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दान विवाद के बाद राम मंदिर में बजी बदलाव की घंटी

अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे के हिसाब-किताब वाली जगह पर कड़ी निगरानी लागू की गई है. इसके अलावा दूसरे बदलावों के तहत सीईओ नियुक्ति और ट्रस्ट में जवाबदेही पर चर्चा चल रही है

Ayodhya Ram Temple
अयोध्या का राम मंदिर (फाइल फोटो)
अपडेटेड 23 जून , 2026

अयोध्या में राम मंदिर में दान राशि और चढ़ावे के प्रबंधन में कथित गड़बड़ी के आरोपों ने मंदिर प्रशासन के पूरे ढांचे को कटघरे में खड़ा कर दिया है. दान राशि में हेरफेर के आरोप सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने वरिष्ठ आइएएस अधिकारी और लखनऊ मंडल के कमिश्नर विजय विश्वास पंत की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय एसआईटी गठित की है.

यह जांच केवल कथित चोरी तक सीमित नहीं है बल्कि मंदिर में दान स्वीकार करने, उसकी गणना करने, सुरक्षित रखने और बैंक में जमा करने की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा भी कर रही है. एसआईटी ने अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट 23 जून को उत्तर प्रदेश सरकार के अपर मुख्य सचिव, मुख्यमंत्री और गृह संजय प्रसाद को सौंप दी.

हालां‍कि इससे पहले राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूर्व प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा का एक बयान पूरे घटनाक्रम को नई दिशा देता भी दिखाई दे रहा है. मिश्रा ने सुझाव दिया है कि अब राम मंदिर परिसर के लिए एक पूर्णकालिक मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ अथवा प्रशासक नियुक्त किया जाना चाहिए. उनके अनुसार मंदिर का कामकाज अब किसी छोटे जिले के प्रशासन के बराबर हो चुका है और इसे पेशेवर तरीके से संचालित करने की आवश्यकता है

जब मंदिर बन गया एक ‘छोटा जिला’

नृपेंद्र मिश्रा ने जिस संदर्भ में सीईओ की जरूरत बताई, वह अपने आप में महत्वपूर्ण है. उनके मुताबिक 71 एकड़ में फैला राम मंदिर परिसर और उससे जुड़ी गतिविधियां अब किसी छोटे जिले की प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बराबर हैं. प्रतिदिन लगभग एक लाख श्रद्धालुओं की आवाजाही, सुरक्षा प्रबंधन, दर्शन व्यवस्था, सफाई, यातायात नियंत्रण, वीआईपी प्रबंधन, धार्मिक अनुष्ठान, निर्माण गतिविधियां और लाखों रुपए के चढ़ावे का हिसाब-किताब एक विशाल प्रशासनिक ढांचे की मांग करता है.

मिश्रा का कहना है कि इस स्तर की जिम्मेदारी किसी ऐसे अधिकारी के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती जो पहले से सरकारी सेवा में हो और जिसके सामने कैडर, तबादले तथा अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी हों. उनका मानना है कि राम मंदिर को ऐसा पूर्णकालिक अधिकारी चाहिए जो कम से कम पांच से सात वर्षों तक लगातार इस जिम्मेदारी को संभाले और चौबीसों घंटे केवल इसी काम पर ध्यान दे सके. यही वजह है कि उन्होंने ट्रस्ट के अधीन एक स्वतंत्र और पेशेवर सीईओ की नियुक्ति का सुझाव दिया है, जिसे रोजमर्रा के प्रशासनिक फैसले लेने की पर्याप्त स्वतंत्रता भी मिले.

एसआईटी जांच ने क्यों बढ़ा दी बदलाव की मांग?

राम मंदिर में दान राशि की कथित चोरी का मामला सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि आखिर इतनी बड़ी व्यवस्था में निगरानी के बावजूद गड़बड़ी कैसे संभव हुई. जांच के दौरान यह संकेत मिले कि दान की गणना और बैंक में जमा करने की प्रक्रिया में कुछ ऐसी कमजोरियां थीं जिनका फायदा उठाया जा सकता था. एसआईटी ने जांच शुरू होते ही कई प्रक्रियाओं में बदलाव का निर्देश दिया. यात्री सुविधा केंद्र के गोपनीय कक्ष में जहां दान राशि की गणना होती है, वहां लगे सीसीटीवी कैमरों के लिए अलग कंट्रोल रूम बनाया गया है.

इस कंट्रोल रूम का एक्सेस पुलिस को भी दिया गया है ताकि निगरानी केवल मंदिर प्रशासन तक सीमित न रहे. इसके अलावा नकदी को बैंक में जमा कराने की प्रक्रिया में भी अतिरिक्त सुरक्षा उपाय जोड़े गए हैं. अब नकदी की सीलिंग और बैंक में जमा कराने के दौरान तीन अलग-अलग व्यक्तियों से क्रॉस चेक कराया जाएगा और उनके हस्ताक्षर लिए जाएंगे. बैंक में पहुंचने के बाद राशि का अलग से मिलान होगा. गणना कक्ष में प्रवेश और निकास के समय कर्मियों की सघन तलाशी भी अनिवार्य कर दी गई है. जांच में यह पाया गया था कि पहले गणना कर्मियों की निकासी के समय पर्याप्त जांच नहीं होती थी. अब इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया गया है.

