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पटना में रिसर्च पार्क, 10 हजार युवाओं को नौकरी; AI समिट से मिली सौगात बिहार में क्या बदलेगी?

दिल्ली में चल रही AI इम्पैक्ट समिट में बिहार ने 468 करोड़ रुपए के समझौते पर दस्तखत किए हैं, जिसके तहत राज्य में 10,000 से ज्यादा नौकरियां पैदा होंगी

दिल्ली में आयोजित AI इम्पैक्ट समिट की तस्वीर
दिल्ली में आयोजित AI इम्पैक्ट समिट की तस्वीर
अपडेटेड 19 फ़रवरी , 2026

बिहार के विकास के लंबे और अक्सर थकाऊ इतिहास में संदेह की भावना राज्य की प्रगति से कहीं अधिक तेजी से फैली है. कई दशकों से बिहार पलायन, कम पूंजी निवेश और विकास में पीछे रहने के कारण चर्चा में रहा है. हालांकि, दिल्ली में होने वाले AI इम्पैक्ट समिट में बिहार ने इन सबसे हटकर बिल्कुल अलग कहानी पेश की.

17 फरवरी को नई दिल्ली के भारत मंडपम की जगमगाती रोशनी के बीच बिहार सरकार ने 468 करोड़ रुपए के समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए. यह कदम राज्य में 10,000 से ज्यादा नई नौकरियां पैदा करने के उद्देश्य से उठाया गया है.

AI समिट में हुए इस समझौते के तहत भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) पटना में 250 करोड़ रुपए की लागत से एक रिसर्च पार्क बनाया जाना है. यह रिसर्च पार्क केवल प्रदर्शन के लिए नहीं है, बल्कि यहां एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार किया जा रहा है जो प्रयोगशाला और बाजार के बीच की दूरी को कम करने के लिए डिजाइन किया गया है.

अगर इस प्रोजेक्ट को गंभीरता से लागू किया जाता है, तो IIT पटना का रिसर्च पार्क आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड एनालिटिक्स से जुड़े स्टार्टअप्स के लिए देश में एक प्रमुख सेंटर बन सकता है. ये ऐसे क्षेत्र हैं जो एकेडमिक टैलेंट की मदद से ही सफल हो सकते हैं.

इस शिखर सम्मेलन को अपनी तरह के सबसे भव्य सम्मेलनों में से एक बताया जा रहा है. 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधि, 40 से अधिक प्रमुख टेक कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEOs), और देश-विदेश के राष्ट्राध्यक्षों व मंत्रियों की मौजूदगी ने इसके महत्व को और बढ़ा दिया है. इस अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में बिहार की प्रस्तुति काफी महत्वपूर्ण रही.

इंडिया AI इंपैक्ट समिट में बिहार GCC नीति 2026 और बिहार IT नीति 2024 के तहत हुए समझौता ज्ञापनों (MoUs) से निवेश का दायरा और भी बढ़ गया है. ये कोशिशें बिहार ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) नीति 2026 के अनुरूप हैं, जो फरवरी 2026 से प्रभावी हुई है. इस नीति का मुख्य उद्देश्य राज्य को एक प्रमुख IT केंद्र में बदलना है.

यह नीति बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित करने के लिए 50 करोड़ रुपए तक की पूंजीगत सब्सिडी देती है, जिसमें AI, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और हाई-स्किल्ड रोजगार पर विशेष जोर दिया गया है. इसके लक्ष्यों में फॉर्च्यून 1000 और फोर्ब्स 2000 कंपनियां शामिल हैं, जो बिहार सरकार की महत्वाकांक्षा और दूरदर्शिता दोनों के संकेत हैं.

कुल मिलाकर, ये नीतियां और समझौते इस बात का संकेत देते हैं कि बिहार, जो कभी भारत की टेक्नोलॉजी मैप पर हाशिए पर था, अब तकनीकी योजनाओं में महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर रहा है. बिहार में AI सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाने के लिए 60 करोड़ रुपए का MoU साइन किया गया है.

