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बंगाल से कर्नाटक तक, हर गोल्ड डकैती में बिहार का नाम क्यों?

पिछले एक साल के दौरान देश भर में जगह-जगह सोने की लूट के कई मामले सामने आए और हर बार जांच के दौरान इनकी आखिरी कड़ी बिहार में मिली

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 25 मई , 2026

आजकल भारत में कहीं भी कोई बड़ी सोने की चोरी होती है तो जांच टीम का शक सबसे पहले बिहार की ओर जाता है. 20 मई को बिहार पुलिस ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में एक ज्वेलरी शोरूम लूट के मामले में बड़ी सफलता हासिल की.

इससे एक बार फिर बिहार में सक्रिय सोने के चोरों के गिरोह का पर्दाफाश हुआ. इस मामले में बिहार स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने बंगाल पुलिस के साथ संयुक्त कार्रवाई में समस्तीपुर जिले से दो लोगों सुधीर शर्मा और अमन कुमार को गिरफ्तार किया है.

गिरफ्तारियों के साथ-साथ, पुलिस ने लूट से जुड़े करीब 1.118 किलोग्राम सोने के आभूषण बरामद करने का दावा किया. यह सोना सिर्फ बिहार से नहीं बल्कि पूरे देश से चोरी किया गया था. इस तरह एक बार फिर किसी दूसरे राज्य में हुई बड़ी सोने की चोरी की जांच बिहार तक पहुंच गई.

मुर्शिदाबाद में 14 मई को हुई लूट में छह-सात अपराधियों के एक गिरोह ने कथित तौर पर एक ज्वेलरी शोरूम से लगभग 5 किलो सोने के आभूषण और करीब 3 लाख रुपए नकद लूटे थे. मौजूदा बाजार दर के मुताबिक, चोरी हुए माल की कुल कीमत लगभग 8 करोड़ रुपए है. इस बरामदगी के बावजूद करीब 6 करोड़ रुपए का लगभग 4 किलो सोना अभी भी लापता है.

बिहार पुलिस ने दावा किया है कि इस डकैती की योजना रोहित सिंह ने बनाई थी जो फिलहाल हाजीपुर केंद्रीय जेल में बंद है. यह पूर्वी भारत में चल रहे संगठित अपराध की एक बड़ी साजिश की ओर इशारा करता है. इन घटनाओं को देखते हुए ऐसा लगता है कि सोने की इन डकैतियों को अंतरराज्यीय स्तर पर अंजाम दिया जा रहा है.

इन्हें पहले से तैयार की गई योजना के तहत किसी ऑपरेशन की तरह अंजाम दिया जाता है. ये गिरोह कई लेयर में काम को अंजाम देते हैं. इनमें जासूसी दल, जरूरी सामानों की सप्लाई करने वाला गुट, ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था करने वाले, सोना पिघलाने वाले लोग और अलग-अलग महंगी धातुओं की पहचान करने वाले शामिल हैं. यहां तक कि जेल में बंद कैदी भी शामिल हैं. जेल में बंद सरगना तस्करी के जरिए उन तक पहुंचाए गए फोन का इस्तेमाल कर अपने गुर्गों से संपर्क साधते हैं.

मुर्शिदाबाद का मामला सोने के इर्द-गिर्द तेजी से फैल रही एक बड़ी गैरकानूनी अर्थव्यवस्था का हिस्सा है, जिसमें बार-बार बिहार का नाम सामने आता है. पूर्वी भारत समेत देश के जिन भी जगहों पर ऐसी घटनाएं होती हैं, उनका कनेक्शन कुछ न कुछ बिहार से निकल ही आता है. पुलिस के मुताबिक, चाहे फोन नंबर हो, हैंडलर हो, परिवहन करने वाला हो या जेल में बंद सरगना. अक्सर सोने की चोरी के कनेक्शन बिहार से जुड़ते दिखाई देते हैं.

पिछले एक साल में कई राज्यों के जांचकर्ताओं ने लगभग एक जैसे पैटर्न पाए हैं. जनवरी में कर्नाटक पुलिस ने मैसूर के पास हंसुर में एक बड़े डकैती मामले की जांच के दौरान 8.32 किलोग्राम सोने के आभूषण लूटने वाले गिरोह का पता लगाया. जांच में यह गिरोह बिहार के दरभंगा जिले से जुड़ा पाया गया.

