ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और चित्रकूट स्थित श्री तुलसी पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामभद्राचार्य के बीच चल रहा विवाद अब सिर्फ वैचारिक मतभेद नहीं रह गया है. यह टकराव शास्त्रीय वैधता, परंपरा, राजनीतिक समीकरण, प्रशासनिक हस्तक्षेप और अब आपराधिक आरोपों तक फैल चुका है. सवाल यह है कि आखिर दोनों संतों के बीच ऐसी क्या वजहें रहीं कि मामला व्यक्तिगत कटुता और अदालत तक पहुंच गया?
तनाव की शुरुआत पिछले महीने प्रयागराज में माघ मेला के दौरान तब मानी जाती है जब रामभद्राचार्य ने सार्वजनिक मंचों से अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य पद पर नियुक्ति की वैधता पर सवाल उठाए. उनका कहना था कि परंपरागत शास्त्रीय प्रक्रिया और अखाड़ों की स्वीकृति के बिना किसी को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य नहीं माना जा सकता.
जवाब में अविमुक्तेश्वरानंद ने भी पलटवार किया और तुलसी पीठ की प्रामाणिकता पर प्रश्न खड़े किए. उन्होंने रामभद्राचार्य को “स्वयंभू” कहकर संबोधित किया. यहीं से यह बहस “कौन असली, कौन नकली” की सार्वजनिक जंग में बदल गई. दोनों पक्षों के समर्थकों ने इसे प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया. बयानबाजी का स्तर तब और नीचे चला गया जब अविमुक्तेश्वरानंद ने रामभद्राचार्य की शारीरिक अक्षमता पर टिप्पणी की, जिससे उनके अनुयायियों में गहरा आक्रोश फैल गया.
विवाद को नई दिशा तब मिली जब उत्तर प्रदेश सरकार ने माघ मेले के दौरान शंकराचार्य पद के उपयोग और शिविर संचालन को लेकर अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी किया. रामभद्राचार्य ने खुलकर सरकार की कार्रवाई का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि संत परंपरा की मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है और जो भी उससे भटकता है, उस पर कार्रवाई होनी चाहिए. इसी दौरान अविमुक्तेश्वरानंद ने गोमाता को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने और गोहत्या मुक्त भारत की मांग को लेकर सरकार को 40 दिन का समय देने की घोषणा की.
उनके समर्थकों का दावा है कि इसी के बाद “सत्ता समर्थित धर्माचार्यों का एक समूह” सक्रिय हुआ और उन्हें बदनाम करने की कोशिशें तेज हो गईं. अविमुक्तेश्वरानंद ने मीडिया से कहा कि जबसे उन्होंने गोसंरक्षण को लेकर आवाज उठाई है, तबसे कुछ लोगों को यह रास नहीं आ रहा.
तनाव उस समय कानूनी मोड़ पर पहुंच गया जब रामभद्राचार्य के शिष्य आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज ने 8 फरवरी को प्रयागराज की स्पेशल पॉक्सो कोर्ट में वाद दायर किया. उन्होंने आरोप लगाया कि अविमुक्तेश्वरानंद के शिविर और गुरुकुल में नाबालिग बच्चों का शोषण होता है. अपनी शिकायत के समर्थन में उन्होंने दो बच्चों को कोर्ट में पेश करने का दावा किया. शिकायत में कहा गया कि बच्चों से निजी सेवा, भीड़ जुटाने, कार्यक्रमों में काम कराने और पालकी उठवाने जैसे कार्य कराए जाते हैं. यौन शोषण की आशंका जताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की गई. साथ ही आय से अधिक संपत्ति, कई बैंक खातों और अवैध गतिविधियों की जांच की भी बात कही गई.
मुकुंदानंद नामक व्यक्ति की भूमिका की जांच की मांग भी शिकायत में शामिल है. आशुतोष ब्रह्मचारी का आरोप है कि उन्होंने 24 जनवरी को झूंसी थाने में शिकायत दी, 25 जनवरी को पुलिस कमिश्नर और माघ मेला के पुलिस अधीक्षक को ईमेल भेजा, 27 जनवरी को डाक से शिकायत की, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं हुई. इसके बाद उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया. उनका कहना है कि बच्चों ने असुरक्षा की बात कही और पुलिस संरक्षण की मांग की.
