अयोध्या से शुरू हुई एक नियुक्ति ने उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर असहज सवाल खड़े कर दिए हैं. राम मंदिर और ‘राम राज्य’ की राजनीतिक प्रतीकात्मकता के केंद्र माने जाने वाले इस शहर में पार्टी ने अपनी महानगर इकाई में शिवेंद्र सिंह को महामंत्री बनाया, जिनका नाम गैंगस्टर एक्ट समेत कई आपराधिक मामलों में जुड़ा बताया जा रहा है.
जैसे ही सूची सार्वजनिक हुई, पार्टी के अंदर ही असहमति की आवाजें उठने लगीं. यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की नियुक्ति का नहीं रह गया, बल्कि इसने उस पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए, जिसके तहत हाल में प्रदेश भर में जिला कार्यकारिणियां घोषित की गई हैं. हालांकि अयोध्या के इस मामले में कई परतें हैं.
एक तरफ शिवेंद्र सिंह का दावा है कि उनके खिलाफ ज्यादातर मामले राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के तहत दर्ज हुए और अब बहुत कम मामले लंबित हैं. दूसरी तरफ, पार्टी के अंदर के कुछ वरिष्ठ नेता मानते हैं कि ऐसे संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल जिले में नियुक्ति करते समय अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए थी. अयोध्या से ताल्लुक रखने वाले एक वरिष्ठ नेता का कहना है, “अयोध्या सिर्फ एक जिला नहीं है, यह हमारी वैचारिक राजनीति का प्रतीक है. यहां किसी भी विवादित छवि वाले व्यक्ति की नियुक्ति से संदेश गलत जाता है.”
विवाद को और हवा तब मिली जब राम मंदिर दर्शन के लिए गए नवनियुक्त पदाधिकारियों के साथ शिवेंद्र सिंह नजर नहीं आए. इसे पार्टी के भीतर असहजता के संकेत के तौर पर देखा गया. सूत्रों का कहना है कि नियुक्ति के समय उनके खिलाफ दर्ज मामलों की पूरी जानकारी सभी स्तरों पर साझा नहीं की गई थी. बाद में जब स्थानीय स्तर पर पुष्टि हुई, तब कुछ नेताओं ने आपत्ति जताई, लेकिन तब तक सूची घोषित हो चुकी थी.
जिला कार्यकारिणी के गठन में नियमों की अनदेखी
अयोध्या का मामला अकेला नहीं है. हाल में घोषित जिला कार्यकारिणियों पर नजर डालें तो कई जिलों में नियमों और गाइडलाइंस की अनदेखी के आरोप सामने आए हैं. यही वजह है कि काफी मशक्कत और देरी के बाद बनी ये कार्यकारिणियां घोषणा के तुरंत बाद विवादों में घिर गईं. सबसे पहले प्रक्रिया पर ही सवाल उठ रहे हैं. पार्टी ने 2 मार्च तक सभी जिलों में कार्यकारिणी गठन का लक्ष्य रखा था, लेकिन यह काम लगभग तीन हफ्ते की देरी से पूरा हुआ. इसके बावजूद गोरखपुर मंडल के जिलों में अब तक कार्यकारिणियां घोषित नहीं हो सकीं. एक संगठनात्मक पदाधिकारी मानते हैं कि “इतनी लंबी देरी के बाद उम्मीद थी कि सूची पूरी तरह संतुलित और विवादमुक्त होगी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.”
दूसरा बड़ा विवाद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की नियुक्ति को लेकर है. अयोध्या इसका सबसे चर्चित उदाहरण बना, लेकिन कुछ अन्य जिलों में भी स्थानीय स्तर पर इसी तरह के आरोप लगे हैं. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह BJP की उस छवि के विपरीत है, जिसे वह ‘सुशासन’ और ‘कानून-व्यवस्था’ के मुद्दे पर लगातार मजबूत करने की कोशिश करती रही है. लखनऊ के एक राजनीतिक विश्लेषक अमित राय कहते हैं, “BJP ने पिछले कुछ वर्षों में कानून-व्यवस्था को अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया है. ऐसे में संगठन के भीतर ही अगर विवादित छवि वाले लोग अहम पदों पर दिखेंगे, तो विपक्ष को हमला करने का मौका मिलेगा.”
लखनऊ में एक अलग तरह का विवाद सामने आया. यहां एक सरकारी शिक्षक को जिला मीडिया प्रभारी बना दिया गया, जबकि सेवा नियम स्पष्ट रूप से सरकारी कर्मचारियों को किसी राजनीतिक दल का पदाधिकारी बनने से रोकते हैं. इस नियुक्ति ने प्रशासनिक और कानूनी सवाल खड़े कर दिए हैं. शिक्षा विभाग के एक अधिकारी का कहना है, “यह सीधे-सीधे सेवा नियमों का उल्लंघन है. अगर कोई शिक्षक सक्रिय राजनीति में पद लेता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है.”
