8 जनवरी को जब पटना के सदाकत आश्रम में बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम ने ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ आंदोलन की घोषणा की तो यह तय था कि 10 जनवरी से शुरू होने वाले इस आंदोलन को पार्टी बिहार में अकेले करने जा रही है. इस आंदोलन में उसे RJD या महागठबंधन के किसी दूसरे सहयोगी दल का सहयोग नहीं मिल रहा, न पार्टी उनका सहयोग पाने की कोशिश कर रही है.
इंडिया टुडे ने इस बारे में जब राजेश राम से पूछा तो उनका कहना था, “बिहार में हमने सिर्फ चुनावी गठबंधन किया था. BJP की सांप्रदायिकता, जातिवाद और संविधान पर खिलाफ हमले के खिलाफ यह गठबंधन था. सरकार बनती तो निश्चित तौर पर हम गठबंधन में रहते. मगर चूंकि वोट चोरी के कारण हम हार गए तो अब सभी पार्टियां अपने-अपने हिसाब से काम कर रही हैं. अब जब अगला चुनाव होगा, तब हम फिर से गठबंधन पर विचार करेंगे.”
मगर क्या कांग्रेस और महागठबंधन के दूसरे दलों के बीच की दूरी महज इसलिए है कि उनका गठबंधन चुनावी था, या फिर कांग्रेस अब बिहार में गठबंधन की राजनीति छोड़कर अकेले चलने का मन बना चुकी है? यह बड़ा सवाल है.
हाल के दिनों में यह सवाल इसलिए भी उठ खड़ा हुआ, क्यों कांग्रेस विधायक दल के पूर्व नेता डॉ. शकील अहमद खान ने 30 दिसंबर, 2025 को टीवी चैनलों के साथ अलग-अलग बातचीत में कहा था, “जिस रिश्ते से कोई लाभ नहीं है, उसे छोड़ देना चाहिए.” इसी हवाले से उनका कहना है, “यह मैं नहीं कह रहा. चुनाव के बाद जब समीक्षा हुई तो हमारे साठ के साठ प्रत्याशियों ने यह बात केंद्रीय नेतृत्व के सामने रखी थी और बाद में हमारे सभी जिलाध्यक्षों ने यह बात कही थी.” वे यह सब खास तौर पर RJD के बारे में कह रहे थे. उन्होंने तेजस्वी यादव के काम-काज के तरीकों पर भी सवाल उठाए.
उनके इस बयान से ऐसा लगने लगा कि कांग्रेस का RJD से रिश्ते फिलहाल टूट चुका है. इस बारे में जब राहुल गांधी की टीम से जुड़े एक व्यक्ति से पूछा गया तो उन्होंने कहा, “यह तो पहले ही तय हो गया था. जिस तरह इस बार भी सीट शेयरिंग में चिक-चिक हुई और आखिर तक सीटें फाइनल नहीं हो पाईं. राहुल गांधी ने यह तय कर लिया था कि यह RJD के साथ आखिरी चुनाव है. इसलिए राहुल गांधी ने बहुत अनमने तरीके से चुनाव प्रचार किया.” इसके आगे वे खुद एक सवाल उठाते हैं, “जो सहजता राहुल और तेजस्वी के बीच वोटर अधिकार यात्रा के दौरान थी, वह प्रचार अभियान के दौरान आपने देखी? यह सिर्फ इस बार नहीं हुआ. लोकसभा चुनाव में भी ऐसा ही हुआ था. तब भी राहुल काफी चिढ़ गए थे.”
जब इस बारे में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम से पूछा गया तो उन्होंने कहा, “लोगों का तो शुरू से यही मानना है. कार्यकर्ता और लीडर दोनों कहते हैं कि गठबंधन से हमें बहुत लाभ नहीं है. मगर यह फैसला तो केंद्रीय नेतृत्व लेगा कि हमें गठबंधन करना है या नहीं.”
एक तरफ जहां शकील अहमद खान खुलकर RJD से अलग होने की वकालत कर रहे हैं और राजेश राम दबे स्वर में इस बात का संकेत दे रहे हैं, वहीं कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह इस बारे में अलग राय रखते हैं, “अलग होकर लड़ने की मांग नई नहीं है. मगर 2010 में हम अकेले लड़े और सिर्फ चार सीटें आईं. मौजूदा दौर गठबंधन की राजनीति का है. इसका उदाहरण एनडीए की जीत है. हालांकि अभी हमारे गठबंधन में कई तरह के सुधार की जरूरत है.”
लेकिन RJD के साथ कांग्रेस का गठबंधन बना रहना चाहिए, इसकी वकालत पूर्व सांसद और कांग्रेस छोड़ चुके नेता शकील अहमद भी करते हैं. उन्होंने खुद को कांग्रेस का शुभचिंतक बताते हुए सोशल मीडिया पर लिखा है, “पिछले कुछ दिनों से बिहार के कुछ कांग्रेसी और RJD के नेता फिर से गठबंधन के ख़िलाफ़ बयान दे रहे हैं. हालांकि ये लोग निर्णय लेने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन समाचारपत्रों और सोशल मीडिया पर ऐसे बयान आने से एक दूसरे के साथ दूरियां बढ़ती हैं और भ्रम फैलता है. गांव के चौक-चौराहों पर, चायखानों में या सामाजिक कार्यकर्मों में मेल मिलाप के अवसर पर आपसी वाद-विवाद से कटुता बढ़ती है. दोनों पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को चाहिए कि वे शीघ्र ऐसी हरकतों पर रोक लगाएं.”
शकील आगे यह भी लिखते हैं कि बिहार की राजनीति की कम जानकारी रखने वाले बहुत से लोग यह कहते हैं कि RJD के साथ समझौते की वजह से ही कांग्रेस कमजोर हुई लेकिन यह सही नहीं है.
हालांकि शकील अहमद अभी कांग्रेस में नहीं हैं. वहीं अखिलेश प्रसाद सिंह अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) के सदस्य हैं, मगर चुनाव से पहले उन्हें बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद से हटाया गया था, इसलिए इन दोनों की राय पूरी पार्टी की राय नहीं मानी जा सकती . हालांकि बिहार कांग्रेस में अभी उनका दखल बरकरार है. बिहार के चुनाव में कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व पर टिकट बेचे जाने का आरोप लगाने वाले ज्यादातर नेता उनके ही गुट के माने जाते हैं. बिहार में कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व इन दिनों लगातार कार्यकर्ताओं का विरोध झेल रहा है.
पिछले दिनों मधुबनी में कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के सामने कार्यकर्ता आपस में भिड़ गए थे. ऐसे में वर्तमान नेतृत्व की भी पार्टी पर पूरी पकड़ है, यह कहना मुश्किल है.
जहां अखिलेश लालू और RJD के करीबी माने जाते हैं. वहीं राजेश राम और शकील अहमद खान जैसे नेता अब अकेला चलने का मन बना चुके हैं. कुल मिलाकर कांग्रेस अभी RJD के साथ चलने पर भारी दुविधा में है और दोनों पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व में भी इस मसले को सुलझाने की कोई जल्दबाजी नहीं दिखती.

