पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में सरधना विधानसभा सीट एक बार फिर केंद्र में है. इस बार वजह सिर्फ़ चुनावी समीकरण नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के दो बड़े चेहरों- संजीव बालियान और संगीत सोम के बीच बढ़ती खाई है, जिसने पार्टी के भीतर ही असहजता पैदा कर दी है.
दिलचस्प यह है कि इसी पृष्ठभूमि में जयंत चौधरी की अगुवाई वाले राष्ट्रीय लोक दल (RLD) ने सरधना सीट को लेकर BJP के साथ पर्दे के पीछे बातचीत शुरू कर दी है. जानकारी के मुताबिक मेरठ की सरधना सीट के साथ-साथ सिवालखास और किठौर पर भी RLD अपनी दावेदारी पेश कर रही है.
सरधना का मामला इसलिए खास है क्योंकि यहां से BJP के पूर्व विधायक संगीत सोम 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के अतुल प्रधान से करीब 18 हजार वोटों से हार गए थे. इस हार के पीछे सोम ने खुलकर अपने ही पार्टी सहयोगी संजीव बालियान को जिम्मेदार ठहराया था, आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने जाट वोटों को एकजुट करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई.
यह विवाद यहीं नहीं रुका. 2024 के लोकसभा चुनाव में जब बालियान मुजफ्फरनगर सीट से समाजवादी पार्टी के हरेंद्र मलिक से करीब 25 हजार वोटों से हार गए, तो उन्होंने पलटवार करते हुए सोम पर आरोप लगाया कि उन्होंने राजपूत पंचायतों के जरिए माहौल बिगाड़ा और अप्रत्यक्ष रूप से सपा प्रत्याशी की मदद की.
सरधना से शुरू होकर पूरे पश्चिमी यूपी तक फैली दरार
सरधना विधानसभा सीट, मुजफ्फरनगर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है. यहां जाट, ठाकुर और गुर्जर समुदाय का मजबूत प्रभाव है. यही सामाजिक समीकरण इस सीट को राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनाते हैं. सोम ठाकुर समुदाय से आते हैं, जबकि बालियान जाट नेता के तौर पर अपनी पहचान रखते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यही जातीय संतुलन अब BJP के लिए चुनौती बन गया है. मेरठ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक विवेक नौटियाल कहते हैं, “सरधना सिर्फ एक सीट नहीं है, यह पश्चिमी यूपी की सामाजिक राजनीति का माइक्रो मॉडल है. यहां की खींचतान पूरे क्षेत्र में असर डालती है.”
30 मार्च को तनाव तब और बढ़ गया जब संजीव बालियान ने सरधना में 18वीं सदी के जाट शासक महाराजा सूरजमल की प्रतिमा के अनावरण के दौरान कहा कि वे (2024 की हार का) 'अपमान' भूले नहीं हैं और उन्होंने 'ब्याज समेत बदला लेने' का संकल्प लिया. हालांकि बालियान ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन इसे सीधे तौर पर सोम के खिलाफ संदेश के रूप में देखा गया.
RLD की एंट्री : समाधान या नई चुनौती
RLD के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने पुष्टि की कि पार्टी मेरठ की कम से कम तीन सीटों, जिनमें सरधना भी शामिल है, पर BJP के साथ बातचीत कर रही है. अन्य दो सीटें सिवालखास और किठौर हैं. BJP ने 2022 के विधानसभा चुनावों में ये तीनों सीटें गंवा दी थीं, जब RLD समाजवादी पार्टी की सहयोगी थी. सिवालखास सीट RLD के गुलाम मोहम्मद ने जीती थी और किठौर सीट SP के शाहिद मंजूर ने. सरधना, जहां सोम को सपा के अतुल प्रधान के हाथों लगभग 18,000 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था, वहां तीन ब्लॉकों- दौराला, मवाना और सरधना में जाट, गुर्जर और ठाकुर समुदायों की अच्छी-खासी आबादी है.
BJP के कुछ नेता मानते हैं कि RLD को सरधना सीट देने से BJP को बालियान और सोम, साथ ही उनके समर्थकों के बीच संभावित सुलह कराने में मदद मिल सकती है. जानकारों का कहना है कि सोम-बालियान की आपसी रंजिश पश्चिमी यूपी में BJP के लिए एक ढांचागत समस्या बन सकती है. पार्टी के भीतर यह धारणा बन रही है कि अगर यह सीट सहयोगी को दे दी जाए तो बालियान और सोम के बीच सीधी टक्कर टाली जा सकती है. एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक का कहना है, “BJP RLD को सरधना देकर एक तरह से ‘सेफ एग्जिट’ देना चाहती है. इससे न तो बालियान को सीधे चुनौती झेलनी पड़ेगी, न सोम को टिकट से वंचित करने का जोखिम उठाना पड़ेगा.”