इस इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट को जानबूझकर त्रिपक्षीय बनाया गया है. टाइगर एनालिटिक्स कंपनी के साथ मिलकर IIT पटना इस योजना पर काम कर रही है, जबकि राज्य सरकार सहयोग मुहैया कर रही है. बिहार में AI विकास का यह मॉडल भारतीय नीति निर्माण में इस बढ़ती मान्यता को दर्शाता है कि इनोवेशन को केवल सरकारी आदेश से ही सफल नहीं बनाया जा सकता, बल्कि इसके लिए पूंजी, एकेडमिक सहयोग और समन्वय जरूरी है.

इस पहल से अनुमान है कि नई और उभरती टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में 10,000 से ज्यादा नए रोजगार पैदा होंगे. इतना ही नहीं राज्य में AI से जुड़े इन समझौते के कारण 50,000 से अधिक युवाओं को स्किल डेवलपमेंट यानी कौशल विकास प्रशिक्षण प्राप्त होगा. एक ऐसे राज्य में जहां बड़ी संख्या में युवाओं की आबादी रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करती है, वहां अब घर पर ही अच्छी तनख्वाह वाली नौकरियों का वादा आर्थिक और सामाजिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है.

बिहार के इन प्रशासनिक प्रयासों का नेतृत्व मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत कर रहे हैं, जो 1991 बैच के IAS अधिकारी हैं. बिहार के उभरते प्रौद्योगिकी ढांचे को आकार देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. हाल ही में स्वीकृत बिहार GCC नीति 2026 और बिहार सेमीकंडक्टर नीति 2026 का उद्देश्य राज्य को पूर्वी और उत्तरपूर्वी भारत के लिए एक प्रौद्योगिकी केंद्र के रूप में स्थापित करना है.

बिहार ने इस क्षेत्र में दिखावटीपन से कहीं अधिक रणनीतिक कदम उठाने शुरू किए हैं. इस क्षेत्र से जुड़े इंवेस्टर को आकर्षित करने के लिए राज्य ने AI, सेमीकंडक्टर के निर्माण और डिजाइन से जुड़े नियमों में कई बड़े बदलाव किए हैं. निवेशकों के हित में आसान कानून बनाए गए हैं.  

राज्य सरकार के आंतरिक कामकाज को नजदीक से देखने वाले लोगों का कहना है कि समय-सीमा, अंतर-विभागीय समन्वय और निवेशकों को सुविधा देने के लिए सरकार का मजबूत इरादा साफ दिखता है. यही वे अहम बातें हैं, जो यह तय  करती हैं कि कोई समझौता जमीन पर आसानी से लागू हो सकता है या केवल एक प्रेस विज्ञप्ति बनकर रह जाता है. एक ऐसे शासन तंत्र में जहां उत्साह अक्सर किसी चीज को लागू करने से आगे निकल जाता है, वहां अमृत प्रत्यय के नेतृत्व में सिस्टम ने इन मामलों में स्थिरता और संतुलन दिखाई है.

बिहार सरकार के मुख्य सचिव प्रत्यय ने AI निवेश को को ना सिर्फ प्रोत्साहन दिया है बल्कि प्रौद्योगिकी क्षेत्र के अग्रणी लोगों के साथ सुनियोजित बातचीत की. बुनियादी ढांचे की कमियों, एकेडमिक टैलेंट और नियमों से जुड़े विषयों पर उनसे गहराई से प्रतिक्रिया ली. अधिकारियों का कहना है कि इन्हीं फीडबैक के आधार पर बिहार में AI को लेकर रूपरेखा तैयार की जा रही है.

इसी का परिणाम है कि AI इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर एक अधिक सुनियोजित दृष्टिकोण सामने आया है. टेक इंडस्ट्री की मांग के मुताबिक प्रशिक्षण ढांचे बनाए गए, नीतिगत प्रोत्साहन खाली सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि वास्तविक चुनौतियों के जवाब में तैयार किए गए. साथ ही संस्थागत साझेदारियां ऐसी बनाई गईं कि कार्यबल की तैयारी और पूंजी का प्रवाह साथ-साथ आगे बढ़ सके.

