झारखंड में एक बार फिर भाषा विवाद उठ खड़ा हुआ है. राज्य सरकार के एक फैसले के मुताबिक, झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) में क्षेत्रीय भाषाओं की सूची से मगही, भोजपुरी, मैथिली और अंगिका को हटा दिया गया है. जबकि बिहार से सटे इलाकों में यही भाषाएं बोली जाती हैं. पलामू और गढ़वा जिलों के लिए राज्य सरकार ने स्थानीय भाषा के रूप में नागपुरी और कुडुख (उरांव) का चयन किया है.
साल 2025 में भी इन्हीं दोनों भाषाओं का चयन किया गया था, जिसके बाद बड़े पैमाने पर आंदोलन हुए थे. इस विवाद का सबसे अधिक असर पलामू प्रमंडल और संताल परगना के सीमावर्ती इलाकों के उन हजारों अभ्यर्थियों पर पड़ रहा है जो झारखंड के मूल निवासी हैं, लेकिन उनकी मातृभाषा भोजपुरी, मगही या अंगिका है. JTET-2026 के लिए आवेदन प्रक्रिया 21 अप्रैल 2026 से शुरू हो रही है, जो 21 मई 2026 तक चलेगी. यह परीक्षा लगभग एक दशक बाद आयोजित हो रही है.
अब इस मुद्दे पर BJP के विरोध को कांग्रेस का भी समर्थन मिला है. BJP प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू का कहना है कि जब ओडिशा और पश्चिम बंगाल से सटे जिलों में उड़िया और बंगला को क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता दी जा रही है, तो बिहार से सटे जिलों में बोली जाने वाली भाषाओं के साथ अलग व्यवहार क्यों किया जा रहा है.
इस मामले पर कांग्रेस नेता और राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने नियमावली में विसंगतियों को स्वीकार करते हुए कहा कि पलामू और गढ़वा जिलों में भोजपुरी और मगही बोलने वालों की बड़ी संख्या है, लेकिन इन भाषाओं को सूची में शामिल नहीं किया गया है. साथ ही वे कैबिनेट में यह मुद्दा उठाने की बात भी कहते हैं. किशोर पलामू जिले के छतरपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं.
हालांकि, उनकी प्रतिक्रिया को BJP ने दोहरापन बताया है. बीते 1 अप्रैल को गढ़वा के BJP विधायक सत्येंद्रनाथ तिवारी ने कहा, "जब यह प्रस्ताव कैबिनेट में आया तो वित्त मंत्री ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? वे सब मिले हुए हैं. मुझे नहीं पता कि हेमंत सोरेन सरकार को क्या हो गया है. वे हमेशा गढ़वा और पलामू को हीन भावना से देखते हैं. JTET परीक्षा में भोजपुरी और मगही को शामिल न करना गलत है. इसका सीधा असर हमारे बच्चों पर पड़ेगा."
दरअसल, 2011 की जनगणना के अनुसार पलामू प्रमंडल के अंतर्गत पलामू जिले की आबादी 19.36 लाख है. इसमें आदिवासी आबादी 9.34 प्रतिशत है, जबकि गढ़वा जिले में करीब सात प्रतिशत आदिवासी हैं. सिर्फ लातेहार जिले में आदिवासी आबादी 45 प्रतिशत के करीब है. पलामू प्रमंडल की सीमा उत्तर प्रदेश एवं बिहार से सटी हुई है, जहां भोजपुरी और मगही का सबसे अधिक प्रभाव रहा है. पलामू प्रमंडल की एक स्थानीय भाषा है जिसे ‘पलमुआ’ कहा जाता है और यह अधिसूचित भी है. दूसरी तरफ, साल 2023 में हुई JTET की परीक्षा में स्थानीय भाषा के रूप में भोजपुरी अधिसूचित थी.
चुनावी राजनीति पर क्या होगा असर
क्या हेमंत सरकार के इस निर्णय का विरोध कर BJP आदिवासी वोटरों से और दूर छिटक जाएगी? या फिर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) को नुकसान होगा? BJP के लिहाज से जवाब है कि जिलावार प्रभाव कम होगा, लेकिन राज्यवार देखें तो वोट जरूर छिटक सकते हैं. इसका कारण यह है कि भोजपुरी पलामू और गढ़वा जिले के अधिकांश हिस्सों में बोली जाती है. वहीं अंगिका संताल परगना इलाके के गोड्डा, साहिबगंज के अधिकतर हिस्सों और देवघर व पाकुड़ जैसे जिलों के कुछ हिस्सों में बोली जाती है.
