नक्शे को पहले ही नए सिरे से गढ़ दिया है. 2016 में विधानसभा की तीन सीटों से लगातार दो आम चुनावों में 38-40 फीसद वोट आधार तक उसने एक ही दशक में वह हासिल कर लिया जो कभी नामुमकिन मालूम देता था. मिशन 2026 अपनी पकड़ को मजबूत करने का उद्यम है. पार्टी के अनुमान बताते हैं कि 2021 की वोट हिस्सेदारी को बनाए रखते हुए उत्तर बंगाल, जंगलमहल के अलावा हावड़ा और नादिया की अर्धशहरी पट्टी में वोटों के अंतर में सुधार लाने से उसकी सीटों की संख्या 100 से ऊपर जा सकती है, जो बहुध्रुवीय मैदान में प्रतिस्पर्धी दहलीज है.

BJP के एक वरिष्ठ रणनीतिकार कहते हैं, “पश्चिम बंगाल ने हमें विनम्रता सिखाई. आप यह राज्य दिल्ली से नहीं जीत सकते. आपको इसे बर्धमान में, बांकुरा में, कूच बिहार में और कोलकाता में जीतना पड़ेगा.” किसी भी नारे से ज्यादा यही BJP की सबसे ईमानदार और वास्तविक सच्चाई है. बाकी सब कुछ- रैलियां, सुर्खियां, गुणा-भाग- तभी काम आएगा जब जमीनी काम मजबूत होगा.

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