पश्चिम बंगाल में 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) के बाद भारी संख्या में वोटर्स को 'अंडर एडजुडिकेशन' यानी जांच के दायरे में रखा गया है. इन विचाराधीन मतदाताओं की संख्या ने राजनीतिक बेचैनी पैदा कर दी है जो सिर्फ प्रशासनिक सफाई से परे, सीधे चुनावी गणित बिगाड़ रही है.
SIR के बाद, 60,06,675 नामों को एडजुडिकेशन के लिए मार्क किया गया है. यह आंकड़ा इसलिए खटकता है क्योंकि अब तक 63,66,952 नाम काटे जा चुके हैं, जबकि सिर्फ 1,88,707 नए नाम जुड़े हैं. सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ऐतिहासिक रूप से एकजुट अल्पसंख्यक वोटों पर निर्भर रही है. ऐसे में यह असंतुलन उसके लिए एक बड़ी मुसीबत बन सकता है.
जिन 10 जिलों में सबसे ज्यादा विचाराधीन मतदाता हैं, उनमें से नौ में मुस्लिम वोटर्स की आबादी 40 से 90 प्रतिशत के बीच है: मुर्शिदाबाद (11,01,145), मालदा (8,28,127), उत्तर 24 परगना (5,91,252), दक्षिण 24 परगना (5,22,042), उत्तर दिनाजपुर (4,80,341), पूर्व बर्धमान (3,65,539), हावड़ा (2,89,714), नदिया (2,67,940) और बीरभूम (2,02,059).
अकेले मुर्शिदाबाद में 22 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 40 से 90 प्रतिशत के बीच है. 2021 के विधानसभा चुनाव में TMC ने इनमें से 20 सीटें जीती थीं, जबकि बहरामपुर और मुर्शिदाबाद BJP के खाते में गई थीं. इन दोनों सीटों पर करीब 53 प्रतिशत मुस्लिम वोटर्स थे, फिर भी BJP इसलिए जीत गई क्योंकि मुस्लिम वोट कांग्रेस और TMC के बीच बंट गए, जिससे BJP ने हिंदू वोटों को लगभग पूरी तरह से एकजुट कर लिया. आने वाले चुनाव में, अगर इस वोटर बेस में थोड़ी भी कांट-छांट होती है और इसका असर मुस्लिम वोटर्स पर ज्यादा पड़ता है, तो यह उन सीटों के नतीजे पलट सकता है जहां जीत का अंतर बहुत कम है और वोटों पर ध्रुवीकरण का असर मौजूद है.
मालदा में भी लगभग ऐसा ही पैटर्न दिखता है. इस जिले में आठ विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर्स 40 से 90 प्रतिशत हैं. 2021 में ये आठों सीटें TMC ने जीती थीं, लेकिन यहां भी (मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर के कुछ हिस्सों की तरह) कांग्रेस की गहरी जमीनी पकड़ है. इस वजह से मुस्लिम वोट शायद ही कभी एकमुश्त पड़े हों. सत्ताधारी पार्टी की चिंता सिर्फ वोट कटने की नहीं है, बल्कि यह है कि एक घटा हुआ और बंटा हुआ अल्पसंख्यक वोट-बैंक, एकजुट हिंदू वोट-बैंक के असर को और कितना बड़ा कर देगा.
उत्तर दिनाजपुर इस चिंता को और बढ़ा देता है. 2021 में इस जिले की सात मुस्लिम-बहुल सीटें TMC के पास गई थीं, भले ही मुस्लिम वोट तृणमूल और कांग्रेस के बीच लगातार बंटते रहे. इन सीटों पर BJP की कमजोरी ऐतिहासिक रूप से नंबर गेम में रही है. अगर एडजुडिकेशन के जरिए अल्पसंख्यक वोटर बेस सिकुड़ता है (भले ही कागजों पर यह कानूनी रूप से सही हो), तो अगर हिंदू वोट पूरी तरह से एकजुट हो जाएं, तो पहले कभी न जीती जा सकने वाली सीटें भी कांटे की टक्कर वाली बन सकती हैं.
