बीजेपी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नामों को अंतिम रूप दे दिया है और 5 फरवरी को होने वाले मतदान से पहले राज्य की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) के खिलाफ अपना कैंपेन लगातार तीखा करती जा रही है.
दिल्ली में बीजेपी 1998 से ही सत्ता से दूर रही है. जब कांग्रेस ने भगवा पार्टी को सत्ता से बेदखल कर 15 साल तक लगातार सरकार चलाई, उसके बाद एक साल के राष्ट्रपति शासन को छोड़कर लगातार अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आप की ही सरकार दिल्ली में रही है.
इस चुनाव में बीजेपी को पूरा भरोसा है कि वह सत्ता विरोधी लहर का पूरा फायदा उठाएगी और अब तक कांटे की टक्कर लग रहे मुकाबले में जीत हासिल करेगी. लेकिन पार्टी की योजना दिल्ली चुनाव से कहीं आगे की है क्योंकि शीर्ष नेतृत्व न केवल संगठन बल्कि केंद्र सरकार में भी बदलाव करने में व्यस्त है.
अंदरूनी तौर पर भी बीजेपी चुनावी मोड में है क्योंकि वह जेपी नड्डा की जगह एक नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति करना चाहती है, जो 20 जनवरी को पार्टी के शीर्ष पद पर चार साल पूरे कर चुके हैं. इसके बाद नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल के साथ-साथ नीति आयोग और अन्य संवैधानिक निकायों का पुनर्गठन होने की संभावना है. उधर प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय की मृत्यु के बाद यह अहम जिम्मेदारी अब आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी को सौंपी गई है.
पिछले साल के अंत में हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों में मिली शानदार जीत ने बीजेपी को लोकसभा चुनाव में उम्मीद से कम प्रदर्शन की निराशा से उबरने में मदद की. दिल्ली में 8 फरवरी को नतीजे घोषित किए जाएंगे और एक अच्छी खबर पार्टी का मनोबल और मजबूत ही करेगी. बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पार्टी के सफल चुनाव अभियान चलाने और राज्यों में अलग-अलग गुटों एकजुट रखने की क्षमता में कैडर का विश्वास फिर से स्थापित हो गया है. अगर पार्टी दिल्ली में जीत का स्वाद चखती है, तो राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता का हस्तांतरण आसान होगा.
महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी और उसके वैचारिक अभिभावक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के बीच तनाव कम हो गया है और कामकाजी संबंध फिर से स्थापित हो गए हैं. दोनों पक्ष के नेता समस्याओं को हल करने के लिए मिलकर विचार-विमर्श कर रहे हैं.
बीजेपी ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अपनी इकाइयों के लिए अध्यक्षों के चुनाव की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है. इसके लिए चुनाव प्रभारी नियुक्त किए जा चुके हैं. संबंधित क्षेत्रों के आरएसएस के प्रांत प्रचारकों और क्षेत्रीय प्रचारकों की राय ली जा रही है. जनवरी के अंत में संसद का बजट सत्र शुरू होने तक चुनाव पूरे हो जाने की उम्मीद है.
राज्य इकाई के चुनाव पार्टी के अगले राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन के लिए मंच तैयार करेंगे. संभावना है कि तेलंगाना, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र और तमिलनाडु को नए अध्यक्ष मिल सकते हैं, जबकि हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और कुछ अन्य राज्यों में मौजूदा अध्यक्षों को फिर से चुना जा सकता है. पंजाब और पश्चिम बंगाल के साथ-साथ कुछ अन्य राज्यों को नए इकाई प्रमुखों के लिए इंतजार करना पड़ सकता है. इन राज्यों ने अभी तक अपने संबंधित सदस्यता अभियान पूरे नहीं किए हैं. बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के लिए कम से कम आधे राज्य इकाई प्रमुखों का चुनाव होना जरूरी है.
