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बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2026 : वित्त मंत्री कहते हैं उद्योग बढ़े, आंकड़े अलग कहानी बता रहे!

बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 से एक बार फिर यही बात सामने आई है कि राज्य भीषण आर्थिक विषमता से जूझ रहा है, हालांकि कुछ मोर्चों पर बेहतरी के संकेत भी मिल रहे

Bihar economic survey 2026-27
बिहार के वित्त मंत्री बिजेंद्र यादव आर्थिक सर्वेक्षण पेश करते हुए
अपडेटेड 2 फ़रवरी , 2026

बिहार सरकार ने विधानसभा में बजट सत्र के पहले दिन बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 को जारी कर दिया. इसे जारी करते हुए वित्त मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा कि राज्य में हाल के वर्षों में औद्योगीकरण में तेजी आई है. बिजनेस कनेक्ट की वजह से राज्य में निवेश बढ़ा है और बड़ी संख्या में औद्योगिक इकाइयां खुली हैं.

राज्य के वित्त मंत्री भले ही जो दावा करें मगर खुद उन्होंने जो आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया है, उसके आंकड़ों के मुताबिक पिछले दस वर्षों में बिहार में औद्योगिक इकाइयों की संख्या घटी है. आर्थिक सर्वेक्षण के पेज संख्या 142 में दिए आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2014-15 में जहां बिहार में चालू कारखानों की संख्या 2,942 थी, वह 2023-24 में घटकर 2,692 रह गई है. यानी पिछले दस वर्षों में बिहार में 250 कारखाने घट गए. ये आंकड़े भारत सरकार के वार्षिक औद्योगिक सर्वेक्षण पर आधारित बताए गए हैं. यहां वर्ष 2024-25 के आंकड़े नहीं दिए गए हैं.

आगे के पन्नों में सरकार ने यह जानकारी उपलब्ध कराई है कि बिहार औद्योगिक प्रोत्साहन नीति की वजह से 2024-25 में 237 नए कारखाने खुले. अगर उन्हें भी जोड़ दिया तो 2014-15 के मुकाबले आज बिहार में कम कारखाने संचालित हो रहे हैं.

दस साल में सिर्फ दस हजार करोड़ रुपए का निवेश आया

वित्त मंत्री ने यह भी बताया कि बिहार औद्योगिक प्रोत्साहन नीति की वजह से राज्य में दस हजार करोड़ रुपए का निवेश आया है. आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 2016 से यह नीति जारी है और अब तक कुल निवेश 10,635.90 करोड़ रुपए का रहा. इसमें भी पिछले वित्त वर्ष में सिर्फ 2,738 करोड़ रुपए का निवेश आया है और 237 नए कारखाने खुले हैं. इस नीति के तहत पिछले दस वर्षों में 4,353 कंपनियों ने 1.11 लाख करोड़ के निवेश का प्रस्ताव दिया था. यानी हर पांच में से एक प्रस्ताव ही धरातल पर उतरा यानी हर 11 में से एक रुपये का निवेश ही बिहार को मिला.

इस वजह से बिहार में पिछले दस वर्षों में कुल 42,999 लोगों को रोजगार मिला है. इनमें पिछले वित्तीय वर्ष में ही 14,144 लोगों को रोजगार मिला है. बिहार की सभी औद्योगिक इकाइयों में आज की तारीख में 1.58 लाख लोगों को रोजगार मिल रहा है. 2023-24 में यह आंकड़ा 1.39 लाख था.

आर्थिक विषमता घटती ही नहीं

2006 में शुरू हुए बिहार आर्थिक सर्वेक्षण से लेकर आज तक सभी सर्वेक्षण में एक बात कॉमन है कि राज्य भीषण आर्थिक विषमता से जूझ रहा है. जहां राजधानी पटना सहित बेगूसराय और मुंगेर जैसे जिलों की प्रति व्यक्ति आय अधिक होती है, शिवहर, अररिया और सीतामढ़ी जिलों की प्रति व्यक्ति आय काफी कम. इस वर्ष भी वर्तमान मूल्य पर पटना का प्रति व्यक्ति राज्य सकल घरेलू उत्पाद (SGDP) 2,41,220 रुपए है, दूसरी तरफ शिवहर का सिर्फ 38,214 रुपये. यानी पटना और शिवहर के बीच छह गुने से भी अधिक का अंतर है. बिहार का प्रति व्यक्ति SDGP 76,490 रुपए है, जबकि यह आंकड़ा राष्ट्रीय स्तर पर 2,05,324 रुपए है. आंकड़े बताते हैं कि पटना को छोड़ दिया जाए तो बिहार के सभी जिलों के लोगों की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से काफी कम है. 