विधानसभा के लिहाज से पलामू, गढ़वा और गोड्डा जिलों में कोई भी सीट एसटी (ST) के लिए आरक्षित नहीं है. पाकुड़ और साहिबगंज में कुल पांच एसटी आरक्षित सीटें हैं. पलामू में जहां BJP, RJD और कांग्रेस के नेता जीतते रहे हैं, वहीं संताल में अधिकतर सीटें JMM के खाते में जाती रही हैं. बाकी सीटों पर BJP और कांग्रेस की हिस्सेदारी रही है. पलामू इलाके में पिछले दस सालों में JMM ने अपनी पैठ बनाई है, लेकिन हेमंत सोरेन के इस फैसले ने इलाके के JMM नेताओं के लिए मुश्किलें पैदा कर दी हैं.
एक नेता ने कहा, "भोजपुरी या अंगिका से विरोध न करने पर भी आदिवासी वोट बैंक JMM से कहीं छिटक नहीं रहा है. हमने बहुत मेहनत के बाद पार्टी को इन इलाकों में खड़ा किया है, लेकिन इस निर्णय के बाद क्षेत्र में हमारे लिए बहुत मुश्किल होने वाली है. सच्चाई यह है कि पलामू प्रमंडल के आदिवासी भी भोजपुरी ही बोलते हैं."
भोजपुरी भाषा को लेकर सितंबर 2021 में सीएम हेमंत सोरेन के एक बयान को देखना महत्वपूर्ण हो जाता है. उन्होंने कहा था, "अलग झारखंड राज्य के लिए लड़ने वाले आदिवासियों ने यह लड़ाई क्षेत्रीय भाषाओं के लिए लड़ी थी, न कि भोजपुरी और मगही के लिए.” उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि आंदोलन के दौरान महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करने वाले भोजपुरी बोल रहे थे.
इन परिस्थितियों से एक बात साफ है कि पलामू प्रमंडल की विधानसभा सीटों पर भविष्य में BJP को फायदा हो सकता है. लेकिन आदिवासी इलाकों में उसकी स्थिति पुरानी जैसी ही रह सकती है. BJP के 'संगठन सृजन अभियान' से जुड़े एक आदिवासी नेता ने कहा कि हम आदिवासी इलाकों में पार्टी को मजबूत करने के लिए मेहनत कर रहे थे, लेकिन अध्यक्ष के बयान और पार्टी के स्टैंड को लेकर इन इलाकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिल रही है.
दूसरी तरफ, कांग्रेस को भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है. पलामू और संताल इलाकों से उसे वोट और विधायक दोनों मिलते रहे हैं. यानी हेमंत की तरफ से कांग्रेस को यह एक और चोट है. वहीं JMM अपने आदिवासी वोट बैंक को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ सकती है.
मिथिलेश ठाकुर, जो हेमंत सोरेन की पिछली कैबिनेट के महत्वपूर्ण सदस्य रहे हैं और बीते चुनाव में गढ़वा से हार गए थे, कहते हैं, "जो भाषा जिस इलाके में बोली जाती है, उसे वहां शामिल करना ही चाहिए. मंत्री रहते हुए मैंने खुद सीएम से मिलकर इसका अनुरोध किया था. लेकिन BJP के विधायक जो विरोध प्रेस के सामने जता रहे हैं, उसे उन्होंने हाल ही में संपन्न विधानसभा सत्र में एक बार भी नहीं उठाया."
वे आगे कहते हैं, "मेरा सुझाव है कि इन इलाकों के जनप्रतिनिधि एक प्रतिनिधिमंडल बनाकर सीएम से मिलें और इसे शामिल कराने की पहल करें. जहां तक छात्रों के नुकसान की बात है, पलामू के छात्र इतने प्रतिभावान हैं कि किसी भी भाषा की परीक्षा में वे अव्वल ही आएंगे."
भाषाई राजनीति से होने वाले नफा-नुकसान के इतर, पलामू और संताल इलाकों के उन हजारों छात्रों को इस फैसले से भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा, जो दशकों से इन्हीं भाषाओं में पढ़ते और बोलते आ रहे हैं.

