संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर विपक्ष पर हमलावर रही भारतीय जनता पार्टी अब अपने ही संगठन से जुड़े फैसलों को लेकर सवालों के घेरे में आ गई है. भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) राजस्थान की नई प्रदेश कार्यकारिणी में महिलाओं की बेहद कम भागीदारी ने भाजपा की कथनी और करनी के अंतर पर सियासी बहस छेड़ दी है.
भाजयुमो के प्रदेशाध्यक्ष शंकर गोरा ने 21 मई की रात संगठन की 63 सदस्यीय कार्यकारिणी घोषित की, जिसमें महिलाओं के सिर्फ तीन नाम हैं. ताज्जुब की बात यह है कि प्रदेश उपाध्यक्ष, प्रदेश महामंत्री, प्रदेश मंत्री, कोषाध्यक्ष, कार्यालय प्रभारी और मीडिया प्रभारी जैसे 33 प्रमुख पदों पर एक भी महिला को नियुक्ति नहीं मिली.
प्रदेश कार्यकारिणी में 21 प्रदेश प्रवक्ताओं की घोषणा की गई है, जिनमें वृंदा राठौड़ एकमात्र महिला हैं. सात प्रदेश उपाध्यक्ष और नौ प्रदेश मंत्रियों की सूची भी पूरी तरह पुरुषों के नाम रही. महिलाओं को केवल प्रशिक्षण प्रभारी और सह प्रभारी जैसे पदों तक सीमित रखा गया.
गौरतलब यह भी है कि पिछले दिनों संसद में नारी शक्ति वंदन विधेयक पर छिड़ी बहस के दौरान शंकर गोरा ने अपने एक्स हैंडल पर 20 से ज्यादा ट्वीट और रीट्वीट किए थे. गोरा के निर्देश पर राजस्थान भर में युवा मोर्चा और भाजपा से जुड़ी महिला कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस के खिलाफ प्रदर्शन किए मगर जब संगठन में शामिल करने का वक्त आया तो महिलाओं की जमकर अनदेखी हुई.
17 अप्रैल को लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन प्रस्ताव गिरने के बाद भाजयुमो राजस्थान के अध्यक्ष शंकर गोरा ने कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला था. गोरा ने कहा, “विपक्ष ने महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले बिल को गिराकर महिलाओं का अपमान किया है और देश की महिलाएं इसका जवाब हर चुनाव में देंगी. कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने यह पहली बार नहीं किया बल्कि बार-बार किया है. उनकी यह सोच न महिलाओं के हित में है और न देश के. नारी शक्ति के अपमान की बात यहीं नहीं रुकेगी, दूर तक जाएगी. विपक्ष को ‘महिलाओं का आक्रोश’ न सिर्फ 2029 लोकसभा चुनाव में बल्कि हर स्तर, हर चुनाव और हर स्थान पर झेलना पड़ेगा.”
भाजयुमो कार्यकारिणी को लेकर प्रदेश में सियासी बहस शुरू हो गई है. कांग्रेस ने भाजपा की कथनी और करनी में अंतर बताते हुए कहा है कि भाजपा के लिए महिला आरक्षण चुनावी जुमले से ज्यादा कुछ नहीं है. कांग्रेस के वॉर रूम चेयरमैन जसवंत गुर्जर का कहना है, “भाजपा संसद और विधानसभाओं में नारी शक्ति वंदन के बड़े-बड़े भाषण तो देती है मगर अपने ही संगठन में महिलाओं को बराबरी का स्थान देने से कतराती है. भाजपा के लिए महिला सशक्तिकरण सिर्फ चुनावी नारा है. अगर पार्टी सच में महिलाओं को नेतृत्व में आगे लाना चाहती है तो निर्णय लेने वाले पदों पर भी उनकी भागीदारी दिखाई देती.”
राजनीतिक विश्लेषक त्रिभुवन सवाल करते हैं, “भाजयुमो की कार्यकारिणी में नारी शक्ति वंदन कहां चला गया? कार्यकारिणी में सिर्फ 4.8 फीसदी महिलाओं को मौका मिला है. यदि भाजपा स्वयं नारी शक्ति वंदन की इतनी ही हिमायती है तो इस कार्यकारिणी में कम से कम एक-तिहाई हिस्सेदारी के तौर पर 20-21 महिलाओं को जगह मिलनी चाहिए थी. राजनीतिक दलों का यह वही पुराना राजनीतिक पैटर्न है, जिसमें महिलाओं को संगठन की शोभा तो बताया जाता है, मगर संगठन की शक्ति कभी नहीं बनाया जाता. आदिवासी और वंचित वर्गों के प्रतिनिधित्व के मामले में भी भाजयुमो की यह सूची प्रभावशाली नहीं लगती.”
इस संबंध में इंडिया टुडे ने जब भाजयुमो के प्रदेशाध्यक्ष शंकर गोरा से बातचीत की तो उन्होंने कहा, “अभी संगठन में कुछ जगह खाली हैं. उन पर जल्द ही कुछ महिलाओं को शामिल करेंगे.”
शंकर गोरा भविष्य में अपनी कार्यकारिणी में महिलाओं को कितनी तवज्जो देते हैं, यह तो आने वाला वक्त बताएगा. मगर एक बात तय है कि विधानसभा और लोकसभा चुनावों में महिला मतदाताओं को साधने के लिए अभियान चलाने वाले दल, जब वास्तविक अवसरों की बात आती है, तो अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट जाते हैं. अब भाजपा के सामने यह चुनौती है कि वह महिला सशक्तिकरण के अपने राजनीतिक संदेश और संगठनात्मक वास्तविकता के बीच पैदा हुए इस विरोधाभास का जवाब कैसे देती है?