इस मामले में संबंधित शिक्षक का तर्क अलग है. उनका कहना है कि परिषदीय शिक्षक की स्थिति अलग होती है और उन्हें ‘गुरु’ का दर्जा मिला है, लेकिन विभागीय अधिकारी इस तर्क को स्वीकार नहीं कर रहे. इससे यह साफ होता है कि नियुक्तियों में नियमों की व्याख्या को लेकर भी अस्पष्टता और ढीलापन रहा है.
महिला व जातीय संतुलन पर सवाल
महिला प्रतिनिधित्व को लेकर भी पार्टी की अपनी गाइडलाइन का पालन नहीं हुआ. नियम के अनुसार हर जिला कार्यकारिणी में कम से कम सात महिलाओं को शामिल करना जरूरी है, लेकिन ललितपुर को छोड़कर अधिकांश जिलों में यह कोरम पूरा नहीं किया गया. जिला कार्यकारिणी सदस्यों में भी 30 महिलाओं को शामिल करने का प्रावधान है, जो कई जगहों पर अधूरा रह गया. जातीय संतुलन को लेकर भी सवाल उठे हैं. पार्टी ने अनुसूचित जाति और जनजाति से कम से कम दो पदाधिकारी रखने और ओबीसी प्रतिनिधित्व को स्थानीय सामाजिक समीकरण के अनुसार तय करने की बात कही थी. लेकिन सूत्रों का दावा है कि कुछ जिलों में इन नियमों को ‘मैनेज’ करने की कोशिश हुई. यहां तक कि कुछ मामलों में उपनाम हटाकर जातीय पहचान को लेकर भ्रम पैदा करने के आरोप भी लगे हैं.
उम्र सीमा भी एक और विवाद का कारण बनी. प्रदेश नेतृत्व ने 30 से 50 साल के बीच के कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने की बात कही थी, ताकि संगठन में युवा नेतृत्व उभर सके. लेकिन कई जिलों में 60-65 साल के नेताओं को भी पद दे दिए गए. इससे युवा कार्यकर्ताओं में असंतोष है. एक युवा कार्यकर्ता का कहना है, “जब गाइडलाइन ही लागू नहीं होनी थी, तो फिर उसे जारी करने का क्या मतलब था?”
इन सभी विवादों के बीच सबसे अहम मुद्दा संगठन और सत्ता के बीच संतुलन का है. पार्टी सूत्र बताते हैं कि जिला कार्यकारिणी के गठन में विधायकों और प्रभावशाली नेताओं की सिफारिशों को काफी महत्व दिया गया. इसका नतीजा यह हुआ कि कई जगहों पर ‘कैडर आधारित’ कार्यकर्ताओं की जगह ‘सिफारिश आधारित’ नियुक्तियां हो गईं. एक वरिष्ठ BJP नेता स्वीकार करते हैं, “यह सच है कि कई जगहों पर स्थानीय समीकरण और राजनीतिक दबाव हावी रहे. संगठन को पूरी तरह स्वतंत्र तरीके से काम करने का मौका नहीं मिल पाया.”
यही वजह है कि दूसरी पार्टियों से आए नेताओं का प्रभाव भी बढ़ता दिख रहा है. पार्टी के भीतर यह चर्चा है कि करीब 30 फीसदी विधायक दूसरे दलों से आए हैं और वे अपने-अपने क्षेत्रों में अलग नेटवर्क के जरिए काम करते हैं. अब उनके समर्थकों को संगठन में जगह मिलने से पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी है. लखनऊ के सरोजनी नगर का उदाहरण भी इसी संदर्भ में दिया जा रहा है, जहां एक विधायक के समर्थकों को नजरअंदाज कर विरोधियों को जगह देने का आरोप लगा है. इससे स्थानीय स्तर पर गुटबाजी तेज होने की आशंका है.
विवादों का होगा राजनीतिक असर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये विवाद सिर्फ संगठनात्मक खामियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके राजनीतिक असर भी हो सकते हैं. उत्तर प्रदेश में BJP को 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी करनी है और संगठन इसकी रीढ़ होता है. अगर कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ता है, तो इसका असर चुनावी मशीनरी पर पड़ सकता है. एक विश्लेषक कहते हैं, “BJP की ताकत उसका कैडर रहा है. अगर वही कैडर खुद को हाशिए पर महसूस करेगा, तो यह पार्टी के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकता है.” हालांकि, वे यह भी जोड़ते हैं कि पार्टी के पास अभी समय है और वह इन खामियों को सुधार सकती है.
पार्टी के आधिकारिक रुख में इन विवादों को ज्यादा महत्व नहीं दिया जा रहा. कई नेता इन्हें ‘स्थानीय स्तर की असहमति’ बताकर खारिज कर रहे हैं. अयोध्या के मामले में भी स्थानीय नेतृत्व का कहना है कि “मुकदमा दर्ज होने से कोई अपराधी नहीं हो जाता” और जांच की प्रक्रिया चलती रहती है. लेकिन अंदरखाने यह स्वीकार किया जा रहा है कि सूची बनने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और संवाद की कमी रही. यही कारण है कि सूची घोषित होने के बाद ही आपत्तियां सामने आईं.

