हाल में साउथ कोलकाता लॉ कॉलेज में एक महिला के साथ हुई गैंगरेप की घटना के बाद कोर्ट का एक अहम फैसला आया है. यह फैसला पश्चिम बंगाल में कॉलेजों के स्टूडेंट यूनियनों के काम करने के तरीके को बदल सकता है. दरअसल, कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य के सभी सरकारी मदद से चलने वाले कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में छात्र संघ के कमरों को तुरंत बंद करने का आदेश दिया है.
कोर्ट का 3 जुलाई का यह आदेश एक जनहित याचिका (PIL) पर आया, जिसका मकसद बंगाल के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघों के संचालन में गड़बड़ियों की ओर अदालत का ध्यान दिलाना था. याचिका दायर करने वाले वकील सयान बनर्जी ने बंगाल सरकार के उच्च शिक्षा विभाग के वरिष्ठ विधि अधिकारी के पहले दाखिल किए गए एक हलफनामे का हवाला दिया.
उस हलफनामे में बताया गया था कि कई विश्वविद्यालयों में पिछले कुछ वर्षों से चुनाव नहीं हुए हैं और कुछ जगहों पर छात्र संघ पूरी तरह बंद हो चुके हैं. बनर्जी ने बताया कि इसके बावजूद छात्रों से 'यूनियन फीस' ली जा रही है और छात्र संघ के कमरे खुले हुए हैं, जबकि कहीं भी कोई मान्यता प्राप्त छात्र संघ मौजूद नहीं है.
उन्होंने हाईकोर्ट में कहा, "न कोई छात्र परिषद है, न कोई छात्र संघ, लेकिन कमरा मौजूद है और छात्रों से यूनियन फीस वसूली जा रही है." उन्होंने राज्य के उच्च शिक्षा विभाग से मिली एक आरटीआई का जवाब भी कोर्ट में पेश किया, जिसमें पुष्टि की गई थी कि किसी भी राज्य संचालित कॉलेज में कोई सक्रिय छात्र परिषद नहीं है.
यह जनहित याचिका 25 जून को साउथ कोलकाता लॉ कॉलेज में हुए गैंगरेप की घटना के बाद दायर की गई थी. शिकायत के अनुसार, यह सब छात्र संघ के कमरे से शुरू हुआ, जहां मुख्य आरोपी मनोजित मिश्रा (जो कॉलेज का पूर्व छात्र है) ने पीड़िता पर हमला किया और फिर उसे घसीटकर सुरक्षा गार्ड के कमरे में ले जाकर उसके साथ बलात्कार किया.
हालांकि मनोजित मिश्रा अब उस कॉलेज का छात्र नहीं था, फिर भी उसका कैंपस में असर बना हुआ था. छात्रों का कहना है कि पूर्व छात्र संघ सदस्य और पुराने छात्र (एलुमनाई) अब भी छात्र संघ के कमरे में आ-जा सकते थे, जिससे सुरक्षा और कॉलेज की जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं.
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के जज सौमेन सेन और स्मिता दास डे ने गंभीर चिंता जताई और पूछा कि जब कोई मान्यता प्राप्त छात्र संघ नहीं है, तो छात्र संघ के कमरे सबके लिए खुले क्यों हैं. जस्टिस सेन ने कहा, "राज्य के सभी सहायता-प्राप्त कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के कमरे अगले आदेश तक बंद रहेंगे."
उन्होंने आगे कहा, "राज्य का उच्च शिक्षा विभाग इस संबंध में नोटिस जारी करे. कॉलेज प्रशासन इन कमरों को ताला लगाकर बंद रखे. इन कमरों का इस्तेमाल किसी भी मनोरंजन गतिविधि के लिए नहीं किया जा सकता. अगर कोई आपात स्थिति हो, तो कमरे को खोलने के लिए रजिस्ट्रार को लिखित आवेदन देना होगा."
