13 मई को CBSE बोर्ड की 12वीं के नतीजे आ गए. वैसे तो ये नतीजे देशभर के छात्रों के लिए बहुत अच्छे नहीं रहे. पिछले साल के मुकाबले इस साल 3.19 फीसदी बच्चे कम पास हुए. मगर पटना जोन का रिजल्ट अपेक्षाकृत काफी खराब रहा.
इस जोन के हर चार में से तीन छात्र ही इस साल कॉलेज जा पाएंगे. यहां केवल 74.45 फीसदी छात्र ही पास हुए. पिछले साल के मुकाबले इस जोन के 8.41 फीसदी कम छात्र पास हुए और देशभर में इसका स्थान प्रयागराज जोन के बाद सबसे नीचे रहा. ऐसा क्यों हुआ, इस बारे में जानकार अलग-अलग राय देते हैं.
पटना जोन में बिहार के सभी जिले आते हैं. CBSE की प्रेस रिलीज के मुताबिक इस साल पटना जोन के 942 स्कूलों से 80,161 छात्रों ने 12वीं के लिए रजिस्ट्रेशन किया था. इनमें से 79,012 छात्र परीक्षा में शामिल हुए मगर 58,824 छात्र ही पास हो पाए. दिलचस्प है कि पास करने वालों में छात्राओं का औसत बेहतर है. 81.13 फीसदी छात्राएं पास हुई हैं, जबकि उनके मुकाबले सिर्फ 70.50 फीसदी छात्र पास हो पाए हैं.
इसके मुकाबले 2025 का रिजल्ट देखें तो पटना जोन के 82.86 फीसदी छात्र पास हुए थे. दिलचस्प है कि उस साल 2026 के मुकाबले 30 हजार से अधिक छात्र परीक्षा में शामिल हुए थे. इस साल पटना जोन से 12वीं की परीक्षा देने वालों की संख्या भी गिरी है और पास होने का प्रतिशत भी.
वैसे तो जानकार दो प्रमुख वजहों का जिक्र करते हैं. पहली यह कि इस साल मैथ्स और फिजिक्स के पेपर काफी कठिन थे. वहीं इस साल डिजिटल कॉपी चेकिंग का सिस्टम लागू होने से शिक्षकों को दिक्कत हुई जिसका असर रिजल्ट पर पड़ा.
इस बारे में बात करते हुए 'बिहार पब्लिक स्कूल एंड चिल्ड्रेन वेलफेयर एसोसिएशन' के चेयरपर्सन डॉ. डीके सिंह कहते हैं, “डिजिटल कॉपी चेकिंग का एक मुद्दा तो है ही. मैथ्स और फिजिक्स के पेपर तो IIT के स्टैंडर्ड के आए थे. छात्रों की वैसी तैयारी नहीं थी, इसलिए ज्यादातर छात्र इन्हीं विषयों में फेल हुए.”
मगर यह वजह तो पूरे देश के छात्रों के लिए थी. निश्चित तौर पर इन वजहों से राष्ट्रीय स्तर पर रिजल्ट गिरा है, मगर बिहार का रिजल्ट कुछ ज्यादा ही खराब हुआ है. ऐसा क्यों?
राष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाले एक निजी कोचिंग इंस्टीट्यूट के एचओडी अवधेश गोस्वामी कहते हैं, “दरअसल बिहार के छात्र बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग और मेडिकल की तैयारी के लिए बाहर चले जाते हैं. ऐसे छात्र यहां किसी छोटे-मोटे प्राइवेट स्कूल में एडमिशन ले लेते हैं मगर तैयारी कॉम्पिटिटिव एग्जाम की करते हैं. इसलिए बिहार में इन दिनों 'नॉन अटेंडिंग स्टडी' का कल्चर बढ़ा है. ऐसे छात्रों को सिर्फ 12वीं पास की मार्कशीट चाहिए होती है और वे दोनों काम एक साथ करना चाहते हैं. जबकि दोनों का पैटर्न बिल्कुल अलग है.
