
1 मार्च 2006 की शाम अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश तीन दिवसीय भारत यात्रा पर दिल्ली पहुंचे. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनके सम्मान में राजकीय भोज का आयोजन किया. इस दौरान बुश ने अल्फांसो आम चखा और मनमोहन सिंह से कहा, “यह तो बहुत ही शानदार फल है."
महाराष्ट्र में उगाए जाने वाले इस अल्फांसो आम को हापुस भी कहते हैं. हालांकि, पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने 'मन की बात' कार्यक्रम के 134वें एपिसोड में बिहार के जिस जर्दालू आम की तारीफ की, उसे उत्तर भारत का अल्फांसो कहा जाता है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 मई को 'मन की बात' में बिहार के जर्दालू आम का जिक्र करते हुए कहा, "हर इलाके के आम की अपनी पहचान होती है लेकिन जर्दलू आम की खुशबू इतनी बेजोड़ है कि इसे दूर से ही पहचाना जा सकता है." इस आम को लेकर खुशी जाहिर करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि जर्दालू अब सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्लोबल मार्केट में भी धूम मचा रहा है.
यह पहला मौका नहीं है जब देश के प्रधानमंत्री जर्दालू के मुरीद हुए हों. कथित तौर पर बिहार के भागलपुर क्षेत्र में उगाए जाने वाले इस आम को देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी बहुत पसंद करती थीं. इतना ही नहीं कई दशकों से हर साल जर्दलू आम प्रधानमंत्री को भेंट के रूप में भेजा जाता रहा है.
बिहार में ‘मैंगो मैन’ के नाम से प्रसिद्ध अशोक चौधरी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि 2007 से 2022 तक भागलपुर के बेशकीमती और जल्द खराब होने वाले जर्दालू आम के 2,500 कार्टन दिल्ली और पटना भेजे गए थे. इसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘मैंगो डिप्लोमेसी’ के रूप में जाना जाता था.
हालांकि, 2023 में कई सालों बाद पहली बार ऐसा हुआ जब नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री को जर्दालू आम नहीं भेजे. तब राजनीतिक गलियारों में इसकी खूब चर्चा हुई थी. जबकि इसी साल राजनीतिक दुश्मनी भुलाकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बंगाल के प्रसिद्ध हिम सागर, लक्ष्मण भोग और मालदा आम भेजे थे.

जर्दालू आम कहां पाया जाता है और इसकी क्या खासियत है?
'उत्तर भारत का अल्फांसो' नाम से मशहूर जर्दालू आम मुख्य रूप से बिहार के भागलपुर और छपरा के कुछ इलाकों में उगाया जाता है. 2018 में अपनी खासियतों और क्षेत्रीय पहचान के कारण इस आम को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिला था. यह आम अपनी प्राकृतिक मिठास, तेज खुशबू और रेशा-रहित गूदे के लिए जाना जाता है.
इसका वजन आमतौर पर 186 से 265 ग्राम तक होता है. इसमें चीनी की मात्रा काफी अधिक होती है और यह विटामिन A, B और C से भरपूर होता है. 'इंडियन जर्नल ऑफ लॉ एंड लीगल रिसर्च वेबसाइट' के मुताबिक, इस आम में फाइबर और एंजाइम होते हैं, जो पेट की मांसपेशियों और पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद होते हैं.
अपने अनोखे स्वाद के कारण जर्दालू बिहार के सबसे पसंदीदा फलों में से एक है. बिहार आम उत्पादक संघ से जुड़े रणधीर चौधरी ने एक इंटरव्यू में कहा कि GI टैग मिलने के बाद दुनिया को (जर्दालूलू) आम के बारे में पता चलने लगा है. जहां पहले कुछ भी नहीं था, वहां अब बदलाव आ गया है. राज्य सरकार की तरफ से प्रचार-प्रसार और पैकेजिंग को बढ़ावा देने से उत्पादकों की आय में भी वृद्धि हुई है.
2020 में, बिहार डाक विभाग ने तो इस फल की विशेषता वाला एक विशेष डाक टिकट भी जारी किया था. बिहार सरकार इस आम का प्रचार खूब जोरों-शोरों से कर रही है. हर पोस्टर और सोशल मीडिया पोस्ट में इसके GI टैग का प्रदर्शन किया जाता है. बिहार मैंगो ग्रोअर्स फेडरेशन के रणधीर चौधरी ने कहा, “जागरूकता बढ़ाने के लिए, इस आम को हर साल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसदों और विशेष अतिथियों को भेजा जाता था. इससे पूरे भारत में जागरूकता बढ़ी. GI टैग मिलने के बाद जर्दालू को काफी प्रचार मिला और अब इसकी मांग बढ़ रही है.”
