तमिलनाडु चुनाव के लिए BJP की रणनीति न तो जोर-शोर वाली है, न ही विचारधारा पर आधारित और न ही सुर्खियां बटोरने वाली. यह बहुत सोची-समझी और गहरी रणनीति है, जो संख्याओं, पिछली गलतियों और बदलते चुनावी माहौल को ध्यान में रखकर बनाई गई है.
एक ऐसे राज्य में जहां BJP अपने दम पर 5 फीसद वोट शेयर भी पार करने के लिए हमेशा संघर्ष करती रही है, इस बार उसका लक्ष्य सिर्फ प्रासंगिक बनना नहीं, बल्कि कुछ ताकत हासिल करना और भविष्य के लिए मजबूत स्थिति हासिल करना भी है.
कुछ साल पहले तक तमिलनाडु को लेकर BJP की ऐसी रणनीति सोची भी नहीं जा सकती थी.
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले के तीन सालों तक के. अन्नामलाई BJP के तमिलनाडु प्रदेश अध्यक्ष थे. वे राज्य में पार्टी के सबसे चमकदार और आक्रामक चेहरे थे. उन्होंने सत्तारूढ़ द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (DMK) के खिलाफ पूरी ताकत लगा दी और विरोध की रूपरेखा अपने तरीके से तैयार की. इतना ही नहीं, अन्नामलाई सहयोगी दल ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (AIADMK) को लेकर भी आक्रामक तेवर अपनाते थे, जिससे सहयोगी दल के नेता उनसे नाराज हो गए थे.
हालांकि, जब AIADMK के साथ विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन की बातचीत तेज हुई, तब BJP ने संयम बरतते हुए अन्नामलाई की ताकत को जानबूझकर कम दिखाने का फैसला किया. उन्हें पार्टी का चेहरा नहीं बनाया गया, न ही टिकट बंटवारे में उन्हें उतना महत्व दिया गया, जितना अक्सर प्रदेश नेताओं को दिया जाता है. साफ संदेश है कि BJP के लिए यह चुनाव व्यक्तिपूजा या किसी व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे कहीं ऊपर है. इसका मकसद सिर्फ इतना है कि गठबंधन का गणित सही-सही काम करे.
यह संयम पिछले दो चुनावों से मिले कड़े सबक पर आधारित है. 2021 के विधानसभा चुनाव में AIADMK के नेतृत्व वाले गठबंधन के अंदर BJP ने खुद को अपनी हैसियत से ज्यादा ताकत दिखाने की कोशिश की. इससे गठबंधन में झगड़ा हुआ और वोट ट्रांसफर ठीक से नहीं हो पाया.
केंद्र में सत्ता होने और आक्रामक रुख अपनाने के बावजूद BJP अपना वोट बैंक को ज्यादा नहीं बढ़ा पाई. इससे पार्टी को यह सबक मिला है कि तमिलनाडु में बिना सामाजिक आधार के ज्यादा आक्रामकता दिखाना उल्टा पड़ सकता है. 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने इस सीख को और मजबूत कर दिया.
DMK के नेतृत्व वाले गठबंधन ने पूरे राज्य में साफ-साफ जीत हासिल कर ली और शहर व गांव, दोनों जगह अपनी पकड़ मजबूत कर ली. BJP ने भले ही तेज प्रचार किया और केंद्रीय नेतृत्व ने पूरी ताकत लगाई, लेकिन इसके बावजूद पार्टी इसे वोटों में नहीं बदल पाई. सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि नतीजों ने साफ दिखाया कि केवल नैरेटिव के जरिए गहरी जड़ें जमाए द्रविड़ वोटिंग पैटर्न को नहीं तोड़ा जा सकता. कल्याणकारी योजनाएं, स्थानीय गठबंधन और बूथ स्तर का नेटवर्क अभी-भी विचारधारा वाले प्रचार से कहीं ज्यादा असरदार साबित होते हैं.
पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मिले दो बड़े झटकों ने इस चुनाव में BJP की रणनीति को पूरी तरह बदल दिया है. पार्टी अब आक्रामकता से हटकर समझौता और समायोजन की राह पर चल रही है. गणित की शुरुआत BJP के AIADMK के साथ नए सिरे से गठबंधन से हो रही है. पार्टी ने खुद को जूनियर पार्टनर मान लिया है और ज्यादा दबंगई दिखाने का लालच छोड़ दिया है. कुंगू बेल्ट जैसे अहम इलाकों में खासकर कोयंबटूर में BJP ने अपने सहयोगी को जगह दे दी है.
राज्य की राजनीति में खुद को पीछे हटाना भी BJP की सोची-समझी रणनीति है. डेटा बताता है कि कड़ी टक्कर वाली सीटों पर गठबंधन के वोटों में सिर्फ 3-5 फीसद भी बंटवारा हो जाए तो जीत DMK के हाथ लग सकती है. जहां AIADMK का वोट ट्रांसफर का तंत्र ज्यादा मजबूत है, वहां सीटें देकर BJP ने व्यक्तिगत सफलता से ऊपर कुल मिलाकर ज्यादा सीटें जीतने को प्राथमिकता दी है.
एक नेता के इर्द-गिर्द पूरे अभियान को केंद्रित करने के बजाय BJP ने इसे व्यापक आधार पर फैलाया है. BJP महिला मोर्चा की अध्यक्ष वनथी श्रीनिवासन कोयंबटूर शहरी इलाकों में एक बार फिर जीत हासिल करने के लिए पूरी ताकत से लगी हैं. वहीं. केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन दलितों तक पहुंच और अपनी राष्ट्रीय छवि का इस्तेमाल वोट हासिल करने के लिए कर रहे हैं.
