जदयू के वरिष्ठ नेता और बिहार सरकार के वित्त मंत्री विजय कुमार चौधरी ने 29 अगस्त को भाजपा पर एक सनसनीखेज आरोप लगाया. उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “भाजपा वाले खुद तो जनगणना करवा नहीं रहे, उल्टे बिहार सरकार के जाति गणना के काम को बाधित करने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने पहले अपने लोगों के जरिये जनहित याचिकाओं के माध्यम से इसे रोकना चाहा. मगर जब फैसला बिहार सरकार के पक्ष में हुआ तो अब केंद्र सरकार का गृह मंत्रालय खुद इस मामले में कूद पड़ा है. इनकी घबराहट और बेचैनी-बदहवासी का आलम यह है कि सुबह शपथपत्र दायर होता है और दो घंटे बाद उसमें संशोधन हो जाता है.”
विजय कुमार चौधरी का यह बयान दरअसल 28 अगस्त, सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे को लेकर आया है. सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों बिहार में हो रही जाति गणना के खिलाफ याचिकाओं की सुनवाई चल रही है. इस सुनवाई के दौरान सोमवार की सुबह केंद्र सरकार ने पांच बिंदुओं का एक हलफनामा दायर किया और शाम होते होते सरकार ने उस हलफनामे को वापस लेते हुए एक नया संशोधित हलफनामा दायर किया और कहा कि पांचवां बिंदु गलती से चला गया था, उसे हटा लिया गया है.
दरअसल दोनों हलफनामों में एक ही फर्क है. पहले में केंद्र सरकार ने कहा था कि जनगणना कराना केंद्र का विशेषाधिकार है और कोई राज्य सरकार जनगणना या इससे मिलती-जुलती कोई गतिविधि नहीं करा सकती. इस हलफनामे के पेश होने के बाद जाति गणना का विरोध कर रहे याचिकाकर्ता खुश हो गए. उनके लिए इसका सीधा अर्थ था कि जाति गणना, जो कि जनगणना जैसी ही प्रक्रिया है को कराने का अधिकार बिहार सरकार को नहीं है.
मगर शाम होते-होते केंद्र सरकार ने नई याचिका में साफ लिखा कि जनगणना केंद्र का अधिकार है. जनगणना जैसी प्रक्रिया वाला क्लॉज हटा लिया गया. इस छोटे से संशोधन से स्थितियां बदल गईं और यह साफ हो गया कि राज्य सरकार जनगणना तो नहीं करा सकती है, मगर जनगणना जैसी मिलती-जुलती प्रक्रिया कराने में उस पर कोई रोक नहीं है. इस संशोधन के तुरंत बाद बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा सांसद सुशील मोदी ने बयान जारी किया और कहा, “केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर स्पष्ट कर दिया कि वह बिहार में जातीय सर्वे कराने के विरुद्ध नहीं है. संवैधानिक दृष्टि से इस मुद्दे पर केंद्र और राज्य सरकार में कोई टकराव नहीं है, लेकिन राजद और जदयू इस पर राजनीति कर रहे हैं.”
मगर जदयू नेता विजय चौधरी इस बात को नहीं मान रहे. उनका कहना है, “दोनों हलफनामों में कोई फर्क नहीं. दोनों का एक ही आशय है कि केंद्र सरकार किसी भी हाल में बिहार सरकार की जाति गणना को रोकना चाहती है.” एक सितंबर से जदयू पूरे बिहार में जाति गणना को लेकर भाजपा के रवैये का पोल-खोल अभियान चलाने जा रही है. इसकी घोषणा हाल ही में पार्टी अध्यक्ष ललन सिंह ने की.
जानकार बताते हैं कि बिहार में जाति गणना एक बड़ा मुद्दा साबित होने जा रहा है और अगर यह अभियान सफल रहा तो इंडिया गठबंधन से जुड़ी दूसरी राज्य सरकारें अपने यहां भी इसे लागू कर सकती हैं. वैसे तो बिहार में भाजपा जाति गणना का आधिकारिक रूप से समर्थन करती है. पार्टी ने विधान सभा में और सर्वदलीय बैठक में भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया. मगर पार्टी का समर्थन उतना स्पष्ट नहीं, जितना महागठबंधन से जुड़े दलों का है.
अभी हाल ही में राजधानी पटना में भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने एक सभा में कह दिया, "मैं मानता हूं जाति होती ही नहीं है. हम सब लोग गोत्रों में बंटे हैं." यह बयान उन्होंने तब दिया जब पटना में एक पुस्तक के लोकार्पण समारोह में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने कहा था कि केंद्र सरकार बिहार की जाति गणना को नफरत की निगाह से देखती है. कोर्ट में जाति गणना का विरोध कर रही है, जबकि जाति हमारा अधिकार है.
बिहार में भी भाजपा नेता जाति गणना के मसले पर अलग-अलग तरह के बयान देते हैं. इससे ऐसा लगता है कि शायद पार्टी ने जाति गणना का समर्थन तो कर दिया है, मगर पार्टी के भीतर इसको लेकर कोई स्पष्ट राय नहीं है.
बहुजन चेतना पर केंद्रित सबाल्टर्न पत्रिका के संपादक महेंद्र सुमन कहते हैं, "यह साफ नजर आता है कि भाजपा जाति गणना को लेकर बहुत सहज नहीं है. हालांकि वे बिहार में कर्पूरी ठाकुर की जयंती की बात करते हैं, अति पिछड़े की गोलबंदी का प्रयास करते हैं. मगर जिस तरह बिहार की सामाजिक न्याय की पार्टियां जाति गणना की बात मजबूती से करती है, उस तरह भाजपा के लोग नहीं करते. अब तो कांग्रेस भी इस मुद्दे को मजबूती से उठाने लगी है. इंडिया गठबंधन से जुड़ी पार्टियों को पता है कि वे सामाजिक न्याय की बात करके ही भाजपा के हिंदुत्व का मुकाबला कर सकते हैं."
महेंद्र सुमन आगे भाजपा की एक दिक्कत के बारे में भी बताते हैं. उनका कहना है, "भाजपा का द्वंद्व यह है कि वह अपने कोर सवर्ण वोटरों को नाराज नहीं करना चाहती. ये सवर्ण वोटर जाति गणना के कट्टर विरोधी हैं. इसलिए हम देखते हैं कि भाजपा के अलग-अलग नेता जाति गणना को लेकर अलग-अलग बयान देते हैं, कुछ समर्थन में तो कुछ विरोध में. यही बात केंद्र सरकार के हलफनामे में भी नजर आती है. दरअसल भाजपा वोटों के गोलबंदी के लिए तो सामाजिक न्याय की बात करती है, मगर वह अपने कोर वोटर सवर्णों को नाराज नहीं करना चाहती."
हो सकता है भाजपा सच में इस मसले पर किसी दुविधा में हो या फिर यह भी हो सकता है कि जाति गणना पर ढुलमुल रवैया ही उसकी रणनीति हो. हालांकि अगले लोकसभा चुनाव से पहले वह किसी भी सूरत में इस मसले पर अपना नुकसान कम से कम करना चाहेगी और तब यह भी जाहिर हो जाएगा कि जाति गणना पर उसका असल रवैया क्या है.