अदालत ने उच्च शिक्षा विभाग को निर्देश दिया कि वह सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को एक आदेश भेजे, जिसमें कहा जाए कि जहां कोई मान्यता प्राप्त छात्र संघ नहीं है या हाल ही में चुनाव नहीं हुए हैं, वहां छात्र संघ के कमरे बंद किए जाएं. इन कमरों में प्रवेश केवल रजिस्ट्रार या किसी सक्षम अधिकारी की लिखित अनुमति से ही दिया जाएगा, और उसमें आने का कारण स्पष्ट रूप से बताया जाना जरूरी होगा. हालांकि, यह नियम छात्रों के इस्तेमाल में आने वाले सामान्य मनोरंजन कक्ष या कॉमन रूम पर लागू नहीं होगा.
साउथ कोलकाता लॉ कॉलेज के मामले में कोर्ट ने कहा कि छात्र संघ का कमरा अगली सूचना तक केवल जांच एजेंसी के लिए खुला रहेगा. कोर्ट में राज्य सरकार के वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने गैंगरेप की घटना से सरकार को अलग दिखाने की कोशिश की. उन्होंने दलील दी कि कॉलेजों में बाहरी लोग कैसे घुसे, इस पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है. उन्होंने कहा, "कॉलेज को खुद ही नियम बनाने चाहिए. इस मामले से हमारा कोई लेना-देना नहीं है. हमें नहीं पता कि ये कमरे छात्र इस्तेमाल करते हैं या नहीं."
हालांकि, कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाया और कहा कि सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी संस्थानों और उच्च शिक्षा विभाग की है. आदेश में कहा गया, "कुछ विश्वविद्यालयों में चुनाव ही नहीं हुए हैं. हम उच्च शिक्षा विभाग को निर्देश देते हैं कि वह सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को आदेश दे कि सभी छात्र संघ के कमरों को ताला लगाकर बंद किया जाए."
कोर्ट ने साउथ कोलकाता लॉ कॉलेज में हुई व्यापक सुरक्षा चूक पर भी ध्यान दिया और सरकार को निर्देश दिया कि वह एक हलफनामा दाखिल कर बताए कि बिना अनुमति वाले लोग कॉलेज परिसर में कैसे घुस पाए. साथ ही कॉलेज प्रशासन को अपनी सुरक्षा व्यवस्था का विवरण देते हुए एक रिपोर्ट दाखिल करने को कहा गया है.
इसी बीच गैंगरेप की घटना को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पुलिस जांच की प्रोग्रेस रिपोर्ट मांगी. राज्य सरकार के वकील के अनुसार, कोलकाता पुलिस ने तेजी से कार्रवाई की और एफआईआर दर्ज होने के तीन घंटे के भीतर विशेष जांच दल (SIT) की महिला अधिकारियों की टीम ने मुख्य आरोपी को गिरफ्तार कर लिया.
हालांकि, पीड़िता के वकील अरिंदम जना ने चिंता जताई कि मामले की मुख्य पीड़िता होने के बावजूद उसे अब तक मुकदमे में आधिकारिक रूप से पक्षकार नहीं बनाया गया है. वहीं, कोर्ट के बाहर पीड़िता के पिता ने मीडिया से कहा, "मेरी बेटी बहुत गहरे सदमे में है. हमें कोलकाता पुलिस और एसआईटी पर पूरा भरोसा है. आरोपी को सबसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए. हम जो झेल रहे हैं, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता."
इस फैसले ने बंगाल में छात्र शासन और कैंपस की सुरक्षा को लेकर जोरदार बहस छेड़ दी है. आलोचकों का कहना है कि छात्र संघों के लोकतांत्रिक ढांचे में गंभीर खामियां हैं. वर्षों से छात्र चुनाव न होने और पूर्व छात्रों के बेरोकटोक दखल के चलते कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि ऐसी स्थिति को इतने समय तक कैसे चलने दिया गया, और अब इसे सुधारने के लिए क्या जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए.
जैसे-जैसे यह मामला आगे बढ़ेगा, हाईकोर्ट के आदेश एक कानूनी मिसाल के रूप में काम करेंगे और यह याद दिलाएंगे कि बंगाल के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में संस्थागत सुधार और असली छात्र प्रतिनिधित्व की कितनी सख्त जरूरत है.-
- अर्कमोय दत्ता मजूमदार.

