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अपने बुझ रहे दीये का इल्जाम किस पर डालना चाह रही है बिहार कांग्रेस?

कांग्रेस के बिहार प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के सामने बाहरी विरोध से ज्यादा अपनों को एकजुट रखने की चुनौती

Rajesh Ram, Bihar Congress President
बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष राजेश राम (फाइल फोटो)
अपडेटेड 25 मार्च , 2026

“दियों को खुद बुझाकर रख दिया है/और इल्जाम हवा पर रख दिया है.” यह महशर बदायूनी का शेर है. इसके कई मायने हो सकते हैं. मगर बिहार में कांग्रेस की बदहाल स्थिति के बारे में जब इंडिया टुडे ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम से पूछा तो उन्होंने इस शेर का खास तौर पर उल्लेख किया. फिर उन्होंने छायावादी तरीके से अपनी बातें रखीं.

राजेश राम ने कहा, “क्या इसका इल्जाम उन नेताओं पर नहीं जाता, जो राज्यसभा चुनाव वाले दिन डींगें हांक रहे थे कि कांग्रेस के सारे विधायक हमारे घर हैं.” हालांकि उन्होंने खुलकर नाम नहीं लिया, मगर उनका इशारा बिहार कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह की तरफ था. पिछले साल की शुरुआत से बिहार में कांग्रेस को मजबूत करने की कवायद शुरू हुई थी.

इसके लिए पार्टी के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी ने बिहार के कई दौरे किए और 16 दिन लंबी वोटर अधिकार यात्रा निकाली. वह कांग्रेस चुनाव में तो बुरी तरह विफल हुई ही, अब अपने छह विधायकों को भी एकजुट रखने में नाकाम साबित हो रही है. बीते राज्यसभा चुनाव में पार्टी के छह में से तीन विधायक मतदान के दिन गैरहाजिर रहे और महागठबंधन के उम्मीदवार अमरेंद्रधारी सिंह को हार का सामना करना पड़ा.

ऐसा क्यों हुआ? दिलचस्प है कि जब यह सवाल इंडिया टुडे ने दिल्ली स्थित कांग्रेस के एक बड़े नेता से पूछा तो उन्होंने अनौपचारिक बातचीत में कहा, “हम तो इस बात से खुश हैं कि पार्टी टूटी नहीं. हमारे विधायक बच गए.” उनकी इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं थी, क्योंकि नतीजे आने के बाद से ही कांग्रेस में टूट-फूट की खबरें बिहार की राजनीतिक फिजा में तैर रही थीं. फिलहाल विधायक गैरहाजिर जरूर रहे मगर कहीं गए नहीं, इससे कांग्रेस कुछ हद तक राहत महसूस कर रही है.

कांग्रेस के तीन विधायक चुनाव वाले दिन क्यों गैरहाजिर रहे, इसको लेकर इंडिया टुडे ने उसी रोज रिपोर्ट (बिहार में राज्यसभा चुनाव से गायब रहने वाले कांग्रेस-RJD के विधायक क्या कह रहे हैं?) की थी. हालांकि बाद में इन तीनों विधायकों ने कहा कि महागठबंधन के उम्मीदवार के बारे में उनसे राय नहीं ली गई थी और उम्मीदवार उन्हें पसंद नहीं था. खुद को कांग्रेस का एसोसिएट मेंबर कहने वाले निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने भी कई साक्षात्कारों में इन विधायकों की बात का समर्थन किया था.

इस बारे में जब इंडिया टुडे ने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम से पूछा तो उन्होंने कहा, “हमने इन विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया था. उसका जवाब आया है. अनुशासन समिति जल्द उन जवाबों का अध्ययन करेगी और अपनी टिप्पणी के साथ मामले को आगे बढ़ा देगी. राष्ट्रीय नेतृत्व इस पर अंतिम फैसला करेगा. हां, यह जरूर है कि यह घटना हमारे लिए एक सेटबैक की तरह है.”