तेजी से बदलते तकनीकी परिदृश्य में प्रयास केवल उद्योग को आकर्षित करने का नहीं रहा है, बल्कि बिहार के युवा पुरुषों और महिलाओं को इसके अनुरूप तैयार करने का भी है, ताकि निवेश और रोजगार क्षमता एक दूसरे को मजबूत करें.

इस कार्यक्रम और समझौते से पहले भारत मंडपम स्थित बिहार राज्य मंडप का उद्घाटन उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने किया. इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री और राज्य मंत्रिमंडल के सहयोगी भी उपस्थित थे. ऐसे समारोह आमतौर पर औपचारिक होते हैं, लेकिन रिबन काटने के पीछे महीनों की नौकरशाही की तैयारी छिपी होती है. इस पल को साकार करने के लिए भूमि के टुकड़े चिह्नित किए गए, वित्तीय प्रोत्साहन योजनाएं तैयार की गईं और कई सारे नियमों को लेकर स्वीकृतियां प्राप्त की गईं.

बिहार AI मिशन के तहत मेगा AI कोर ऑफ इंजीनियरिंग की घोषणा राज्य की संस्थागत संरचना में तकनीकी क्षमता को समाहित करने के प्रयास को दिखाती है, बजाय इसके कि इस क्षेत्र में विकास के लिए पूरी तरह बाहरी पूंजी पर निर्भर रहा जाए. बेशक, इसका दायरा व्यापक है.

इन प्रयासों के विरोध में तर्क देने वाले लोग स्वाभाविक रूप से बिहार में मौजूद टेक्नोलॉजी की बुनियादी ढांचा, बिजली की विश्वसनीयता और शहरी जीवन की गुणवत्ता जैसे जाने-माने सवाल उठाएंगे. ये वे सामान्य कारक हैं जो यह तय करते हैं कि प्रौद्योगिकी पेशेवर यहीं रहना पसंद करेंगे या नहीं. वे पूछेंगे कि बिहार जैसे राज्य में 10,000 नौकरियां पैदा करना परिवर्तन है या सिर्फ दिखावा.

ये निराधार संदेह नहीं हैं. फिर भी, जैसा कि इतिहास बार-बार दिखाता है, विकास अक्सर अचानक आने के बजाय छोटे-छोटे कदमों से शुरू होता है. जरा सोचिए, बिहार में एक AI रिसर्च पार्क बनेगा, जहां हजारों युवा प्रशिक्षित होंगे. बाद में इन्हीं प्रशिक्षित की एक पीढ़ी राज्य के विकास की दिशा बदल सकते हैं.

दिल्ली के AI समिट में बिहार की उपस्थिति की खासियत उसकी बयानबाजी नहीं बल्कि उसकी रणनीतिक स्थिति है. राज्य बेंगलुरु या हैदराबाद को टक्कर देने का दावा नहीं कर रहा है, बल्कि वह पूर्वी और उत्तरपूर्वी भारत का केंद्र बनने का दावा कर रहा है. एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र जो कंपनियों के लिए कच्चा माल, युवा प्रतिभाओं और क्षेत्रीय मांग के अनुरूप है. यही कारण है कि नीतिगत तौर पर यह एक तर्कसंगत महत्वाकांक्षा लगता है.

आखिरकार, सफलता की असली कसौटी भारत मंडपम में समझौते के बाद बजने वाली तालियां नहीं होंगी, बल्कि महीनों बाद पटना के दफ्तरों में सर्वरों की गूंज और जगमगाती रोशनी ही होगी. अगर IIT पटना का रिसर्च पार्क ऐसा स्थान बन जाए जहां प्रोटोटाइप बनें और पेटेंट दाखिल हों. अगर AI सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऐसी कंपनियों को पनपने दे जो स्थानीय लोगों को नौकरी दें और वैश्विक स्तर पर निर्यात करें. अगर प्रशासनिक मशीनरी अपना मौजूदा अनुशासन और लगन को बनाए रखे, तो बिहार की इस समिट में उपस्थिति को सिर्फ एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि बदलाव के एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में याद किया जाएगा. एक राज्य के लिए यह एक क्रांतिकारी कदम साबित होगा, जिसे लंबे समय से उसके इतिहास की दुहाई देकर कोसा जाता रहा है. 

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