CBSE 12वीं में स्टेप-वाइज मार्किंग होती है, जबकि IIT या NEET का सिस्टम अलग है. इसी चक्कर में कई छात्र फेल हो रहे हैं.” एक अन्य शिक्षक ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि उनके गांव के सात बच्चे IIT की तैयारी के लिए कोटा गए थे, जिनमें से पांच 12वीं पास नहीं कर पाए.
इन बच्चों को तैयारी कराने वाले शिक्षक बताते हैं कि छात्रों की तैयारी का तरीका बिल्कुल बदल गया है. एक निजी स्कूल चलाने वाले सुमित कहते हैं, “आजकल यूट्यूब पर कई ऐसे लोग सक्रिय हैं जो छात्रों को चार दिन में परीक्षा पास कराने का वादा करते हैं, कहते हैं कि आखिरी दिन वे ऐसे सवाल बता देंगे जिन्हें पढ़ने से अच्छे नंबर आ जाएंगे. बच्चे अक्सर ऐसे लोगों के चक्कर में फंस जाते हैं और तैयारी नहीं करते. ऐसे बच्चे बड़ी संख्या में फेल हो रहे हैं.”
यूट्यूब पर ऐसे कई चैनल मिल जाते हैं जो पेपर लीक तक का दावा करते हैं. कई चैनल परीक्षा की सुबह चार बजे से बच्चों को कुछ सवाल रटाने लगते हैं ताकि उन्हें अच्छे नंबर मिल जाएं. आजकल बड़ी संख्या में छात्र इन चैनलों के भरोसे रहते हैं. ऐसे में जो छात्र साल भर तैयारी करते हैं उन्हें तो इनसे कुछ लाभ हो जाता है, लेकिन जो सिर्फ इनके भरोसे रहते हैं, वे पिछड़ जाते हैं. सुमित कहते हैं, “बिहार चूंकि एक पिछड़ा राज्य है इसलिए यहां के बच्चे ऐसे यूट्यूबरों पर कुछ अधिक ही भरोसा करने लगते हैं.”
इन बयानों से यह लगता है कि बिहार के छात्रों में बढ़ता 'नॉन अटेंडिंग कल्चर' और यूट्यूबरों पर भरोसा पिछड़ने की नई वजह बन गई है. इस बात को डीके सिंह भी स्वीकार करते हैं. वे कहते हैं, “नॉन अटेंडिंग कल्चर एक खराब सिस्टम है. हम लोग अपने एसोसिएशन में बार-बार यह मुद्दा उठाते हैं और स्कूलों को इस पर रोक लगाने के लिए कहते हैं. अगर आप 75 परसेंट अटेंडेंस के बिना छात्रों को परीक्षा देने देंगे तो दिक्कत होगी. अभी देखिए कि जिन स्कूलों ने ठीक से पढ़ाई कराई और अटेंडेंस पूरी होने के बाद छात्रों को परीक्षा में शामिल होने का अवसर दिया, उनके रिजल्ट बेहतर हैं.”
रिजल्ट बताते हैं कि इस साल केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय और बड़े पब्लिक स्कूलों के नतीजे अच्छे रहे हैं. केंद्रीय विद्यालय का रिजल्ट 99.55 फीसदी और नवोदय विद्यालय का 98.78 फीसदी रहा है. क्या इन स्कूलों के बेहतर रिजल्ट को देखकर वे छात्र और अभिभावक कुछ सीख लेंगे, जो सिर्फ 12वीं पास की मार्कशीट चाहते हैं और बच्चों को 'नॉन अटेंडिंग' स्कूलों में भेजकर बाहर कोचिंग कराते हैं? डीके सिंह कहते हैं, “सबसे अच्छा तरीका है एक बार में एक काम करना. कोचिंग और ऑनलाइन के बदले स्कूली पढ़ाई पर भरोसा करना चाहिए.”

