30 जनवरी की दोपहर आल्हा-ऊदल की धरती महोबा में जो हुआ, वह सिर्फ़ एक मंत्री-विधायक की नोकझोंक नहीं थी. यह उस असहज सच की तस्वीर थी, जिसमें कागज़ों पर ‘मॉडल’ और ज़मीन पर ‘मसला’ आमने-सामने खड़े दिखे. चरखारी से BJP विधायक बृजभूषण राजपूत और उनके समर्थकों ने जब राज्य के जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह का काफ़िला रोक दिया, तो आल्हा-ऊदल की वीरगाथाओं के लिए मशहूर इस ज़िले में सियासी तापमान अचानक हाई-वोल्टेज हो गया.
मंत्री RSS की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक कार्यक्रम में शामिल होकर लौट रहे थे. कार्यक्रम के बाद उन्हें लिलवाही गांव में जल जीवन मिशन के तहत एक ग्रामीण पेयजल परियोजना का उद्घाटन करना था. लेकिन जिला मुख्यालय में अचानक हालात बदल गए. खुदी हुई सड़कें, अधूरे प्रोजेक्ट्स और लीकेज होती पाइपलाइनों को लेकर विधायक और मंत्री के बीच तीखी बहस हो गई.
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, बृजभूषण राजपूत अपने साथ स्थानीय लोग और गांवों के प्रधान लेकर आए थे. उनके हाथ में शिकायतों से जुड़े काग़ज़ात थे. आरोप साफ़ था कि जल जीवन मिशन के नाम पर सड़कें खोद दी गईं, पाइपलाइन बिछा दी गई, लेकिन न सड़कें दुरुस्त हुईं और न लोगों को नियमित पानी मिला. एक वीडियो में मंत्री कहते सुने गए, “मैं आपके साथ 40 गांवों का दौरा करूंगा. अगर पानी नहीं मिला तो दोषी अधिकारियों को सस्पेंड कर दूंगा. सड़कें खुदी होंगी तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी.”
जब माहौल और गर्माया, तो मंत्री को विधायक का हाथ पकड़कर उन्हें कार में बैठने के लिए कहते भी देखा गया. जाते-जाते विधायक ने मीडिया से कहा, “हर घर नल योजना के तहत काम रुके हुए हैं. सड़कें खुदी हुई हैं. हम मंत्री को मौके पर ले जा रहे हैं.” बाद में मंत्री और विधायक जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय पहुंचे, जहां रुके हुए कामों पर चर्चा हुई. लेकिन तब तक यह टकराव सिर्फ़ प्रशासनिक नहीं, राजनीतिक बन चुका था.
‘मॉडल जिला’ का विरोधाभास
महोबा कुछ महीने पहले तक जल जीवन मिशन की आदर्श मिसाल माना जा रहा था. अप्रैल 2024 में तमिलनाडु के नीलगिरी के बाद महोबा को देश में दूसरा और उत्तर प्रदेश में पहला स्थान मिला था. केंद्र सरकार ने मार्च 2024 की प्रगति के आधार पर देश के 299 जिलों की रैंकिंग जारी की थी, जिसमें यूपी ने कई राज्यों को पीछे छोड़ा. बुंदेलखंड से टॉप-10 में दो जिलों का नाम आना सरकार की बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया गया. लेकिन 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत तक ज़मीनी हालात बदलते दिखने लगे.
चरखारी ब्लॉक के सूपा गांव में ‘हर घर नल से जल’ योजना के तहत सड़कें जगह-जगह खोदी गईं. पाइपलाइन डालने के बाद कई जगह लीकेज शुरू हो गया. नतीजा यह कि सड़कें पानी से लबालब भर गईं. ग्रामीणों का कहना है कि गड्ढों और जलभराव की वजह से बच्चों और बुज़ुर्गों का निकलना मुश्किल हो गया है. महोबा शहर के मोहल्ला भैरवगंज में भी कुछ ऐसा ही हाल है. पाइपलाइन बिछाने के लिए सड़क खोदी गई, लेकिन मरम्मत अधूरी छोड़ दी गई. घटिया पाइपलाइन की वजह से जगह-जगह लीकेज है. स्थानीय निवासी कहते हैं कि बरसात के दिनों में हाल और बदतर हो जाता है. प्रशासन दावा करता है कि पाइपलाइन बिछाने के बाद 98 प्रतिशत सड़कें दुरुस्त करा दी गई हैं, लेकिन ज़मीनी तस्वीर अलग है. कस्बों और गांवों में आज भी कई सड़कें खुदी पड़ी हैं. कई जगह पाइपलाइन लीकेज से जलभराव हो रहा है, जिससे आवागमन प्रभावित है.
