दुनिया भर के बच्चों के लिए उम्मीद की किरण मानी जाने वाली संस्था संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) के पटना कार्यालय के सामने उसके ही सैकड़ों कर्मी नाउम्मीद होकर पहुंचे थे. सुबह दस बजे इन लोगों ने UNICEF दफ्तर के बाहर दरी बिछाई और धरने पर बैठ गए.
वे पूरे बिहार में फैले अपने जैसे 368 परिवारों के हक की लड़ाई लड़ने आए थे. उन्होंने अपने जीवन के बीस साल बिहार में पोलियो उन्मूलन और टीकाकरण अभियान को सफल बनाने में खर्च किए थे. इन्हें 'सोशल मोबिलाइजर' का पदनाम दिया गया था.
मगर दो मार्च को होली के ठीक पहले उनके पास एक ई-मेल आया, जिसमें बताया गया कि उनकी सेवा 31 मार्च के बाद समाप्त की जा रही है.
इनके धरने पर बैठते ही थोड़ी देर में पुलिस आ गई और एक घंटा भी नहीं बीता था कि इन्हें उस जगह से हटा दिया गया. मार्च की गर्मी में इन लोगों में से ज्यादातर ने पास के एक पार्क में शरण ली, जबकि कई लोग इसके बावजूद UNICEF दफ्तर के सामने टिके रह गए.
इसी टोली में बेगूसराय से आए ब्लॉक सोशल मोबिलाइजर मुकेश सिन्हा कहते हैं, “मैं पिछले बीस साल से लगातार यह काम कर रहा हूं. 54 साल की उम्र हो गई है. अब अचानक नौकरी से हटाने का नोटिस आ गया है. अब बताइए, इस उम्र में हम लोग क्या कर सकते हैं. अपनी नौकरी बचाने के लिए हम लोग यहां धरना देने आए हैं.”
उनके साथ खड़े पूर्वी चंपारण के एक सोशल मोबिलाइजर ईश्वर चौधरी कहते हैं, “पोलियो टीकाकरण और इम्यूनाइजेशन का काम तो हम लोग करते ही रहे हैं. बिहार में जब भी कोई हेल्थ इमरजेंसी आई, चाहे वह चमकी बुखार हो या कोरोना, स्वास्थ्य विभाग ने हम लोगों को ही पहली पंक्ति के योद्धा के रूप में इस्तेमाल किया. अब बुढ़ापे में हमसे नौकरी छीनी जा रही है. मेरी उम्र 57 साल है और मेरे साथियों की उम्र 40 से 60 वर्ष के बीच है.” वे बताते हैं, “जब से यह ईमेल हमारे पास आया है, हमारे पांच साथियों की मौत हो गई है. रक्सौल के एक साथी को तो खबर सुनते ही हार्ट अटैक आ गया. तनाव की वजह से कई साथी सड़क हादसे का शिकार हो गए हैं. इस एक घटना से राज्य के 368 परिवारों का चूल्हा बंद होने वाला है.”
दरअसल, 2006 में सरकार और UNICEF के साझा सहयोग से 'एसएमनेट' नामक इस अभियान की शुरुआत की गई थी. यहां एसएमनेट का मतलब 'सोशल मोबिलाइजर नेटवर्क' से है. इसकी शुरुआत पोलियो उन्मूलन अभियान को अंजाम तक पहुंचाने के लिए हुई थी. इस अभियान के तहत बिहार में जिला और प्रखंड स्तर पर सोशल मोबिलाइजर रखे गए. इनकी नियुक्ति एक आउटसोर्सिंग एजेंसी के जरिए की गई थी. एक समय इनकी संख्या एक हजार के करीब पहुंच गई थी.
हालांकि, 2014 में भारत ने पोलियो उन्मूलन का लक्ष्य पूरा करने का दावा किया और इसके साथ ही इस टीम का काम भी पूरा हो गया था. मगर इनका काम इतना अच्छा था कि सरकार ने इनकी सेवाएं जारी रखीं और 2015 से बिहार सरकार ही इनका पूरा खर्च UNICEF को देने लगी. इन्हें संपूर्ण टीकाकरण अभियान की जिम्मेदारी दी गई. UNICEF इस अभियान में सिर्फ तकनीकी और प्रशासनिक सहयोग देता रहा है.
मगर जब टीकाकरण का काम भी बेहतर हो गया, तो UNICEF ने खुद को इस अभियान से अलग करना चाहा. 2025 से ही वह सरकार से बात करने लगा कि वह अब एसएमनेट से अलग होना चाहता है.
इंडिया टुडे ने इस मसले पर जब UNICEF की कम्युनिकेशन टीम से संपर्क किया, तो हमें बताया गया कि पिछले एक साल से बिहार सरकार की राज्य स्वास्थ्य समिति के अधिकारियों से इस मसले पर बातचीत चल रही है. UNICEF चाहता है कि संपूर्ण टीकाकरण अभियान अब बिहार सरकार के नेतृत्व में संचालित हो. 2025 में इस मसले पर आखिरी दौर की बातचीत हो चुकी है.
मतलब साफ है कि UNICEF अब इन सोशल मोबिलाइजरों की जिम्मेदारी बिहार सरकार को देना चाह रहा है. वह पिछले एक साल से इसके लिए कोशिश कर रहा है. बिहार सरकार ही इनके कामकाज का फंड देती है, अब बस सरकार को इनकी निगरानी करनी है.
बिहार सरकार के राज्य स्वास्थ्य समिति के टीकाकरण अभियान से जुड़े अधिकारियों से जब इंडिया टुडे ने इस बारे में पूछा, तो उन्होंने आधिकारिक टिप्पणी देने से साफ इनकार कर दिया. मगर अनौपचारिक बातचीत में एक अधिकारी ने कहा कि UNICEF द्वारा पिछले एक साल से बातचीत की जो बात कही जा रही है, वह सही नहीं है. अगर ऐसा कोई प्रस्ताव आता है, तो हम विचार करेंगे.
हालांकि, अलग-अलग सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, बिहार सरकार का स्वास्थ्य विभाग पिछले एक साल से सिर्फ चुनावी वजहों से इस मामले को टाल रहा था. अब आखिरकार UNICEF ने इन सोशल मोबिलाइजरों को हटाने का नोटिस दे दिया है.
अब मसला जो भी हो, बिहार सरकार और UNICEF के बीच संवाद की कमी की वजह से ये सोशल मोबिलाइजर उम्र के इस पड़ाव पर नौकरी गंवाने की स्थिति में पहुंच गए हैं.
इस संकट से परेशान मुकेश सिन्हा कहते हैं, “हम ज्यादा कुछ नहीं चाहते. हम चाहते हैं कि हमें कम से कम साल-दो साल का वक्त मिले ताकि हम अपने लिए कोई दूसरा रास्ता तैयार कर सकें.” उनके ही एक साथी कहते हैं, “368 लोग बचे हैं, पांच से दस साल में सब रिटायर हो जाएंगे. फिर क्यों हमारी जिंदगी खराब की जा रही है?” अब देखना है कि UNICEF और बिहार सरकार इन लोगों के भविष्य पर क्या फैसला लेती है.