बिहार STF ने कर्नाटक पुलिस के साथ मिलकर कर दो आरोपियों को गिरफ्तार किया. जांचकर्ताओं का कहना है कि इस गिरोह ने पहले अच्छी तरह जासूसी की थी और एक राज्य से दूसरे राज्य में भागने के लिए पहले से तय योजना के तहत ऐसे रास्तों का इस्तेमाल किया जिससे पुलिस के लिए भ्रम पैदा हो जाए.

अगस्त 2025 में मध्य प्रदेश के जबलपुर में एक बैंक शाखा में हुई बड़ी डकैती की घटना की जांच एक बार फिर पुलिस को बिहार की ओर ले गई. इस मामले में अपराधियों ने कथित तौर पर 14.8 किलोग्राम गिरवी रखे सोने के आभूषण और करीब 5 लाख रुपए नकद लूट लिए थे. जांच की डोर आखिरकार बिहार के गया जिले तक पहुंची, जहां बिहार STF ने आरोपियों को गिरफ्तार किया और 3 किलोग्राम से ज्यादा चोरी का सोना बरामद किया. पुलिस अधिकारियों ने बताया कि कई आरोपी पुराने अपराधी हैं और उनके लंबे आपराधिक इतिहास हैं.

ओडिशा की एक घटना में भी जांच की सुई बिहार की ओर मुड़ गई. जनवरी में क्योंझर जिले में 5-6 किलोग्राम सोने और नकदी की डकैती के बाद पुलिस ने पड़ोसी राज्य झारखंड में कई संदिग्धों को गिरफ्तार किया था. इनमें बिहार के जमुई जिले से जुड़ा एक व्यक्ति भी शामिल था. इन सारी डकैतियों को मिलाकर देखें तो यह साफ दिखता है कि भारत के बड़े हिस्से में सोने की लूट की एक संगठित व्यवस्था बन चुकी है, जिसमें बिहार से जुड़े ऑपरेटिव, हैंडलर या परिवहन के चैनल बार-बार सामने आते हैं.

इस तरह की घटनाओं में इजाफा के पीछे आर्थिक कारण हैं. पिछले एक साल में सोने की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है, जिससे अपराध में पीले धातु का आकर्षण पूरी तरह से बदल गया है. एक सफल डकैती से अब कई करोड़ रुपए मिल सकते हैं. नशीले पदार्थों या हथियारों के विपरीत, सोने में कुछ ऐसे फायदे भी हैं जो संगठित गिरोहों को विशेष रूप से आकर्षित करते हैं. यह छोटा होता है, आसानी से ले जाया जा सकता है. इतना ही नहीं पिघलने के बाद इसका पता लगाना मुश्किल होता है. साथ ही चोरी किए गए इन सोने को अनौपचारिक नेटवर्क के माध्यम से आसानी से नकदी में बदला जा सकता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जरिए एक साल के लिए सोने की खरीद टालने की सार्वजनिक अपील का भी मांग पर कोई खास असर नहीं पड़ा है. शादियों और त्योहारों के दौरान आभूषण की दुकानों में भारी खरीदारी जारी है, जबकि बैंक भारी मात्रा में गिरवी रखे गए घरेलू सोने के भंडार बने हुए हैं. आपराधिक गिरोहों के लिए ये जगह अब बेहद आकर्षक हो गए हैं.

जांच एजेंसियों का मानना ​​है कि इन गिरोहों की स्ट्रक्चर में काफी बदलाव आया है. हाल की जांचों में शामिल पुलिस अधिकारियों ने कई लेयर वाली कार्रवाइयों का जिक्र किया है. एक मॉड्यूल कमजोर लक्ष्यों की पहचान करता है; दूसरा दूरस्थ राज्यों में रेकी करता है; अलग-अलग गुटों में बंटकर इनके लोग डकैती को अंजाम देते हैं. इन चोरों के नेटवर्क में शामिल कुछ लोग सोने को तेजी से राज्य सीमाओं के बाहर ले जाते हैं और पुलिस के एक्शन लेने से पहले सोने के कारीगरों से इन्हें पिघला देते हैं. आखिर में सभी चोर इन सोने को आपस में बांट लेते हैं.

कई मामलों में जांचकर्ताओं ने जेल में बंद गिरोह के सरगनाओं की संलिप्तता को भी उजागर किया है. ये जेल में बैठे-बैठे ही अपने लोगों को ऑर्डर देते हैं. बिहार मूल के गैंगस्टर सुबोध सिंह इनमें प्रमुख है, जो सोना चोर के नाम से भी जाना जाता है. इसने जेल में रहते हुए कई बड़ी आभूषण लूट की घटनाओं को अंजाम दिया. मुर्शिदाबाद का मामला भी इसी तरह के पैटर्न को दिखाता है.