आंकड़ों की जंग, ज़मीन की कहानी
‘नमामि गंगे योजना’ के तहत जिले में पाइपलाइन बिछाने का काम कराया गया. ग्रामीण इलाकों की सीसी (सीमेंट-कंक्रीट) सड़कों को खोदकर पाइपलाइन तो डाल दी गई, लेकिन कई जगह पुनर्निर्माण अधूरा रह गया. जिले में जल जीवन मिशन के तहत पांच पेयजल परियोजनाएं संचालित हैं. प्रशासन के मुताबिक, पाइपलाइन बिछाने के लिए 1,131 किलोमीटर सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं, जिनमें से 1,118 किलोमीटर को दुरुस्त करा दिया गया है. अपर जिलाधिकारी (नमामि गंगे) मोइनुल इस्लाम कहते हैं, “शेष सड़कों को दुरुस्त करने का काम चल रहा है. प्रधानों और जनप्रतिनिधियों की शिकायत पर तुरंत समाधान कराया जाता है.”
जिलाधिकारी गजल भारद्वाज के अनुसार, रिकॉर्ड में 90 प्रतिशत से अधिक काम पूरा हो चुका है. लेकिन सवाल यह है कि अगर काम लगभग पूरा है, तो विधायक को सड़क पर उतरकर मंत्री का काफ़िला रोकने की ज़रूरत क्यों पड़ी? महोबा जिले की कबरई नगर पंचायत में जल जीवन मिशन की एक और तस्वीर दिखती है. यहां कस्बे के विभिन्न वार्डों में पानी की टंकियां तो खड़ी हैं, लेकिन कई चालू होने से पहले ही क्षतिग्रस्त हो गईं. कहीं बोर पर्याप्त नहीं, कहीं रखरखाव नहीं. करीब 40 हजार की आबादी इस समय पेयजल संकट से जूझ रही है.
सियासत की परतें : कुर्मी बनाम लोध
30 जनवरी की घटना के बाद सियासत ने तेज़ रुख लिया. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने वीडियो शेयर कर आरोप लगाया कि BJP विधायक ने अपनी ही सरकार के मंत्री को ‘बंधक’ बना लिया. उन्होंने तंज कसते हुए लिखा, “यह डबल इंजन सरकार नहीं, डिब्बों की आपसी टक्कर है.” राजनीतिक जानकार इसे सिर्फ़ प्रशासनिक असंतोष नहीं मानते. बुंदेलखंड में जातीय समीकरण हमेशा अहम रहे हैं. महोबा-चरखारी इलाके में लोधी समाज का प्रभाव माना जाता है. बृजभूषण राजपूत इसी समाज का बड़ा चेहरा हैं. वहीं स्वतंत्र देव सिंह कुर्मी समुदाय से आते हैं, जिसे BJP में संगठनात्मक तौर पर मजबूत माना जाता है. ऐसे में यह टकराव सिर्फ़ विकास कार्यों का नहीं, बल्कि 2027 से पहले बदलती राजनीतिक धुरी का संकेत भी माना जा रहा है.
चरखारी से दो बार के विधायक बृजभूषण राजपूत की पहचान एक तेज-तर्रार नेता की है. उमा भारती के करीबी माने जाते हैं. 2017 से वे लगातार BJP के टिकट पर जीत रहे हैं. 2022 में उन्होंने सपा उम्मीदवार को 41 हजार से अधिक वोटों से हराया था. उनके पिता गंगाचरण राजपूत का राजनीतिक इतिहास लंबा और उतार-चढ़ाव भरा रहा है, जनता दल, BJP, कांग्रेस, सपा और बसपा तक का सफ़र. तीन बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा सांसद रहे गंगाचरण अपने विवादित तेवरों के लिए भी जाने जाते रहे हैं. 2004 में सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की मांग को लेकर दिल्ली में रिवॉल्वर कांड आज भी लोगों को याद है. राजनीतिक रणनीतिकारों का मानना है कि बृजभूषण राजपूत का यह आक्रामक रुख अपने क्षेत्र में ‘हम जनता के साथ हैं’ का संदेश देने की कोशिश भी है. 2027 से पहले अगर योजनाओं की हकीकत लोगों के बीच नाराज़गी पैदा कर रही है, तो विधायक खुद को उसका मुखर चेहरा बनाकर पेश करना चाहते हैं.

