बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 16 जनवरी को जब फिर सड़क पर उतरेंगे तो वे जनादेश मांगने वाले नेता नहीं होंगे बल्कि एक ऐसे नेता होंगे जिस पर जनता की आकांक्षाएं पूरी करने की जिम्मेदारी है. यह समृद्धि यात्रा उनका 17वां राज्यव्यापी दौरा होगा और नवंबर 2025 के विधानसभा चुनावों में शानदार जीत के बाद पहला दौरा होगा, जिसमें नीतीश ने रिकॉर्ड 10वीं बार बतौर मुख्यमंत्री कार्यकाल संभाला है.
नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) ने बिहार की 243 विधानसभा सीटों में 206 पर जीत हासिल करके विपक्ष को इतनी बुरी तरह मात दी जैसा राज्य की अस्थिर राजनीति में कम ही दिखता है. लेकिन ऐसा जनादेश नेतृत्व के तरीके को भी बदल देता है क्योंकि इसके बाद कुछ न कर पाने पर ठीकरा किसी और के सिर फोड़ने, ध्यान भटकाने या भ्रम की स्थिति बनाए रखने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है. इस लिहाज से समृद्धि यात्रा कोई सियासी प्रचार नहीं बल्कि आत्म निरीक्षण है, चुनावी सफलता को प्रशासनिक कार्यों में तब्दील करने की कोशिश है और सिर्फ भाषण के बजाय मतदाताओं को जमीनी स्तर पर काम होने का भरोसा दिलाने की कवायद है.
यात्रा मकर संक्रांति के दो दिन बाद शुरू होगी. मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत की तरफ से जारी एक सरकारी अधिसूचना के मुताबिक, नीतीश कुमार सभी जिलों में जाएंगे, अपनी पिछली प्रगति यात्रा के दौरान शुरू की गई परियोजनाओं का निरीक्षण करेंगे, सात निश्चय कार्यक्रम के तहत चलाई जा रही योजनाओं की समीक्षा करेंगे और अभी जिन अन्य योजनाओं पर काम जारी है उनका आकलन करेंगे. वे आधारशिला रखेंगे, पूरी हो चुकी हो चुकी परियोजनाओं का उद्घाटन करेंगे और जन संवाद में भी हिस्सा लेंगे. जनता के साथ सीधा संवाद हमेशा से ही उनकी शासन शैली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है.
जिलाधिकारियों को बहुत ध्यान से तैयारी करने का निर्देश दिया गया है; निरीक्षण के दौरान विभाग प्रमुख मौजूद रहेंगे; परियोजनाओं के बारे में जानकारी रखने वाले वाले वरिष्ठ अधिकारी समीक्षा बैठकों में शामिल होंगे. संदेश साफ है- शासन और जवाबदेही दोनों सार्वजनिक तौर पर सामने होंगे.
इस तरह नजरों में आना न तो कोई अचानक लिया गया फैसला है, और न ही यह किसी तरह से दिखावटी है. नीतीश के एक लंबे सियासी सफर ने दिखावे के बजाय अपने प्रयासों के दोहराव से ही आकार लिया है- प्रशासनिक कौशल को अपनी आदत बना लेना समय के साथ एक विचारधारा का रूप ले चुका है. 2005 में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने से काफी पहले, उन्होंने बिहार दौरा एक बिल्कुल अलग राजनीतिक परिदृश्य में किया था और उस समय वादा समृद्धि का नहीं बल्कि व्यवस्था का था, विकास का नहीं बल्कि सुशासन का था.
शुरुआती यात्राएं मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने का प्रयास थीं, जिनका उद्देश्य उनकी आशंकाएं दूर करके यह भरोसा जगाना था कि राज्य को अलग तरीके से चलाया जा सकता है. दो दशक बाद बहस का रुख बदल चुका है. अब, सवाल ये नहीं है कि बिहार में सुशासन चल सकता है या नहीं, बल्कि ये है कि क्या इसे उसी अपेक्षित गति से चलाया जा सकता जिस पैमाने पर जनता ने भरोसा जताते हुए इतना भारी जनादेश दिया.
समृद्धि यात्रा को इसी संदर्भ में देखना चाहिए. यह दरअसल चुनाव के बाद राज्य का लेखा-जोखा जनता के सामने रखने की कवायद है. नीतीश सरकार उन परियोजनाओं की समीक्षा कर रही है जिनकी घोषणा, फंडिंग और प्रचार तो पहले ही हो चुका है. प्रगति यात्रा और सात निश्चय के तहत जारी योजनाओं का निरीक्षण करके नीतीश वादों और उन पर अमल के बीच अंतर को और भी स्पष्टता से खत्म करना चाहते हैं.
JDU के प्रवक्ता इस यात्रा को सुशासन का विस्तार करार देते हैं. पार्टी नेताओं का कहना है कि 2005 से पहले के दौरों में भी नीतीश कुमार ने उस कड़वाहट और विरोध वाली राजनीति से परहेज किया था, जो बिहार की राजनीतिक पहचान रही है. उनका तर्क है कि जब नीतीश सत्ता में नहीं थे तब भी विकास ही उनके एजेंडे के केंद्र में था. अब, जब नीतीश 20 साल से राज्य पर शासन कर रहे हैं तो इस आगामी यात्रा का मुख्य उद्देश्य ‘राज्य के विकास’ पर ही केंद्रित है. यह छोटा-सा वाक्य बहुत कुछ कहता है. विपक्ष को लगभग अप्रांसगिक कर देने वाले चुनाव के बाद अब नीतीश के पास राजनीतिक दिखावे की कोई वजह भी नहीं है.
