कोलकाता स्थित पब्लिक पॉलिसी और डेटा रिसर्च संस्थान 'सबर इंस्टीट्यूट' ने अपनी हालिया रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में हुए SIR को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. संस्थान ने मतदाता सूची से नाम हटाने के पैमाने और तरीके को लेकर ये सवाल उठाए हैं.
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान कुल 91 लाख नाम हटाए गए थे. रिसर्च के मुताबिक, इनमें से केवल 24 लाख ही मृत मतदाताओं के नाम थे. बाकी 66.6 लाख नाम उन लोगों के हटाए गए हैं, जिनका या तो पता नहीं मिला या वे कहीं और चले गए थे या उनके नाम दो बार लिखे हुए थे.
मतदाता सूची के संशोधन में मृत लोगों के नाम नियमित रूप से हटाए जाते हैं, लेकिन बंगाल में जीवित मतदाताओं के नाम असमान्य रूप से बहुत अधिक संख्या में हटाए गए हैं. इस वजह से यह चर्चा तेज हो गई है कि यह या तो एक सोची समझी साजिश के तहत नाम हटाने की कोशिश है या फिर व्यवस्थागत गड़बड़ियां. जिन गड़बड़ियों के कारण सही-सही मतदाताओं को भी सूची से बाहर कर दिया गया.
चुनाव आयोग के SIR में 58.1 लाख नाम ASDD श्रेणी में चिह्नित किए गए थे. ASDD का अर्थ है — Absent (गैर-हाजिर), Shifted (स्थानांतरित), Dead (मृत) या Deleted (हटाए गए). दिसंबर 2025 के ड्राफ्ट रोल की अतिरिक्त जांच में 5.46 लाख और नाम हटाए गए. इसके अलावा, 60 लाख से अधिक नामों की जांच में से 27.1 लाख नाम अंतिम निर्णय के बाद हटा दिए गए. इन सब प्रक्रियाओं के बाद कुल 90.8 लाख से ज्यादा नाम मतदाता सूची से हटाए गए.
पूरे राज्य भर से इतने नामों को हटाया गया है, जिससे विवाद और बढ़ गया है. कोलकाता की चौरंगी और जोरासांको, मुर्शिदाबाद का समसेरगंज, हावड़ा उत्तर और कोलकाता पोर्ट जैसे इलाकों में सबसे ज्यादा नाम कटे हैं. चौरंगी में 87,725 नाम कटे, जिनमें 74,000 से ज्यादा जीवित लोगों के थे.
समसेरगंज में 91,712 में से 83,000 से ज्यादा जीवित लोगों के नाम ही लिस्ट से बाहर किए जाने की खबर है. ये जगहें राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील हैं. यहां आबादी बहुत ज्यादा है और लोग अक्सर जगह बदलते रहते हैं. कुछ इलाकों की आबादी का स्वरूप भी काफी जटिल है.
सबर इंस्टीट्यूट की स्टडी में शामिल शोधकर्ता अशिन चक्रवर्ती ने कहा कि उनका प्रयास सिर्फ हटाए गए मतदाताओं की गिनती करना नहीं था, बल्कि एक बेहद चिंताजनक मामले को उजागर करना था. अशिन चक्रवर्ती ने आगे कहा, "हमारा उद्देश्य यह पता लगाना था कि SIR के दौरान कितने जीवित मतदाताओं के नाम सूची से गायब हो गए.” उन्होंने बताया, “मृत मतदाताओं के नाम हर साल नियमित रूप से हटाए जाते हैं. यह अपेक्षित है, लेकिन जो अपेक्षित नहीं है और जो चुनावी निष्पक्षता की चिंता करने वाले हर व्यक्ति को परेशान करना चाहिए, वह जीवित लोगों के नाम को मतदाता सूची से बाहर करने की बात है.”
सबर इंस्टीट्यूट के इस रिपोर्ट ने बंगाल के चुनावी माहौल को और गरमा दिया है. दरअसल, बंगाल में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान 23 और 29 अप्रैल को होना है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने SIR को जल्दबाजी में किया जाने वाला गैर-पारदर्शी और BJP को फायदा पहुंचाने वाली प्रक्रिया बताया है. TMC ने इस प्रक्रिया के खिलाफ अदालत का भी रुख किया था. सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि जिन हटाए गए मतदाताओं ने अपील की है, वे तभी वोट कर सकेंगे, जब उनके नाम को चुनाव से पहले अपील ट्रिब्यूनल के जरिए बहाल कर दिए जाते हैं.
मतदाता सूची ही लोकतंत्र की असली नींव है. जब नाम काटने की रफ्तार स्पष्ट कारणों से ज्यादा हो जाए, जैसा बंगाल में हो रहा है तो लोगों के मन में शक पैदा होना लाजमी है. ऐसे में लोगों के मन में यह भूी सवाल उठ रहा है कि क्या चुनाव आयोग ने जरूरत से ज्यादा सख्ती कर दी है या इसमें कुछ और बड़ी गड़बड़ी है? हालांकि, इस चुनाव के बाद भी इस विवाद के थमने की उम्मीद काफी कम है.

