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ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट के जरिए अपने वोटरों तक क्या संदेश पहुंचाया?

कानून की पढ़ाई कर चुकीं पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में SIRपर जो कहा वो कानूनी दलीलों से आगे अपने वोटरों को दिया गया राजनीतिक संदेश था

ममता बनर्जी (फाइल फोटो)
ममता बनर्जी (फाइल फोटो)
अपडेटेड 6 फ़रवरी , 2026

बीती 4 फरवरी को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी विधानसभा चुनावों से पहले अपने राज्य में मतदाता सूची के 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) को चुनौती देने के लिए खुद सुप्रीम कोर्ट में खड़ी हुईं.

यह एक असाधारण पल था. कानून की जानकारी रखने वाली एक मुख्यमंत्री, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच के सामने अपनी ही याचिका पर बहस कर रही थीं.

वहां जो कुछ हुआ, वह महज कानूनी दलील नहीं थी, बल्कि एक ऐसा राजनीतिक संवाद था जिसका कोर्टरूम के बाहर तक असर होना तय था. ममता का मुख्य तर्क सीधा लेकिन बहुत सख्त था. उन्होंने बेंच से कहा, "हमें कहीं भी न्याय नहीं मिल रहा है. मैंने निजी तौर पर छह चिट्ठियां लिखीं, लेकिन चुनाव आयोग से कभी कोई जवाब नहीं मिला."

यह लाइन उनकी शिकायत और उनके खुद पेश होने की वजह, दोनों को बयां करती थी. उनकी दलील थी कि SIR की प्रक्रिया मुख्य रूप से नाम जोड़ने के बजाय नाम काटने के बारे में हो गई है, जिसका असर बंगाल के आम वोटरों पर बहुत ज्यादा पड़ रहा है और यह उनके वोट डालने के हक को खतरे में डाल रहा है.

इसे आगे बढ़ाते हुए, ममता ने SIR को बंगाल के लोगों को निशाना बनाने वाली कवायद बताया. मुख्यमंत्री ने पूछा, "उन्होंने पश्चिम बंगाल के लोगों को कुचलने के लिए हमारे राज्य को क्यों निशाना बनाया; असम को क्यों नहीं? सिर्फ बंगाल ही क्यों?" ममता ने राज्यों का नाम लेते हुए इसे भेदभावपूर्ण बर्ताव बताया.

उनकी दलीलों का बड़ा हिस्सा असली उदाहरणों पर आधारित था-ऐसी महिलाएं जिन्होंने शादी के बाद अपना सरनेम बदला था, ऐसे परिवार जिन्होंने घर बदला था, और गरीब लोग जिनके नामों को मामूली गड़बड़ियों के कारण "लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी" बताकर फ्लैग किया गया था. ममता ने कहा कि इन सबके चलते वैध दस्तावेज होने के बावजूद उनके नाम लिस्ट से काट दिए गए.

ममता ने बार-बार प्रक्रिया की खामियों को उजागर किया. उन्होंने सवाल उठाया कि बंगाल में आधार जैसे दस्तावेजों को पहले स्वीकार किया गया लेकिन बाद में माइक्रो-ऑब्जर्वर्स ने उन्हें खारिज क्यों कर दिया, जबकि दूसरे राज्यों में ऐसे रिकॉर्ड्स के साथ अलग बर्ताव किया गया. उन्होंने कहा, "सर, आपने वेरिफिकेशन के लिए आधार कार्ड के इस्तेमाल की इजाजत दी थी. पश्चिम बंगाल के लोग आपके आदेश से बहुत खुश थे. लेकिन अब चुनाव आयोग कोर्ट के आदेश का उल्लंघन कर रहा है."

कोर्टरूम की बहस के लिहाज से अलग हटकर, उन्होंने जज्बाती बयान भी दिए. उन्होंने कोर्ट से कहा, "जब न्याय दरवाजे के पीछे रो रहा है, तो हमें लगा कि हमें कहीं न्याय नहीं मिल रहा." यह लाइन उनकी उस बड़ी अपील से जुड़ी थी कि SIR अभियान महिलाओं, किसानों, प्रवासियों और गरीब परिवारों के लिए मुसीबत की वजह बन गया है.

