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बिहार में खत्म होगी शराबबंदी!

बिहार में पहले सिर्फ विपक्षी पार्टियों के नेता शराबबंदी कानून का विरोध करते थे लेकिन अब NDA के सहयोगी दल और JDU के नेता भी इसके खिलाफ बोल रहे हैं

छापा मारकर अवैध शराब जब्त. (Photo: Representational)
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 9 अप्रैल , 2026

अप्रैल के पहले हफ्ते के दौरान मोतिहारी में जहरीली शराब पीने से 11 लोगों की मौत के बाद बिहार के पुलिस महानिरीक्षक विनय कुमार ने जो बयान दिया, उसकी पहली ही लाइन चौंकाने वाली थी. उन्होंने कहा, “मोतिहारी शराबकांड में शराब की जो पूरी खेप थी, वह जब्त कर ली गई है.” आगे उनका कहना था, “आरोपियों की गिरफ्तारी हो गई है, यह बड़ी दुखद घटना थी.”

बिहार में शराबबंदी लागू हुए दस साल बीत चुके हैं. इस दौरान बिहार में ऐसी कई घटनाएं हुईं, जब जहरीली शराब पीने से लोगों की जान गई. जहरीली शराब से राज्य में मरने वालों की संख्या 400 के करीब मानी जाती है. मगर ऐसे मौके बहुत कम आए, जब प्रशासन ने तत्काल यह स्वीकार कर लिया हो कि मौतें जहरीली शराब पीने से हुई हैं.

अमूमन ऐसे मामलों को पुलिस 'संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत' बताती थी और मीडिया को विसरा की जांच रिपोर्ट आने तक धैर्य रखने की सलाह देती रही है. चूंकि शराबबंदी की स्थिति में जहरीली शराब की उपलब्धता पुलिस के कामकाज पर सवालिया निशान लगाती है, इसलिए यह पहला ऐसा मामला है जब पुलिस ने तत्काल स्वीकार किया कि ये मौतें शराब की वजह से हुई हैं. जानकार इसे इस बात का संकेत मान रहे हैं कि अब शायद बिहार सरकार अपने शराबबंदी कानून की समीक्षा करने जा रही है.

कई वजहें हैं शराबबंदी कानून की समीक्षा की

बिहार में 5 अप्रैल 2016 से लागू शराबबंदी कानून की समीक्षा की कई वजहें मानी जा रही हैं. पहली तो यही है कि राज्य में शराबबंदी लागू है, मगर बिहार पुलिस इसे सख्ती से लागू नहीं करा पाई. शराब हर जगह आसानी से उपलब्ध है और इसके कारोबार को लेकर एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है.

राज्य के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक अभयानंद कहते हैं, “मेरा स्पष्ट मानना है कि काले धन और अपराध का आपस में गहरा रिश्ता होता है. शराबबंदी के बाद बिहार में 25 हजार करोड़ रुपए का काले धन का कारोबार तैयार हो गया है. जाहिर है, यह अपराध को भी बढ़ा रहा है.” वहीं नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव कहते हैं, “शराबबंदी के नाम पर बिहार में 40 हजार करोड़ की समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है.”

ये आंकड़े बढ़े-चढ़े हो सकते हैं, मगर इन्हें पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. साथ ही, इसकी वजह से बिहार को होने वाली राजस्व आय का भी भारी नुकसान हो रहा है. वर्ष 2015-16 तक उत्पाद शुल्क के रूप में बिहार को 3142 करोड़ रुपए की आय होती थी, जो अब शून्य हो चुकी है. जाहिर है कि अगले दस सालों में यह आय और बढ़ती.

दूसरी बात यह है कि बीते साल हुए चुनाव में विकास और लोक कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर बिहार सरकार ने लगभग 70-80 हजार करोड़ रुपए खर्च कर दिए हैं. उसका खजाना खाली है, ऐसे में सरकार के सामने अपनी आय बढ़ाने की चुनौती है. मुमकिन है कि यह दबाव अगली सरकार को शराबबंदी कानून की समीक्षा के लिए मजबूर करे.