दूसरी ओर अविमुक्तेश्वरानंद पक्ष ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है. 9 फरवरी को उनके प्रतिनिधि कोर्ट में पहुंचे और आरोपों को बेबुनियाद बताया. एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि अभी तक उनके खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत न कोई एफआईआर दर्ज है, न किसी अदालत ने समन जारी किया है. इसलिए 10 फरवरी को वकील द्वारा जवाब दाखिल करने की बात भी तथ्यहीन बताई गई. प्रेस नोट में यह भी कहा गया कि 28 जनवरी को आशुतोष ब्रह्मचारी ने पॉक्सो अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज कराने के लिए आवेदन दिया था, लेकिन अदालत ने तत्काल आदेश देने से इनकार करते हुए पुलिस से रिपोर्ट मांगी.
अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से दावा किया गया कि झूठी खबरों के प्रसार के बाद उन्होंने स्वयं आशुतोष ब्रह्मचारी और एक अन्य के खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 22 और 23 तथा भारतीय न्याय संहिता की मानहानि से संबंधित धाराओं में आवेदन दायर किया. कोर्ट ने इसे कम्प्लेंट केस सीएमसी संख्या 125/2026 के रूप में दर्ज कर 20 फरवरी तक जवाब देने के लिए समन जारी किया.
आशुतोष ब्रह्मचारी की दूसरी शिकायत में आरोप लगाया गया कि माघ मेला क्षेत्र में अविमुक्तेश्वरानंद खुद को ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य बताकर “ज्योतिष्पीठ/श्री शंकराचार्य शिविर” के नाम से लेटरपैड और दस्तावेज जारी कर रहे हैं. इन दस्तावेजों को फर्जी और भ्रामक बताया गया. 24 जनवरी 2026 की तारीख वाले पत्रों की वैधता पर सवाल उठाए गए. अविमुक्तेश्वरानंद पक्ष का कहना है कि यह सब उन्हें बदनाम करने की साजिश है और उनके पद की वैधता को चुनौती देने का एक और प्रयास है. उनका तर्क है कि शंकराचार्य पद को लेकर लंबे समय से चल रही वैचारिक असहमति को अब आपराधिक रंग दिया जा रहा है.
दोनों संतों के बीच टकराव केवल वैचारिक बहस तक सीमित नहीं रहा. माघ मेले में शिविरों को लेकर हुए विवाद ने इसे और उग्र बना दिया. सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे पर तीखी टिप्पणियों ने रिश्तों को और बिगाड़ा. समर्थक गुटों ने भी सोशल मीडिया और प्रेस विज्ञप्तियों के जरिए माहौल को और गरमाया. अब मामला अदालत में है.
20 फरवरी को दोनों पक्षों के वकीलों की पेशी तय है. एक ओर आशुतोष ब्रह्मचारी गंभीर आपराधिक जांच की मांग कर रहे हैं, दूसरी ओर अविमुक्तेश्वरानंद इसे राजनीतिक और संस्थागत साजिश बता रहे हैं. यह विवाद केवल दो व्यक्तियों के बीच की लड़ाई नहीं रह गया है. इससे संत समाज की एकता, धार्मिक संस्थाओं की पारदर्शिता और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं. शंकराचार्य जैसे पद की गरिमा, उसकी नियुक्ति की प्रक्रिया और उसके सार्वजनिक उपयोग को लेकर बहस तेज हो गई है. साथ ही, पॉक्सो जैसे संवेदनशील कानून का नाम सामने आने से मामला और गंभीर हो गया है. अगर आरोप सिद्ध होते हैं तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे. यदि आरोप निराधार साबित होते हैं, तो झूठे मुकदमों और धार्मिक प्रतिस्पर्धा की राजनीति पर भी चर्चा होगी.

