बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी ) की राजनीति बीते दो वर्षों से एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां पार्टी का भविष्य सीधे तौर पर मायावती की विरासत और उनके उत्तराधिकारी की सियासी तैयारी पर टिका है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलितों की ठोस पैठ और सामाजिक इंजीनियरिंग की अद्वितीय मिसाल गढ़ चुकी मायावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पार्टी का जनाधार लगातार सिकुड़ रहा है और संगठनात्मक ऊर्जा कमजोर होती जा रही है.
इसी पृष्ठभूमि में बार-बार सुर्खियों में आने वाले उनके भतीजे आकाश आनंद की भूमिका बेहद अहम हो गई है. आकाश आनंद की राजनीतिक यात्रा अब तक किसी ‘रोलर कोस्टर’ से कम नहीं रही. दिसंबर 2023 में मायावती ने उन्हें पार्टी का ‘राष्ट्रीय समन्वयक’ बनाकर औपचारिक रूप से उत्तराधिकारी घोषित किया था. यह घोषणा बीएसपी कार्यकर्ताओं के लिए उम्मीद की किरण थी क्योंकि लंबे समय से पार्टी में नेतृत्व के उत्तराधिकार को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई थी.
मगर जल्द ही उतार-चढ़ाव का सिलसिला शुरू हो गया. मई 2024 में अचानक आनंद को पद से हटा दिया गया. फिर जून में वापसी हुई. मार्च 2025 में फिर निष्कासित कर दिए गए. अप्रैल में माफी के बाद दोबारा जगह मिली और मई में उन्हें चीफ नेशनल कॉर्डिनेटर बनाया गया. और अब 29 अगस्त 2025 में मायावती ने एक नया पद सृजित कर आकाश आनंद को ‘राष्ट्रीय संयोजक’ बना दिया. यह नियुक्ति न केवल उन्हें संगठन में नंबर दो की पंक्ति में खड़ा करती है बल्कि उनके पिता आनंद कुमार को भी पीछे कर देती है.
नई पारी, नया संकेत
बीएसपी सुप्रीमो मायावती की भतीजे आनंद को लेकर ताजा घोषणा केवल एक औपचारिक फेरबदल नहीं है. राष्ट्रीय संयोजक का पद बीएसपी की कार्यप्रणाली में अब तक मौजूद नहीं था. मायावती ने इसे विशेष रूप से आकाश आनंद के लिए बनाया है. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह कदम प्रतीकात्मक से कहीं अधिक है, यह मायावती की उस रणनीति को दिखाता है, जिसमें वे आकाश के ज़रिये दलित युवाओं को पार्टी से जोड़ना चाहती हैं.
यही वजह है कि आनंद को आने वाले दिनों में “युवा अधिकार यात्रा” की कमान भी सौंपी गई है, जो बिहार से 10 सितंबर से शुरू होगी. यह यात्रा आकाश के लिए केवल एक जनसंपर्क कार्यक्रम नहीं है, बल्कि पार्टी के भविष्य को आकार देने वाली परीक्षा की घड़ी भी है. युवाओं, विशेषकर शहरी और पढ़े-लिखे दलित वोटरों को जोड़ने का जिम्मा आकाश को दिया गया है, क्योंकि मायावती समझती हैं कि उनका पारंपरिक जनाधार अब बीजेपी और समाजवादी पार्टी की तरफ झुक रहा है.
मायावती और उत्तराधिकार की पहेली
बीएसपी की राजनीति में मायावती ही अब तक “चेहरा” और “सत्ता” दोनों रही हैं. चाहे कांशीराम की विरासत हो या खुद का सियासी कद, मायावती ने हमेशा संगठन को केंद्रीकृत नेतृत्व से चलाया. मगर उम्र और बदलते राजनीतिक समीकरणों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि मायावती के बाद बीएसपी की बागडोर किसके हाथ में जाएगी? राजनीतिक विश्लेषक और बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्विद्यालय, लखनऊ में इतिहास विभाग के प्रोफेसर सुशील पांडेय बताते हैं, “कई वर्षों तक मायावती के भाई उनके उत्तराधिकारी के तौर पर देखे जाते थे, लेकिन उन पर लगे भूमि घोटाले से लेकर बेनामी संपत्ति तक आरोपों ने उनकी राजनीतिक साख को कमजोर कर दिया. ऐसे में मायावती को एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो परिवार से हो, मगर अपेक्षाकृत नया और बेदाग दिखे. आकाश आनंद इस शर्त पर खरे उतरते हैं.”
दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़े और लंदन से मैनेजमेंट की पढ़ाई कर चुके आकाश का अंदाज़ मायावती से बिल्कुल अलग है. वे सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं, अंग्रेज़ी-हिंदी दोनों में सहज हैं और रैलियों में युवाओं को सीधे संबोधित करते हैं. बीएसपी कार्यकर्ताओं में उन्हें ‘युवा चेहरा’ मानने की सहमति भी दिखती है.