बिहार से बार-बार जुड़ने की वजह से स्वाभाविक रूप से कई असहज राजनीतिक सवाल उठ रहे हैं. पुलिस अधिकारी निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि बिहार की भौगोलिक स्थिति और रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्यों में आने-जाने का पैटर्न इसे अंतरराज्यीय आपराधिक गतिविधियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी बनाता है.

समस्तीपुर, वैशाली, दरभंगा, जमुई, नालंदा और गया जैसे जिले पूर्वी, उत्तरी और दक्षिणी भारत को जोड़ने वाली प्रमुख रेलवे लाइनों से जुड़े हैं. इन क्षेत्रों के कई परिवारों के लोग कई पीढ़ियों से बाहर कमाने जाते रहे हैं. इसके कारण ये लोग विभिन्न राज्यों के रास्तों, श्रम आपूर्ति और वहां रहने की व्यवस्था से अच्छी तरह वाकिफ होते हैं. आपराधिक गिरोह इन लोगों के जरिए इन्हीं अनौपचारिक संरचनाओं का फायदा उठाते हैं.

वहीं, पुलिस एजेंसियों को इन मामलों की जांच में कई तरह की कानूनी और अन्य कमियों का भी सामना करना पड़ता है. अंतरराज्यीय कॉर्डिनेशन धीमा और मुश्किल भरा बना हुआ है. कर्नाटक में हुई किसी डकैती की जानकारी बिहार या झारखंड तक पहुंचने में कई दिन लग सकते हैं. तब तक, चोरी किया गया सोना पहले ही किसी गुप्त जगह पर पिघलाकर किसी बाजार में बेचा जा चुका होता है.

यही कारण है कि पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियां ​​सोने की डकैतियों को एक बड़े संगठित अपराध तंत्र का हिस्सा मानकर चल रही हैं, जिसके लिए पुलिस के बीच राष्ट्रीय स्तर पर कॉर्डिनेशन बनाने की आवश्यकता है. कुछ अधिकारी निजी तौर पर इन गिरोहों के विकास की तुलना पहले के अंतरराज्यीय गिरोहों से करते हैं जो वाहन चोरी, एटीएम डकैती और अवैध हथियार आपूर्ति में माहिर थे.

हालांकि, बिहार पुलिस के लिए हालिया गिरफ्तारियां पुलिस और प्रशासन की ओर से एक और मकसद पूरा करती नजर आ रही हैं. राज्य स्तर पर राजनीतिक संकेत देना. मौजूदा प्रशासन के तहत, बिहार पुलिस और STF ने सोने की बरामदगी के लिए चलाए जाने वाली छापेमारी और गिरफ्तारियों को लेकर सोशल मीडिया पर कैंपेन शुरू किया. इसके जरिए पुलिस ने अपनी छवि सुधारने की कोशिश की.

मुर्शिदाबाद की घटना को लेकर पुलिस मुख्यालय से जारी ग्राफिक को देखकर यह अंदाजा भी लग जाता है. यह सिर्फ सूचनात्मक नहीं था, बल्कि पुलिस के इकबाल का प्रदर्शन भी था. इनमें अंतरराज्यीय पुलिस कॉर्डिनेशन, संदिग्धों के नाम, बरामद सोने की मात्रा और यहां तक ​​कि जेल में बंद कथित मास्टरमाइंड का भी जिक्र है. यह पुलिसिंग को राज्य की ताकत के रूप में पेश करने का एक तरीका था.

हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि पुलिस को चोरी का 1 किलो सोना बरामद हो रहा है जबकि 4 किलो अभी भी लापता है. यह जाहिर करता है कि आपराधिक अर्थव्यवस्था को कंट्रोल करने में पुलिस अभी पूरी तरह सक्षम नहीं है. जब तक सोने की कीमतें ऐतिहासिक रूप से ऊंची बनी रहेंगी ऐसी चोरियों को बढ़ावा देने वाले तत्वों के गिरोह के खत्म होने की संभावना नहीं है.

देश भर के जांचकर्ताओं के लिए चिंता अब केवल एक गिरोह या एक राज्य तक सीमित नहीं है. अब इनकी चिंता अंतरराज्यीय सोने के अपराध नेटवर्क में तेजी से हो रहे विस्तार को लेकर है. इन सभी मामलों में जांच की कड़ी जोड़ने पर ऐसा लगता है कि लगभग सभी मामलों में जांच का सिलसिला बिहार से होकर गुजर रहा है.

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