राजस्थान कैडर की आईपीएस अधिकारी ज्येष्ठा मैत्रेयी का सात दिन में तीन बार तबादला हो चुका है. 13 मार्च को मैत्रेयी को भिवाड़ी से हटाकर बांसवाड़ा का एसपी बनाया गया था, मगर वहां कार्यभार संभालने से पहले ही 19 मार्च की रात उन्हें सवाई माधोपुर के एसपी की कमान सौंप दी गई. इसी तरह आईपीएस अधिकारी सुधीर जोशी को 13 मार्च को झुंझुनूं का एसपी बनाया गया, लेकिन वे पदभार संभालते उससे पहले ही 18 मार्च को उनकी जगह कावेंद्र सिंह सागर की नियुक्ति कर दी गई.
झुंझुनूं जिले में पहले भी दो बार ऐसा हो चुका है जब अधिकारी के जॉइन करने से पहले ही उन्हें बदल दिया गया. आईपीएस प्रहलाद कृष्णिया और लोकेश सोनवाल भी ऐसे ही अधिकारी रहे हैं. सुधीर जोशी के मामले के बाद यह जिला फिर चर्चा में है. BJP सरकार आने के बाद झुंझुनूं में 8 एसपी बदले जा चुके हैं. यहां सबसे छोटा कार्यकाल ज्ञानचंद यादव का रहा, जिन्हें महज चार दिन में हटा दिया गया.
भजनलाल सरकार में यह भी बड़ी दिलचस्प बात है कि BJP ने जिस अधिकारी को लेकर पूर्व की सरकार पर सबसे ज्यादा हमले बोले, अब वे ही मुख्यमंत्री के सबसे भरोसेमंद अधिकारी हैं. पूर्ववर्ती गहलोत सरकार में सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के मुखिया रहे अखिल अरोड़ा पर BJP ने तीखे प्रहार किए थे. योजना भवन की अलमारी में मिले सोने और नकदी मामले में भी उनका नाम जोड़ा गया था. हालांकि, नई सरकार ने उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देते हुए मुख्यमंत्री का अतिरिक्त मुख्य सचिव बनाया है. उनकी पत्नी अपर्णा अरोड़ा को भी खान विभाग का जिम्मा दिया गया है.
राजस्थान सरकार ने 13 मार्च को 64 आईपीएस अधिकारियों के तबादले किए थे, जिनमें 27 जिलों के एसपी बदले गए. इनमें से कई अधिकारी राजनीतिक नाराजगी का शिकार हुए. जोधपुर ग्रामीण के एसपी नारायण टोगस को केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के विरोध का सामना करना पड़ा. शेखावत ने टोगस की कार्यप्रणाली को लेकर मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था.
राजसमंद की एसपी ममता गुप्ता को भी स्थानीय राजनीतिक असंतोष के चलते पद से हटना पड़ा. ममता गुप्ता और राजसमंद सांसद महिमा कुमारी के बीच किसी मामले को लेकर बहस हुई थी, जिसके बाद सांसद ने मुख्यमंत्री को दो बार पत्र लिखकर शिकायत की थी. अब ममता गुप्ता की जगह हेमंत कलाल को राजसमंद का नया एसपी बनाया गया है.
खेल महोत्सव और युवा महोत्सव के दौरान हुई सरकार की किरकिरी की वजह से रसूखदार अफसर नीरज के. पवन को खेल और युवा विभाग के सचिव पद से हटाना पड़ा. पवन सोशल मीडिया पर अपनी रील्स को लेकर चर्चा में रहते हैं. बताया जा रहा है कि खेल महोत्सव में हुई खानापूर्ति और युवा महोत्सव में कम भीड़ जुटने की वजह से सरकार में उनके प्रति असंतोष था.
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीब 15 साल तक ओएसडी रहे आरएएस अधिकारी देवाराम सैनी का 25 दिन में दो बार तबादला हुआ है. 2 फरवरी को उन्हें बांसवाड़ा और फिर 27 फरवरी को बीकानेर कृषि विश्वविद्यालय का रजिस्ट्रार बना दिया गया. इससे पहले सरकार ने उन्हें दो महीने तक एपीओ (मूल पद से हटाकर दूसरी जगह नियुक्ति) रखा था. इसी तरह बांसवाड़ा में एएसपी पद पर दो सप्ताह के भीतर तीन अधिकारियों को बदला गया.
ये नाम तो केवल उदाहरण हैं. पिछले दो महीनों में करीब 950 अधिकारियों को इधर-उधर किया गया है. राज्य में आईपीएस के 90 पद हैं, जिनमें से 73 अधिकारियों को पिछले 15 दिनों में बदल दिया गया. आईएएस के 332 पदों में से 170 और आरएएस के 1050 पदों में से करीब 700 अधिकारियों का तबादला हो चुका है. सूत्रों के अनुसार, 41 आईपीएस अफसर ऐसे हैं जिन्हें 8 महीने में दूसरी बार तबादले का सामना करना पड़ा.
कांग्रेस प्रवक्ता जसवंत गुर्जर कहते हैं, "जब अधिकारियों के नाम दिल्ली से तय होकर आएंगे तो ऐसा ही होगा. अधिकारी बदलने से कुछ नहीं होने वाला, एक बार मुख्यमंत्री बदलकर देखना चाहिए."
जानकारों का मानना है कि बार-बार अफसरों को बदलने से प्रशासनिक व्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है. साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, बेहतर प्रशासन के लिए अधिकारी को कम से कम 730 दिन एक पद पर रखा जाना चाहिए. यह कार्यकाल उसे क्षेत्र की समस्याओं को समझने और योजनाओं को सही से लागू करने का अवसर देता है.
प्रशासनिक मामलों के जानकार गजेंद्र सिंह कहते हैं, "अधिकारियों के छोटे कार्यकाल और बार-बार हटाए जाने से जवाबदेही में कमी आती है. इससे प्रशासनिक निर्णयों में अधूरापन और नीतियों के क्रियान्वयन में सुस्ती नजर आती है."
देखा जाए तो राजस्थान में तबादलों की यह तेज रफ्तार सिर्फ प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि व्यवस्था की स्थिरता पर भी सवाल खड़ा कर रही है. जब अधिकारी कार्यभार संभालने से पहले ही बदल दिए जाएं, तो नीतियों की निरंतरता और जमीनी असर प्रभावित होना तय है.