वे आगे कहते हैं, “हम लोग अपने विधायकों से 13 मार्च तक संपर्क में थे. 12 मार्च को इन विधायकों के साथ हमने बैठक भी की थी. उस वक्त तक कोई समस्या नहीं थी. मगर 14 को उनका मोबाइल नॉट रीचेबल बताने लगा. वे अब जो भी कारण बता रहे हैं, उसका संदर्भ क्या है, यह देखना होगा.”

हालांकि यह बतौर कांग्रेस अध्यक्ष उनका महज एक आधिकारिक जवाब है. यह लगभग तय माना जा रहा है कि कांग्रेस ने सिर्फ औपचारिकता के लिए इन विधायकों से जवाब मांगा है. पार्टी इन पर कड़ी कार्रवाई करने से बचेगी, क्योंकि अगर पार्टी जरा भी सख्त होती है तो इनके टूटने का खतरा और बढ़ जाएगा.

इसी वजह से चुनावी नतीजों के चार-पांच महीने बीतने के बावजूद पार्टी अब तक अपने विधायक दल का नेता नहीं चुन पाई है. हालांकि राजेश राम के मुताबिक यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. वे कहते हैं, “वरीयता के आधार पर कांग्रेस के विधायक सचेतक की भूमिका निभाते रहे हैं और अभी भी निभा रहे हैं. असल बात तो BJP की नीति है. वह कैसे हमारे विधायकों को कभी मुकदमों के नाम पर डराती है तो कभी लालच देती है. सवाल तो उन पर भी उठना चाहिए.”

निश्चित तौर पर राजेश राम के लिए फिलहाल असल चुनौती यह नहीं है. उनके लिए बड़ा मुद्दा पार्टी के भीतर की गुटबाजी है. कहा जा रहा है कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह, जिन्हें RJD और लालू परिवार से नजदीकियों की वजह से पद से हटाया गया था, वे अभी तक इस फैसले को स्वीकार नहीं कर पाए हैं. उनके करीबी सहयोगी अक्सर नए अध्यक्ष राजेश राम और प्रभारी कृष्णा अलावरु पर हमलावर रहते हैं. माना जाता है कि विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट वितरण में अखिलेश प्रसाद सिंह का प्रभाव कम रहा और कई सीटों पर पप्पू यादव का जोर अधिक चला.

टिकट बंटवारे के वक्त से ही कई कांग्रेसी नेताओं ने इन दोनों के खिलाफ विरोध का बिगुल फूंक दिया था. चुनावी नतीजों के बाद इनमें से कुछ नेताओं को पार्टी ने छह वर्षों के लिए निष्कासित भी कर दिया. इसके बावजूद ये नेता खुद को कांग्रेसी ही बताते हैं. इनमें आनंद माधव और छत्रपति यादव प्रमुख हैं. ये लोग अब पूरे बिहार में 'बिहार कांग्रेस बचाओ महासम्मेलन' का आयोजन करने जा रहे हैं.

इस बारे में पूछने पर राजेश राम कहते हैं, “आप जानते ही हैं कि बिहार में कांग्रेस कई मोर्चों पर संघर्ष कर रही है. यह संघर्ष बाहरी भी है और अंदरूनी भी. इससे कौन इनकार कर सकता है. मगर अच्छी बात यह है कि इस मसले की जानकारी केंद्रीय नेतृत्व को भी है. हमारे खिलाफ जो भी षडयंत्र हो रहे हैं, उनकी पूरी खबर हमारे नेता को है. लोगों को समझना चाहिए कि कोई जीवन भर पद पर रहने नहीं आया है. हम बस इतना कहते हैं कि जिस रोज हमें नेतृत्व का आदेश मिल गया, हम कोई भी कदम उठाने के लिए तैयार हैं.”

इस बीच सकारात्मक बात सिर्फ इतनी है कि कांग्रेस ने बिहार में अपनी सक्रियता बनाए रखी है. वह गैस संकट जैसे जनहित के मुद्दों पर संघर्ष भी कर रही है और टैलेंट हंट जैसे रचनात्मक कार्यक्रम भी आयोजित कर रही है.

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