ये हवा-हवाई दावे नहीं थे; ये लंबी कतारों, दस्तावेजों को नकारे जाने और लॉजिस्टिकल दबाव के कारण हुई मौतों के आरोपों की व्यापक खबरों से जुड़े थे. बेंच ने ममता की दलीलों की भावनात्मक तीव्रता को पहचानते हुए, विवाद के कानूनी पहलुओं पर फोकस किया. CJI ने वोटर लिस्ट के फाइनल पब्लिकेशन की सख्त टाइमलाइन पर गौर किया और जोर दिया कि यह सुनिश्चित करना सबसे जरूरी है कि कोई भी निर्दोष वोटर बाहर न हो जाए. ऐसा करते हुए, बेंच ने चुनाव आयोग और चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर को औपचारिक नोटिस जारी किए और उन्हें अगली सुनवाई की तारीख तक लिखित में जवाब देने को कहा.

ममता ने अपनी बहस एक ऐसी अपील के साथ खत्म की जो कानून और लोकतांत्रिक प्रतीकवाद, दोनों को साथ लेकर चल रही थी. उन्होंने कहा, "मैं लोकतंत्र को बचाऊंगी." उन्होंने कोर्ट से नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की अपील की, जिसे उन्होंने एक तरह का सिस्टमिक (व्यवस्थागत) मताधिकार हनन बताया. यह लाइन उनकी बड़ी रणनीति का हिस्सा थी: इस कानूनी चुनौती को सिर्फ उनकी सरकार की लड़ाई न बताकर, पश्चिम बंगाल के वोटरों की ओर से एक संवैधानिक गुहार के रूप में पेश करना.

अगर सख्ती से कानूनी नजरिए से देखें, तो उनकी कई दलीलों में उनके वकीलों और सहयोगी याचिकाकर्ताओं द्वारा पहले से दायर किए गए दस्तावेजों से हटकर कोई बहुत नई बात नहीं थी. लेकिन खुद व्यक्तिगत रूप से बोलकर, ममता ने तकनीकी आपत्तियों को लोकतांत्रिक 'अर्जेन्सी' में बदल दिया.

उनके कोर समर्थकों- ग्रामीण मतदाता, नाम में गड़बड़ी से प्रभावित महिलाएं और अपनी वोटिंग स्थिति को लेकर चिंतित परिवारों—के लिए, उनके शब्दों में तत्काल राजनीतिक गूंज थी. जानकारों ने नोट किया कि भले ही न्याय शायद उतनी स्पष्टता से न मिले जिसकी उन्होंने मांग की थी, लेकिन देश की सबसे बड़ी अदालत के सामने ममता का विद्रोही तेवर दिखाना अपने आप में उनके राजनीतिक इरादों का एक निशान था.

हालांकि, आलोचक यह तर्क देंगे कि चुनावी प्रशासन को जानबूझकर परेशान करने वाला बताना संस्थागत अविश्वास को गहरा करने का जोखिम पैदा करता है और एक निष्पक्ष प्रक्रिया का राजनीतिकरण करता है. चुनाव आयोग ने भेदभाव के दावों को खारिज किया है, यह कहा है कि SIR कानूनी है, और वोटर लिस्ट को साफ करने के लिए "लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी" कैटेगरी के इस्तेमाल को जरूरी बताकर उसका बचाव किया है.

कोर्ट का लगातार इसमें शामिल होना यह बताता है कि यह विवाद प्रशासन और राजनीति के उस चौराहे पर खड़ा है, जो एक संघर्ष वाला इलाका है और पश्चिम बंगाल चुनावों से पहले कानूनी नतीजों और चुनावी नैरेटिव, दोनों को तय करेगा.

ममता 9 फरवरी को होने वाली मामले की सुनवाई में भी खुद मौजूद रहेंगी. यह कवायद जितनी कानूनों के बारे में है, उतनी ही संकेत देने के बारे में भी है. सुप्रीम कोर्ट को सीधे संबोधित करने का ममता का विकल्प यह सुनिश्चित करता है कि उनकी आवाज पूरे भारत के लोगों तक पहुंचे, क्योंकि उन्होंने उन मतदाताओं की ओर से अपील की जिन्हें उन्होंने अनदेखा और अनसुना बताया.

यह न्यायिक राहत में बदलता है या राजनीतिक फायदे में, यह अब भी एक सवाल बना हुआ है. लेकिन इस दिन को एक ऐसे दुर्लभ पल के रूप में याद किया जाएगा जब राजनीतिक नेतृत्व और कानूनी लड़ाई भारत की सर्वोच्च अदालत में एक साथ मिल गए.

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