मखाना उत्पादन बढ़ाना अभी भी चुनौती, मछली का उत्पादन बढ़ रहा

हाल के वर्षों में बिहार सरकार का जोर मखाना उत्पादन पर काफी अधिक रहा है. मगर आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन वित्तीय वर्ष में कृषि विभाग न तो मखाने का रकबा बढ़ाने में बहुत सफल हो पाया है, न ही इसका उत्पादन बढ़ाने में. 2022-23 में जहां बिहार में 27.7 हजार एकड़ में मखाने की खेती होती थी, 2024-25 आते-आते इसमें महज तीन सौ एकड़ की बढ़ोतरी हुई और यह 28 हजार एकड़ हो गया. ऐसे में उत्पादन भी 56.8 हजार मीट्रिक टन से बढ़कर 58.8 हजार मीट्रिक टन ही हो पाया है. राज्य सरकार ने 2031 तक मखाना खेती का रकबा बढ़ाकर 70 हजार एकड़ करने का लक्ष्य रखा है. इसके जरिए वह एक लाख टन से अधिक मखाने का निर्यात करना चाहती है. मगर फिलहाल आंकड़ों में यह रफ्तार सुस्त नजर आती है.

इस बीच राज्य में दूध, अंडा, मछली, तरबूज और खरबूजे के उत्पादन में ठीक-ठाक बढ़ोतरी हुई है.

सरकारी बैंकों में अभी भी लोन देने में हिचक, माइक्रोफाइनेंस का बढ़ रहा कारोबार

बिहार में औद्योगीकरण की राह में एक बड़ी बाधा कमर्शियल बैंकों द्वारा बिहार के उद्यमियों को लोन देने में झिझक मानी जाती है. आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 2024-25 में भी बिहार के कमर्शियल बैंकों का ऋण जमा अनुपात सिर्फ़ 53.5 है, यानी बिहार से सौ रुपये जमा होने पर यहां के लोगों को सिर्फ 53.5 रुपये का कर्ज दिया जा रहा है. जबकि आंध्र प्रदेश में यह 157.2 है, तमिलनाडु और तेलंगाना में यह अनुपात 120.5 है.

इसके उलट माइक्रोफाइनेंस कंपनियों का बिहार में ऋण जमा अनुपात 312.4 है, पिछले साल तो यह 410.7 तक चला गया था. यानी ये कंपनियां बिहार में जमा धन का तीन से चार गुना तक कर्ज दे रही हैं. इनके ग्राहक गरीब हैं और इनके साथ कर्ज वसूली के लिए उत्पीड़न के मामले लगातार सामने आते हैं. अगर बिहार में कमर्शियल बैंक अधिक मात्रा में कर्ज देने लगें तो माइक्रोफाइनेंस के कर्जे में कमी आ सकती है.

मनरेगा (वीबी जी-राम-जी) में आज भी सौ दिन का रोजगार सपना

ग्रामीण रोजगार के मामले में जहां सरकार जीविका के जरिए 1.81 करोड़ महिलाओं को रोजगार देने की तैयारी में है, वहीं मनरेगा का हाल बुरा है. 2020-21 में जहां राज्य में 193.8 लाख जॉब कार्ड थे, वे इस साल घटकर 175.1 लाख रह गए. इनमें से सिर्फ 51.2 लाख लोगों को ही इस योजना के तहत रोजगार मिला और सिर्फ चार हजार परिवारों को सौ दिन का रोजगार मिला.

डॉक्टरों और नर्सों की भारी कमी

इस बार का आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि बिहार का स्वास्थ्य विभाग डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों की भीषण कमी से जूझ रहा है. राज्य में 21,820 स्वीकृत पदों की जगह पर सरकारी अस्पतालों में सिर्फ 9,658 डॉक्टर कार्यरत हैं, यानी लगभग 56 फीसदी पद खाली हैं. वहीं ग्रेड ए नर्सों के 26,160 पदों की जगह 10,926 ग्रेड ए नर्सों से काम चलाया जा रहा है. यानी उनके भी 58 फीसदी पद खाली पड़े हैं. 

कुत्तों के काटने के मामलों में दस गुना बढ़ोतरी

इस आर्थिक सर्वेक्षण में एक अजीब आंकड़ा यह भी सामने आया है कि राज्य में पिछले पांच वर्षों में कुत्ते काटने के मामले दस गुना बढ़ गए हैं. वर्ष 2021-22 में जहां 28,725 लोग कुत्ते काटने के शिकार हुए थे, 2024-25 में यह आंकड़ा 2,83,274 चला गया है. 2022-23 से ऐसे मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.

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