लेकिन यह रणनीति भी जोखिम से खाली नहीं है. मुजफ्फर नगर में शिक्षक और राजनीतिक विश्लेषक सुरेंद्र सैनी बताते हैं, “सरधना सीट RLD को देने से पश्चिमी यूपी में जाट बनाम ठाकुर की राजनीतिक को और हवा मिल सकती है. अगर BJP संगीत सोम को सम्मानपूर्वक एडजस्ट नहीं करती है तो सरधना सीट को सहयोगी के हवाले करने का दांव उल्टा भी पड़ सकता है.”
2013 के दंगों से 2024 तक : रिश्ते का इतिहास
बालियान और सोम का राजनीतिक उदय 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद हुआ. दोनों पर इन दंगों में भूमिका को लेकर आरोप लगे और यही दौर था जब पश्चिमी यूपी में ध्रुवीकरण बढ़ा. 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर के साथ BJP ने पश्चिमी यूपी में जबरदस्त प्रदर्शन किया. बालियान को जाट चेहरे के रूप में आगे बढ़ाया गया और उन्होंने भारी मतों से जीत दर्ज की. बाद में वे केंद्र सरकार में मंत्री भी बने.वहीं संगीत सोम ने सरधना से अपनी पकड़ मजबूत की और 2017 में दोबारा विधायक बने. लेकिन 2022 में उनकी हार ने समीकरण बदल दिए.
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ही दोनों नेताओं के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया था. सोम ने बालियान के लिए प्रचार करने से इनकार कर दिया था, यहां तक कि उन्होंने उन्हें अपने 'कद का नेता' मानने से भी इंकार कर दिया.
इसका असर जमीनी स्तर पर साफ दिखाई दिया. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, जाट और ठाकुर वोटों का ध्रुवीकरण टूट गया. मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा सपा के पक्ष में एकजुट हो गया, जिससे BJP का समीकरण बिगड़ गया. नतीजा यह हुआ कि पश्चिमी यूपी की 26 लोकसभा सीटों में से BJP केवल 13 ही जीत सकी, जबकि 2019 में उसने 18 सीटें जीती थीं. इस पूरे विवाद की जड़ में जातीय प्रतिनिधित्व का सवाल भी है. 2024 के चुनावों में टिकट वितरण को लेकर ठाकुर समुदाय में असंतोष देखा गया. मुजफ्फरनगर सीट पर ठाकुर वोट करीब एक लाख माने जाते हैं. सोम का इस समुदाय में प्रभाव है, जबकि बालियान जाटों के बड़े चेहरे हैं. ऐसे में दोनों के बीच टकराव ने BJP के पारंपरिक 'हिंदू एकता' के फार्मूले को कमजोर किया.
संगठन बनाम व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह विवाद समय रहते नहीं सुलझा, तो आने वाले विधानसभा चुनावों में BJP को गंभीर नुकसान हो सकता है. राजनीतिक विश्लेषक विवेक नौटियाल कहते हैं, “पश्चिमी यूपी में BJP की ताकत सामाजिक गठजोड़ पर टिकी है. अगर जाट और ठाकुर वोट अलग-अलग दिशाओं में जाते हैं, तो पार्टी को सीधा नुकसान होगा.” नौटियाल के मुताबिक 2024 के लोकसभा चुनाव ने इस खतरे का ट्रायल वर्जन दिखा दिया है. अगर यही स्थिति विधानसभा चुनाव तक बनी रही, तो सीटों का नुकसान और ज्यादा हो सकता है.
BJP हमेशा खुद को कैडर आधारित और अनुशासित पार्टी के रूप में पेश करती रही है. लेकिन बालियान और सोम का विवाद इस छवि पर सवाल खड़े कर रहा है. पार्टी नेतृत्व ने कई बार दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिश की, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला. पश्चिमी यूपी की राजनीति में समीकरण बहुत तेजी से बदलते हैं और सरधना की यह कहानी सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में BJP के भविष्य की दिशा तय कर सकती है.