समीक्षा की दूसरी वजह यह मानी जाती है कि शराबबंदी के बाद बिहार में ड्रग्स का चलन तेज हुआ है. आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं. वर्ष 2015 में जहां बिहार में सिर्फ 14.37 किलो गांजा, 1.12 किलो हेरोइन और 1.97 किलो अफीम जब्त हुई थी, वहीं 2025 में यह आंकड़ा कई हजार गुना बढ़ गया. इस साल बिहार में 28 हजार किलो गांजा, 24 सौ किलो अफीम और पॉपी स्ट्रॉ, 3.25 लाख बोतल कोडीन कफ सिरप और 3.48 लाख नशीली टैबलेट की बरामदगी हुई.

तीसरी वजह यह है कि शराबबंदी के कारण बिहार की अदालतों और जेलों में कामकाज का बोझ बढ़ा है. अब तक शराबबंदी कानून के तहत बिहार में लगभग 6.5 लाख लोगों को सजा सुनाई जा चुकी है. इसके आर्थिक नुकसान भी हैं. शराबबंदी की वजह से कई देसी-विदेशी पर्यटक बिहार में रात को रुकना पसंद नहीं करते, जिसका खमियाजा होटलों को भुगतना पड़ रहा है. ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार इसकी समीक्षा पर विचार कर सकती है.

पहले विरोधी करते थे, अब सहयोगी भी कर रहे शराबबंदी का विरोध

शराबबंदी कानून का विरोध बिहार के राजनेता लगातार कर रहे हैं. पहले इसका विरोध विपक्षी नेता करते थे, अब सहयोगी दल और JDU के नेता भी इसके खिलाफ बोल रहे हैं. शराबबंदी कानून का सबसे मुखर विरोध जनसुराज के नेता प्रशांत किशोर कर रहे हैं. उन्होंने वादा किया था कि अगर उनकी सरकार बनती है, तो वे इस कानून को हटा देंगे. मुख्य विपक्षी दल RJD और महागठबंधन के सहयोगी दल खुलकर इसका विरोध नहीं करते, मगर वे यह जरूर कहते हैं कि इस कानून की वजह से शराब माफिया पैदा हो गए हैं, दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं और सरकार इसे लागू करने में विफल रही है.

सरकार के सहयोगियों में 'हम' नेता जीतन राम मांझी कई बार इस कानून की समीक्षा की मांग कर चुके हैं. बताया जाता है कि चूंकि उनके समुदाय (मुशहर) के लोग पारंपरिक रूप से शराब के कारोबार से जुड़े रहे हैं, इसलिए ऐसा करना उनकी राजनीतिक मजबूरी है.

इस बार बिहार विधानसभा के बजट सत्र में शराब को लेकर काफी चर्चा हुई. विधान परिषद में RJD सदस्य सुनील कुमार सिंह ने तो यहां तक दावा किया कि वे विधानमंडल परिसर में शराब मंगवा सकते हैं. कांग्रेस विधायक अभिषेक रंजन ने कहा कि अगर सभी विधायकों का ब्लड टेस्ट हो, तो शराबबंदी कानून की पोल खुल जाएगी. राष्ट्रीय लोक मोर्चा के विधायक माधव आनंद और BJP नेता लखेंद्र पासवान ने भी इसकी समीक्षा की मांग की. कभी शराबबंदी के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार न होने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इन टिप्पणियों पर कोई विरोध नहीं जताया.

हैरत की बात यह है कि नीतीश कुमार के करीबी रहे सीतामढ़ी के JDU सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने भी शराबबंदी कानून को पूरी तरह विफल बता दिया. पक्ष और विपक्ष के नेताओं की इन मुखर टिप्पणियों और सरकार के नरम रुख से यह संकेत मिल रहे हैं कि अब इस मसले पर पुनर्विचार हो सकता है. सत्ता में संभावित परिवर्तनों के बाद इसकी समीक्षा की जा सकती है.
क्या समीक्षा जरूरी है?