इस तरह पहले जो अभियान एक व्यक्ति-केंद्रित था, वह अब नेटवर्क-आधारित विस्तार की तरफ बढ़ गया है. अभिनेता-राजनेता विजय और उनकी पार्टी तमिलगा वेंट्री कजगम (TVK) का तेजी से उभरना, इस गठबंधन रणनीति का एक नया अध्याय है.
विजय ने NDA में शामिल होने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया. शुरुआती अनुमान यह था कि विजय मुख्य रूप से एंटी DMK वोटों को काटेंगे और AIADMK-BJP गठबंधन को नुकसान पहुंचाएंगे. हालांकि, चेन्नई समेत राज्य के दूसरे हिस्से से जो खबर आ रही है, वे अलग ही तस्वीर बयां कर रही हैं.
दरअसल, शहरी इलाकों में TVK कुछ हद तक द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम (DMK) के वोट बैंक में सेंध लगा रही है. इनमें युवा, महत्वाकांक्षी और कुछ सत्ता-विरोधी मतदाता भी हैं. इन इलाकों में विजय सत्तारूढ़ DMK के लिए वोट काटने वाले साबित हो सकते हैं. हालांकि, तमिलनाडु के कुल मतदाताओं में से करीब 55-60 फीसद लोग 40 साल से ऊपर के हैं. यह समूह राज्य की द्रविड़ परंपराओं, पार्टी नेटवर्क और समुदायों की निष्ठा में गहराई से जुड़ा हुआ है. ये लोग व्यक्तिपूजा वाली राजनीति से कम प्रभावित होते हैं.
इसी जगह TVK का विस्तार अचानक बहुत धीमा पड़ जाता है. इसकी अपील मुख्य रूप से युवा और शहरी मतदाताओं तक ही सीमित है, जबकि ग्रामीण तमिलनाडु और उम्रदराज मतदाता अभी भी DMK और AIADMK को ही ज्यादा पसंद करते हैं. नतीजा यह है कि तमिलनाडु का चुनावी नक्शा कई तरह से समझा जा सकता है.
चेन्नई और अन्य शहरी इलाकों में त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है, जहां TVK, DMK के वोटों को काट सकती है. पश्चिमी तमिलनाडु, खासकर कुंगू बेल्ट अब भी AIADMK-BJP गठबंधन के लिए संघर्ष का मैदान बना हुआ है. वहीं, ग्रामीण इलाकों और डेल्टा क्षेत्रों में मुकाबला ज्यादातर पुराने अंदाज में DMK बनाम AIADMK का ही है. BJP के लिए यह बंटा हुआ चुनावी परिदृश्य एक अच्छा मौका हो सकता है.
BJP को TVK से पूरे राज्य में एक समान प्रदर्शन की जरूरत नहीं है. उसे सिर्फ चुनिंदा जगहों पर DMK को कमजोर करना काफी है, जहां TVK, DMK को नुकसान पहुंचाएगी, वहां NDA को अप्रत्यक्ष फायदा होगा. जहां विजय की पार्टी कमजोर है, वहां BJP का पूरा ध्यान गठबंधन को मजबूत रखने और अधिकतम वोट ट्रांसफर करने पर है.
इसी वजह से NDA ने विजय से सीधे टकराव से बचने का फैसला किया है और उनकी मौजूदगी को चुनावी मैदान को खुद-ब-खुद ढालने का मौका दिया है. इस सबके पीछे यह समझ है कि 2026 का तमिलनाडु चुनाव में कोई सत्ता बदलने वाली लहर नहीं दिख रही है. DMK गठबंधन करीब 40-42 फीसद वोट शेयर, AIADMK-BJP को करीब 30 फीसद के आसपास वोट शेयर और TVK 10-15 फीसद वोट हासिल कर सकती है.
ऐसे में यह चुनाव सत्ताधारी और विपक्षी दलों के बीच बारीक अंतरों से तय होगा. केवल 4-7 फीसद का स्विंग दर्जनों सीटों का नतीजा पलट सकता है, इसलिए गठबंधन का अनुशासन, उम्मीदवारों का सही चयन और वोट ट्रांसफर करा सकने वाले उम्मीदवारों और एजेंडे पर पार्टियां ज्यादा ध्यान दे रही हैं.
इसलिए BJP की रणनीति गठबंधन के अंदर झगड़े को कम से कम रखने, अपनी नेतृत्व को ज्यादा सामने न लाने और जरूरत पड़ने पर सहयोगी दलों के लिए जगह छोड़ने पर आधारित है. ऐसा इसलिए ताकि गठबंधन गणित बरकरार रहे. अन्नामलाई को पीछे रखकर, नेतृत्व को व्यापक आधार देकर, कोयंबटूर जैसे मजबूत इलाकों में AIADMK को सीटें देकर और TVK को चुनावी वोट बांटने का मौका देकर, BJP एक गैर-आक्रमक लेकिन चुनावी गणित आधारित रणनीति चला रही है.
यह रणनीति तुरंत बड़ी सफलता नहीं दिला सकती, लेकिन एक ऐसे राज्य में जहां द्रविड़ पार्टियों के बीच दो-धुरी वाला मुकाबला होता है, वोट शेयर या सीटों में छोटा-सा बदलाव भी बहुत असरदार साबित हो सकता है.