आकाश आनंद रोलर-कोस्टर पर सवार क्यों रहे
सवाल उठता है कि फिर बार-बार आकाश आनंद को पद से क्यों हटाया और बहाल किया गया? राजनीतिक विश्लेषक इसकी कई वजहें बताते हैं. पांडेय के मुताबिक, “आकाश की कुछ सार्वजनिक टिप्पणियां विवादों में आ गईं, जिन्हें मायावती ने पार्टी की अनुशासनहीनता माना था. बीएसपी के पुराने नेताओं और आनंद कुमार खेमे के बीच आकाश की बढ़ती ताकत पर असहजता रही. उत्तर प्रदेश की चुनावी हारों और कमजोर प्रदर्शन ने मायावती को बार-बार रणनीति बदलने को मजबूर किया. लेकिन इन उतार-चढ़ावों के बावजूद आकाश पार्टी में बने रहे. इससे यह संदेश गया कि मायावती चाहे कितनी भी नाराज हों, अंततः उन्हें अपने भतीजे की जरूरत है.”
बीएसपी के वोट बैंक का ग्राफ लगातार नीचे जा रहा है. वर्ष 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बीएसपी के विधानसभा चुनाव में महज एक सीट पर सिमट गई और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर राज्य में 10 फीसदी से भी कम रहा. दलित वोटरों का बड़ा हिस्सा बीजेपी की ओर गया, जबकि कुछ वोट समाजवादी पार्टी के खेमे में सिमट गया. सुशील पांडेय कहते हैं, “बीएसपी के पास संगठनात्मक ऊर्जा और जनाधार को बचाने के लिए केवल दो ही रास्ते हैं, या तो मायावती खुद मैदान में सक्रिय हों, या फिर आकाश जैसे चेहरे के ज़रिये नई पीढ़ी को आकर्षित करें.चूंकि मायावती की उम्र और राजनीतिक थकान उन्हें हर मोर्चे पर सक्रिय रहने की इजाज़त नहीं देती, इसलिए आकाश पर दांव लगाना अनिवार्य हो गया है.”
युवा अधिकार यात्रा : अगली परीक्षा
बिहार से शुरू होने वाली आकाश की युवा अधिकार यात्रा केवल राजनीतिक जुलूस नहीं है. यह बीएसपी की खोई हुई जमीन तलाशने का एक प्रयोग है. पार्टी इसे राष्ट्रीय स्तर पर पेश करना चाहती है, ताकि आकाश को केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित न माना जाए. यदि यह यात्रा युवाओं और दलित समाज में उत्साह पैदा करने में सफल रही, तो आकाश की भूमिका बीएसपी के भविष्य में निर्णायक हो सकती है. मगर असफलता की स्थिति में यह संदेश जाएगा कि बीएसपी का उत्तराधिकारी प्रयोग भी फ्लॉप हो गया.
दरअसल, मायावती अभी भी पूरी तरह नेतृत्व छोड़ने को तैयार नहीं हैं. उनकी रणनीति साफ है, पार्टी पर नियंत्रण कायम रखना, धीरे-धीरे आकाश को ज़िम्मेदारी सौंपना और पुराने सिपहसालारों और नए चेहरे के बीच संतुलन बनाना. राष्ट्रीय समन्वयक का पद इसी रणनीति का हिस्सा है. इससे आकाश पार्टी में “नंबर दो” बन गए हैं, लेकिन अंतिम फैसले अभी भी मायावती ही लेंगी.
आकाश आनंद के सामने भी चुनौतियां कम नहीं है. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक पार्टी की सांगठनिक जड़ें कमज़ोर हैं. बूथ-स्तरीय कैडर टूटा हुआ है. गठबंधन राजनीति में बीएसपी की साख कमज़ोर हुई है और आज के राजनीतिक हालात में बीजेपी और सपा जैसी बड़ी पार्टियों के बीच जगह बनाना आसान नहीं. इन चुनौतियों के बीच आकाश को अपनी सियासी छवि गढ़नी होगी- सिर्फ मायावती के भतीजे के तौर पर नहीं, बल्कि एक प्रभावी नेता के रूप में.
यह कहानी केवल मायावती और आकाश की नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक प्रयोग की भी है, जिसमें एक बूढ़ा होता संगठन अपने लिए नई सांसें तलाश रहा है. आकाश आनंद उस सांस का नाम हैं. उनके पास वक्त है, मंच है और अब पद भी. सवाल बस यही है कि क्या वे इस मौके को इतिहास में दर्ज कराने में कामयाब होंगे या बीएसपी की सियासत उनके हाथ से भी फिसल जाएगी.