यही दलील दक्षिण की तरफ भी लागू होती है. उत्तर और दक्षिण 24 परगना में करीब 20 मुस्लिम-बहुल सीटें हैं. इनमें से 19 पर 2021 में तृणमूल ने जीत दर्ज की थी, जबकि एक इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के पास गई थी. इन सीटों पर औसत मुस्लिम आबादी करीब 52.5 प्रतिशत है. असल में, कई सीटें 40-45 प्रतिशत की दहलीज के ठीक ऊपर या नीचे हैं, जिनमें राजारहाट न्यूटाउन, स्वरूपनगर, बसंती, जयनगर, कैनिंग पश्चिम, बजबज, मेटियाब्रूज, डायमंड हार्बर और मोगराहाट पूर्व शामिल हैं. ऐसी सीटों पर अल्पसंख्यक वोटर्स में एक छोटी सी कमी भी बाजी पलट सकती है, खासकर तब जब BJP की रणनीति जाति और वर्ग से ऊपर उठकर हिंदू वोटों को एकजुट करने पर फोकस कर रही है.
टॉप 10 के बाकी जिले भी इसी पैटर्न की गवाही देते हैं. नदिया में छह मुस्लिम-बहुल सीटें हैं, बीरभूम में तीन, जबकि पूर्व बर्धमान और हावड़ा में दो-दो सीटें हैं. हावड़ा के पांचला और उलूबेरिया दक्षिण में मुस्लिम वोटर्स करीब 43 और 40 प्रतिशत हैं. पूर्व बर्धमान के मोंतेश्वर और केतुग्राम में यह आंकड़ा 40 और 45 प्रतिशत है. नदिया में ऐसी छह में से चार सीटों पर मुस्लिम आबादी 50 प्रतिशत से कम है, और बीरभूम में तीन में से एक सीट इसी कैटेगरी में आती है. ये ठीक वही इलाके हैं जहां वोटर लिस्ट में होने वाला मामूली सा फेरबदल भी बहुत बड़े राजनीतिक नतीजे ला सकता है.
चुनाव आयोग और BJP का कहना है कि सिर्फ गैर-कानूनी या अयोग्य नाम ही हटाए जा रहे हैं, और असली वोटर्स को डरने की कोई जरूरत नहीं है. फिर भी, एडजुडिकेशन वाले नामों वाली फाइनल वोटर लिस्ट जारी होने के बाद से, ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां लोगों के जिंदा होने और सही कागजात होने के बावजूद उनके नाम काट दिए गए हैं. और यह हर धर्म के लोगों के साथ हुआ है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसा जानबूझकर किया गया है, लेकिन इससे राजनीतिक नैरेटिव उलझ जाता है, खासकर उन जिलों में जहां अल्पसंख्यक ही TMC की चुनावी ताकत की रीढ़ हैं.
बड़ी तस्वीर इन आंकड़ों को और भी संवेदनशील बना देती है. 2024 के आम चुनाव में, TMC और BJP के बीच वोटों का अंतर सिर्फ 42,43,052 था, भले ही वोट-शेयर का फासला 3 प्रतिशत से ज्यादा (तृणमूल 43.69 प्रतिशत, BJP 40.64 प्रतिशत) था. 2021 के विधानसभा चुनाव में यह फासला 60,62,807 वोटों का था, जहां तृणमूल को 48.02 प्रतिशत और BJP को 38.15 प्रतिशत वोट मिले थे. अंतर का यह घटता फासला इशारा करता है कि BJP को अपनी स्थिति सुधारने के लिए अब किसी बड़े चमत्कारिक स्विंग की जरूरत नहीं. वोटर लिस्ट में बदलाव से मिलने वाला स्ट्रक्चरल फायदा, भले ही वे छोटे पैमाने पर हो, कांटे की टक्कर वाली सीटों पर चुनावी रूप से निर्णायक साबित हो सकता है.
इस नजरिए से देखें, तो टॉप 10 जिलों में अंडर-एडजुडिकेशन के आंकड़े सिर्फ कोई प्रशासनिक बैकलॉग नहीं हैं, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक फॉल्ट लाइन हैं. एक ऐसी पार्टी के लिए जो अल्पसंख्यक वोटों के एकजुट होने और विपक्ष के बंटने पर निर्भर है तब कोई भी ऐसी प्रक्रिया जो उस बेस को सिकोड़ने का जोखिम पैदा करता हो (वो भी तब जब BJP की हिंदू वोट बैंक को एकजुट करने की रणनीति जस की तस हो), तो बेचैनी पैदा होना तय है. इसके फाइनल नतीजे इन डरों को सही साबित करेंगे या गलत, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि एडजुडिकेशन का प्रोसेस कैसे आगे बढ़ता है. लेकिन सिर्फ ये आंकड़े ही बता देते हैं कि यह मुद्दा TMC के लिए इतना बड़ा सिरदर्द क्यों बन गया है.