अशोक चौधरी को सरकार से और अधिक सब्सिडी की उम्मीद है लेकिन वे जर्दालू की नई स्थिति से आए ठोस बदलावों से खुश हैं. 2021-23 के बीच करीब 4.5 लाख टन इस आम का निर्यात बहरीन, यूके और बेल्जियम जैसे देशों में हुआ है.
जर्दालू आम की ओरिजिन कितनी पुरानी है?
'इंडियन जर्नल ऑफ लॉ एंड लीगल रिसर्च वेबसाइट' के मुताबिक, दक्षिण एशिया में हजारों वर्षों से आम की खेती की जाती रही है और यह पांचवीं और चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के बीच दक्षिणपूर्व एशिया में फैल गया. 10वीं शताब्दी ईस्वी तक, पूर्वी अफ्रीका में इसकी खेती शुरू हो गई थी. इस बात का जिक्र 14वीं शताब्दी में मोरक्को के प्रसिद्ध यात्री और विद्वान इब्न बतूता ने मोगादिशु (सोमालिया) की यात्रा के बाद अपनी किताब 'रिहला' (किताबुल-रिहला) में किया था.
अब आम ब्राजील, बरमूडा, वेस्ट इंडीज और मैक्सिको सहित उष्णकटिबंधीय और गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में उगाए जाने लगे हैं. कथित तौर पर जर्दालू आम को पहली बार भागलपुर क्षेत्र में महाराजा रहमत अली खान बहादुर ने खड़गपुर से लाकर लगवाया था. भागलपुर जिले के जगदीशपुर ब्लॉक के ताजेपुर गांव में स्थित 200 साल पुराना जर्दालू पेड़ को ‘मदर प्लांट’ के रूप में जाना जाता है.
जिला बागवानी विभाग के मुताबिक, भागलपुर में इस समय 750 हेक्टेयर क्षेत्र में जर्दालू के बागान लगे हुए हैं और अधिक किसान इसकी खेती कर रहे हैं. भागलपुर के बागवानी विभाग के सहायक निदेशक अभय कुमार मंडल ने एक इंटरव्यू में कहा था, "पिछले कुछ वर्षों में इस आम के प्रति जागरूकता और मांग दोनों में वृद्धि हुई है." उन्होंने आगे बताया कि विभाग कि किसानों को दिए गए 100 आम के पौधों में से 70 जर्दालू के हैं.
जर्दालू समेत दूसरे आमों के बड़े हिस्से का देश में ही खपत!
संयुक्त राष्ट्र संघ के 2023 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत दुनिया में सबसे ज्यादा आम उत्पादन करने वाला देश है. भारत सालाना करीब 262 लाख टन आम का उत्पादन करता है. जबकि भारत के बाद दूसरे नंबर पर इंडोनेशिया और तीसरे स्थान पर चीन है. इंडोनेशिया 41 लाख टन और चीन 40 लाख टन आम का उत्पादन सालाना करता है. मेक्सिको 27.1 लाख टन आम उत्पादन के साथ इस लिस्ट में चौथे स्थान पर है.
भले ही भारत दुनिया में सबसे ज्यादा आम उत्पादन करने वाला देश हो लेकिन निर्यात के मामले में भारत इंडोनेशिया और मेक्सिको जैसे देशों से भी पीछे है. 2023 में मेक्सिको ने दुनिया में सबसे ज्यादा 4.6 लाख टन आम निर्यात किया. आम निर्यात के मामले में दूसरे स्थान पर थाईलैंड और तीसरे स्थान पर ब्राजील है. भारत इस मामले में चौथे स्थान पर है. 2023 में भारत ने 1.1 लाख टन आम का निर्यात किया था.
विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में आम के बाजार में पहुंचते ही स्थानीय उपभोक्ता उसे तुरंत खरीद लेते हैं. 2025 में भारत में घरेलू स्तर पर आम बाजार का मूल्य करीब 2.90 अरब अमेरिकी डॉलर था और अनुमान है कि 2030 तक यह बढ़कर 3.97 अरब अमेरिकी डॉलर हो जाएगा.
यह भी कहा जाता है कि अपने सीमित निर्यात के बावजूद, भारत ने दूसरे देशों में आम भेजकर 2024 में 60 मिलियन डॉलर का राजस्व कमाया, जबकि मेक्सिको 2023-2025 की अवधि में 575 मिलियन डॉलर के निर्यात राजस्व के साथ आम का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया. केवल 1 फीसद आम निर्यात होने की असल वजह हमारी 1.4 अरब की जनसंख्या है.