बीजेपी में गहन विश्लेषण और दूरदर्शिता के बिना कोई भी काम नहीं चलता. राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन पर अंतिम निर्णय लेने के साथ-साथ पार्टी थिंक टैंक संभावित केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल और सरकारी ढांचे में बदलाव पर भी विचार कर रहा है. नेतृत्व कुछ वरिष्ठ मंत्रियों को पार्टी संगठन में वापस भेजने के बारे में सोच रहा है.
बीजेपी के एक शीर्ष नेता ने इंडिया टुडे से कहा कि दिल्ली चुनाव और केंद्रीय बजट के बाद, बिहार चुनाव की तैयारियों में फिर से तेजी आने से पहले कुछ समय के लिए शांति की उम्मीद है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, "यह बदलाव लाने का सबसे सही समय होगा." वे यह भी कहते हैं कि आगामी दिल्ली चुनाव में आप को चुनौती देने वाली मुख्य पार्टी को अच्छे प्रदर्शन का भरोसा है. उनके मुताबिक, "निश्चित रूप से मूड उतना उदास नहीं है जितना पिछले साल जून में [आम चुनाव के नतीजों के बाद] था. उस समय, पार्टी किसी भी तरह की अचानक प्रतिक्रिया से बचना चाहती थी. लेकिन अब, एक फेरबदल की जरूरत है. नए लोगों को शामिल किया जाना चाहिए."
आरएसएस की ओर से वरिष्ठ प्रचारक सुरेश सोनी ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह और नड्डा के साथ भावी बीजेपी नेतृत्व पर शुरुआती दौर की बातचीत की है. नए प्रमुख को लेकर आरएसएस के दत्तात्रेय होसबोले और बीजेपी के शीर्ष नेताओं के बीच भी चर्चा हुई है. आरएसएस नेताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि नए बीजेपी प्रमुख को वह गंभीरता दिखानी चाहिए जो इस पद की मांग करती है. लोकसभा चुनाव के निराशाजनक नतीजों के बाद संघ ने बीजेपी नेतृत्व से इस बात पर नाराजगी जताई थी कि आरएसएस नेताओं और उनके फीडबैक से कैसे निपटा गया.
मोदी सरकार में पदानुक्रम तय करने के साथ-साथ पार्टी के चुनावी प्रबंधन और राज्यपालों के चयन में संघ का दखल पहले से ही दिखाई दे रहा है. सरकार के तीसरे कार्यकाल में, आरएसएस ने सुनिश्चित किया है कि सत्ता केवल अमित शाह के पास ही केंद्रित न रहे. यह शिवराज सिंह चौहान जैसे दिग्गज नेताओं को सत्ता सौंपने में दिखता है, जिन्हें प्रधानमंत्री की ओर से घोषित योजनाओं और पिछले साल केंद्रीय बजट के क्रियान्वयन की समीक्षा करने का काम मिला. पहले यह काम अमित शाह संभालते थे.
इसके अलावा, महाराष्ट्र चुनाव अभियान में देवेंद्र फडणवीस और नितिन गडकरी जैसे स्थानीय क्षत्रपों की भूमिका कहीं ज़्यादा थी. महायुति के नए मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री फडणवीस की स्पष्ट छाप है, जबकि सुधीर मुनगंटीवार जैसे शाह के वफादारों को इससे बाहर रहना होगा. आरएसएस ने दो और बदलावों पर जोर दिया है- राम माधव की बीजेपी में वापसी और प्रचारक से बीजेपी नेता बने संजय जोशी की सुरक्षा बढ़ाई गई है, जिन्हें मोदी-शाह का आलोचक माना जाता है.
बदलते समीकरणों से पता चलता है कि बीजेपी के नए अध्यक्ष के चयन में आरएसएस की भूमिका अधिक हो सकती है. यह तय है कि दिल्ली चुनाव के नतीजों के साथ राजनीतिक हलचल खत्म नहीं होगी. बीजेपी 2025 तक बड़े बदलाव की ओर अग्रसर है.
You