क्या वाकई बिहार में शराबबंदी फेल है और इसकी समीक्षा की जरूरत है? इस मसले पर जानकारों की राय अलग-अलग है. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं, “शराबबंदी कानून पर पुनर्विचार निश्चित रूप से होगा. बहुत मुमकिन है कि इसे बदल दिया जाए. इसकी दो वजहें हैं. एक तो इससे सरकार की आय बढ़ेगी क्योंकि तस्करी की अर्थव्यवस्था से सरकारी राजस्व का नुकसान हो रहा है. दूसरा, बिहार की जेलों में लोग अनावश्यक रूप से बंद हैं और अदालतों में मुकदमों का बोझ है. यह राज्य पर आर्थिक बोझ और प्रशासनिक झंझट है जिससे सरकार बचना चाहेगी.”

पुष्पेंद्र आगे कहते हैं, “इस फैसले से दलित-पिछड़े समुदाय का एक तबका जरूर खुश होगा. हालांकि मध्यम वर्ग और महिलाओं का एक हिस्सा परेशान हो सकता है, क्योंकि शराब की वापसी से सड़कों पर अशांति बढ़ सकती है. मगर दूसरी तरफ ड्रग्स के प्रकोप में कमी आएगी, क्योंकि शराबबंदी के कारण ही ड्रग्स महामारी की तरह फैला है.”

वहीं महिलाओं के मुद्दों पर काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता शाहिना परवीन की राय अलग है. वे कहती हैं, “मुझे लगता है कि सरकार शराबबंदी खत्म करने का मन बना चुकी है. मगर इसकी वजह से बिहार में जो चीजें बेहतर हुई थीं, हमें उनसे हाथ धोना पड़ेगा. इस दौरान महिलाओं की पारिवारिक स्थिति सुधरी है, घरेलू हिंसा में कमी आई है और घर में पैसे बचने लगे हैं. सड़कों पर अब शराबी उस तरह से परेशान करते नहीं दिखते. अगर इसे अचानक खत्म किया गया, तो महिलाओं की स्थिति फिर पहले जैसी हो जाएगी.”

शाहीना कहती हैं, “यह सच है कि शराबबंदी पूरी तरह सफल नहीं रही, लेकिन इसकी मुख्य वजह सरकार की इच्छाशक्ति में कमी रही है. आनन-फानन में पूर्ण शराबबंदी तो लागू कर दी गई, मगर लोगों को इसके नुकसान के प्रति जागरूक नहीं किया गया. नशामुक्ति केंद्रों पर भी ठीक से काम नहीं हुआ. जो समुदाय इस पेशे पर आश्रित थे, उन्हें वैकल्पिक रोजगार देने का वादा भी अधूरा रहा. पुलिस की सुस्ती ने तस्करी और होम डिलीवरी को बढ़ावा दिया. दोष कानून में नहीं, बल्कि इसे लागू करने के तरीके में है.”

क्या पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा शराबबंदी कानून

राजनीतिक टिप्पणीकार प्रवीण बागी कहते हैं, “शराबबंदी को लाख विफल बताया जाए, मगर इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि सार्वजनिक स्थलों पर अब शराब पीकर हंगामा नजर नहीं आता. लोग बंद कमरों में छिपकर पी रहे हैं. महिलाएं अब भी शराबबंदी के पक्ष में हैं. ऐसे में अगर सरकार इसकी समीक्षा करती है, तो JDU और महिलाएं नाराज हो सकती हैं. इसलिए मुझे नहीं लगता कि नई सरकार इसे पूरी तरह खत्म करने की हड़बड़ी दिखाएगी. हां, यह मुमकिन है कि गुजरात मॉडल की तरह कुछ छूट दी जाए, जहां डॉक्टरों की पर्ची पर शराब की इजाजत होती है या होटलों और रेस्तरां में सीमित बिक्री की अनुमति हो.”

वे आगे कहते हैं, “भले ही राजनेता इसके खिलाफ टिप्पणी करें, मगर बिहार की आम जनता कमोबेश इस फैसले से खुश है. सड़कों पर कोई बड़ा विरोध नहीं है क्योंकि लोगों ने इस फैसले के सकारात्मक पहलुओं को महसूस किया है. वे फिर से पुराने दौर में लौटना नहीं चाहेंगे.”

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