बहरहाल, यात्रा के पीछे की राजनीति स्पष्ट नजर आती है. 206 सीटों का बड़ा बहुमत एक ऐसी भारी जिम्मेदारी है जिसकी कड़ी निगरानी जरूरी है. क्योंकि ऐसी स्थिति में अपने दफ्तर तक सीमित रहने से जनता से कट जाने का खतरा रहता है. यह यात्रा वही खतरा दूर करने की कोशिश है. इसके जरिए मुख्यमंत्री उन जिलों तक पहुंचेंगे जहां योजनाओं को लागू करने में देरी हो रही है या जहां लोगों में किसी तरह की शिकायत है. यही नहीं, इससे प्रशासनिक अफसरों पर भी दबाव बनता है. उन्हें पता होता है कि फील्ड में ही फाइलें मंगवाई जा सकती हैं और मौके पर जवाब देना पड़ सकता है. बिहार की शासन व्यवस्था में कई बार अफसरशाही की वजह से भी काम में देरी होती है, ऐसे में मुख्यमंत्री की सक्रियता इस कमी को दूर करने में प्रभावी साबित हो सकती है.
पिछली बार ऐसी कवायद के तहत प्रगति यात्रा दिसंबर 2024 में पश्चिमी चंपारण के वाल्मीकि नगर से शुरू हुई थी, जो अगले साल गर्मियां आने तक चलती रही थी. वह दौरा काफी विस्तृत था और एक चलती-फिरती कैबिनेट मीटिंग की तरह था, जिसका एजेंडा राजनीति के बजाय स्थानीय जरूरतें पूरी करने पर आधारित था. समृद्धि यात्रा उसी तर्ज पर लगती है लेकिन इस बार पूरा जोर अधूरे कामों को पूरा करने और विकास के मॉडल को बनाने पर होगा.
यह यात्रा राजनीतिक आभार जताने की एक कोशिश भी है. अक्सर बड़ी जीत के बाद नेता जनता से कट जाते हैं और केवल कागजों और आंकड़ों के जरिए शासन करने लगते हैं. नीतीश ने इसके उलट रास्ता चुना. चुनाव के बाद बिहार का दौरा करके, वे सरकार की तरफ से जनता के भरोसे का सम्मान कर रहे हैं. यह इस बात की मौन स्वीकृति भी है कि जनता का वोट उनका अधिकार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है.
बेशक, आलोचक ऐसी यात्राओं की खामियां गिनाने में पीछे नहीं रहेंगे. उनका मानना है, पहले से तय निरीक्षणों में अधिकारी सही तस्वीर सामने रखने के बजाय दिखावटी आंकड़े पेश कर सकते हैं और जनसंवाद कार्यक्रमों में शिकायतें सुनी भले जाती हों लेकिन उनका समाधान होता भी हो, ऐसा जरूरी नहीं है. ये आलोचनाएं पूरी तरह गलत भी नहीं हैं. लेकिन उन्हें शायद बिहार के प्रशासनिक माहौल को ठीक से अंदाजा नहीं है, जहां किसी जिले में मुख्यमंत्री की मौजूदगी मात्र से ही सरकारी प्राथमिकताओं में तुरंत सुधार आ जाता है.
इस बार यात्रा का नाम समृद्धि चुनना एक बारीक बदलाव की ओर संकेत करता है- अब जोर विस्तार से आत्मनिर्भरता की तरफ और निर्माण से निरंतरता की तरफ, पर है. वर्षों तक बुनियादी ढांचे के निर्माण पर जोर देने के बाद अब मुख्यमंत्री का ध्यान इस पर है कि जो बन चुका है, उस पर ठीक से अमल सुनिश्चित हो, योजनाएं उद्घाटन की तस्वीरों तक ही सीमित न रहें बल्कि हर जरूरतमंद तक उसका फायदा पहुंचे. इस तरह समृद्धि यात्रा का उद्देश्य कोई दिखावा नहीं, बल्कि जनता के जीवन में वास्तविक सुधार का एक प्रयास है.
नीतीश की 17वीं यात्रा एक और पहलू सामने लाती है. उनकी सियासी शब्दावली में दोहराव किसी ठहराव का संकेत नहीं बल्कि सुशासन का एक तरीका है. हर यात्रा किसी न किसी वजह से खास रही है- 2005 से पहले विपक्ष की राजनीति, उसके बाद जनसमर्थन बढ़ाना, बीच में दिशा को ठीक करना. अब यह यात्रा एक भारी जीत के बाद हो रही है. इसका उद्देश्य यह पूछना नहीं है कि बिहार क्या चाहता है, बल्कि यह जानना है कि क्या सरकार अपने वादों को पूरा कर पा रही है.
बिहार के मुख्यमंत्री जब यात्रा शुरू करेंगे, तो उनके साथ सिर्फ फाइलों का अंबार या कार्यक्रमों की भरमार ही नहीं होगी, बल्कि विशाल जनादेश का भार भी होगा. समृद्धि यात्रा की सफलता तय की गई दूरी या परियोजनाओं के शिलान्यास-उद्घाटन से तय नहीं होगी बल्कि ये देखा जाएगा कि सरकार विश्वसनीयता की कसौटी पर कितनी खरी उतरी. नीतीश की राजनीतिक पहचान सिर्फ भाषणबाजी के बजाय सुशासन से जुड़ी रही है, और उनकी सफलता को परखने का साधन और कसौटी दोनों सड़क ही रही है.