दानपात्र से बैंक तक हर कदम पर निगरानी

एसआईटी की सिफारिशों के बाद दान प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की कोशिश की जा रही है. मंदिर परिसर में स्थापित सभी दानपात्रों और कैश काउंटरों को सीसीटीवी निगरानी में रखा गया है. दानपात्र खोलने से लेकर नकदी निकालने और उसे गणना कक्ष तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाएगी. कैमरों से किसी तरह की छेड़छाड़ न हो सके, इसके लिए अलग नियंत्रण व्यवस्था विकसित की गई है.

गिनती के बाद बैंक में जमा होने वाली राशि के लिए भी बहुस्तरीय सत्यापन प्रणाली लागू की जा रही है. जानकारी के मुताबिक गणना प्रक्रिया में शामिल ट्रस्ट, बैंक और आउटसोर्स एजेंसी के कर्मचारियों को बदलने पर भी विचार किया जा रहा है. जांच एजेंसियों का मानना है कि यदि किसी व्यवस्था पर सवाल उठे हैं तो केवल नियम बदलना पर्याप्त नहीं होगा बल्कि उस व्यवस्था को संचालित करने वाले लोगों की भूमिका की भी समीक्षा करनी होगी.

क्या काशी विश्वनाथ मॉडल बनेगा नया रास्ता?

राम मंदिर में संभावित बदलावों की चर्चा के बीच वाराणसी का काशी विश्वनाथ धाम एक उदाहरण के रूप में सामने आ रहा है. मंदिर प्रशासन से जुड़े कई लोगों का मानना है कि चढ़ावे की गणना और निगरानी के मामले में काशी विश्वनाथ देश के सबसे सफल मॉडलों में से एक है. काशी विश्वनाथ धाम में दानपात्रों की गणना पूरी तरह पारदर्शी प्रक्रिया के तहत होती है. वहां 56 हुंडियों से प्राप्त नकदी और आभूषणों की गणना सीसीटीवी निगरानी में होती है. दानपात्रों को निर्धारित स्थान तक लाने वाले कर्मचारियों की गतिविधियों पर बॉडी वॉर्न कैमरों से नजर रखी जाती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गिनती ऐसे स्थान पर होती है जिसे श्रद्धालु भी देख सकते हैं.

नकदी की गणना के बाद राशि सीधे बैंक अधिकारियों को सौंप दी जाती है. बैंक अधिकारी उसी समय उसे खाते में जमा कर स्टेटमेंट जारी करते हैं. पूरी प्रक्रिया में कई अधिकारियों के हस्ताक्षर और सत्यापन शामिल होते हैं. आभूषणों का वजन दर्ज कर उनका पूरा रिकॉर्ड तैयार किया जाता है और फिर उन्हें डबल लॉक सुरक्षा प्रणाली में रखा जाता है. यही वजह है कि 1983 में मंदिर के अधिग्रहण के बाद से चढ़ावे की पारदर्शिता को लेकर कोई बड़ा विवाद सामने नहीं आया.

हालांकि नृपेंद्र मिश्रा ने तिरुपति बालाजी मंदिर का उदाहरण जरूर दिया है लेकिन यह भी स्पष्ट किया है कि अयोध्या का मॉडल उससे अलग होना चाहिए. तिरुपति में सीईओ राज्य सरकार के कानून के तहत नियुक्त होते हैं जबकि अयोध्या राम मंदिर का संचालन श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के माध्यम से होता है. यह ट्रस्ट एक स्वायत्त संस्था है, जिसका गठन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने किया था.

ट्रस्ट में कुल 15 सदस्य हैं, जिनमें केंद्र और राज्य सरकार के प्रतिनिधि भी शामिल हैं. अयोध्या के जिलाधिकारी इसके पदेन सदस्य हैं. ऐसे में सीईओ की नियुक्ति होने पर भी उसे ट्रस्ट के अधीन काम करना होगा. लेकिन प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि रोजमर्रा के संचालन में उसे पर्याप्त अधिकार और स्वतंत्रता देना आवश्यक होगा, तभी वह प्रभावी ढंग से काम कर सकेगा.

ट्रस्ट के भीतर भी हो सकते हैं बदलाव

एसआईटी जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इसकी आंच केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं दिख रही. जानकारी के अनुसार कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों की भूमिका और जिम्मेदारियों की भी समीक्षा की जा रही है. चर्चा है कि विस्तृत जांच पूरी होने के बाद ट्रस्ट के कुछ प्रमुख पदाधिकारी स्वयं पद छोड़ सकते हैं. इनमें महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी अनिल मिश्रा और कुछ अन्य जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों के नाम चर्चा में हैं. हालांकि अभी तक किसी भी स्तर पर इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. जांच एजेंसियां यह भी देख रही हैं कि यदि कथित गड़बड़ी हुई तो क्या यह केवल कुछ कर्मचारियों की करतूत थी या फिर निगरानी व्यवस्था की विफलता भी इसके लिए जिम्मेदार थी. यही कारण है कि कई लोगों का मानना है कि जांच के बाद जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं रहेगी.

दान राशि में कथित गड़बड़ी के आरोपों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मंदिर जितना बड़ा होता जाएगा, उसके प्रबंधन को उतना ही अधिक पेशेवर और पारदर्शी बनाना होगा. इसी ने अयोध्या के राम मंदिर के लिए एक नए प्रशासनिक मॉडल की गुजाइश पैदा की है.

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