
ये दक्षिणी दिल्ली में अटल कैंटीन की रसोई है. यहां एक बड़े बर्तन में उबलते पानी के साथ दाल पक रही है. नमक का पैकेट, करीब-करीब पूरा ही उसमें उड़ेल दिया जाता है. कुछ कर्मचारी अभी पोछा मार रहे हैं, सफाई कर रहे हैं, सब्जियां छील रहे हैं और काट रहे हैं.
बफैंट कैप और एप्रन पहने हुए इन कर्मचारियों के साथ इस रसोई में सुबह से ही बर्तनों की आवाज आने लगती है. कैंटीन के मैनेजर मनोज (34 वर्ष) दोपहर 1 बजे पैजामा पहनकर आते हैं और अपने डिप्टी से बात करने के बाद व्हाइटबोर्ड पर जाकर दोपहर के खाने के आइटम मिटाकर रात के खाने के आइटम लिखते हैं.
वे सिर झुकाकर पूरे परिसर में घूमते हैं, वैन ड्राइवरों को मैसेज करते हैं जो जल्द ही कैंटीन से लौटने वाले होते हैं, साथ ही वे दीवार के साथ चल रही रोटी मशीन का निरीक्षण करते हैं, आलू छीलने की मशीन जो हर लोड के साथ गुर्राती है, और दांतेदार ट्रे जो अदरक, लहसुन, मिर्च को पीसकर पेस्ट बना देती है.
मनोज इस सब से बेपरवाह हैं. उनकी पिछली नौकरी मथुरा के रेलवे कैंटीन में इसी तरह की थी और यह अटल कैंटीन में उनकी जिंदगी का बस एक और दिन है. उनका काम अभी आधा ही हुआ है. चावल और दाल धो रहे लड़कों को पार करते हुए वे कहते हैं, “मैं नहाकर जल्दी ही आता हूं” और मुस्कुराकर बालों में हाथ फेरते हुए जोड़ते हैं, “मेरे उम्र से पहले ही सफेद हो रहे हैं...”
वहीं उनके ग्राहक उनकी आलोचना में कोई नरमी नहीं बरतते. उत्तर दिल्ली की कैंटीन में आने वाला एक लड़का अपनी थाली की ओर मुस्कुराते हुए देखता है और कहता है, “मुझे लगता है दाल में थोड़ा और होना चाहिए” शायद नमक का ज्यादा हिस्सा आलू में चला गया है, जो उसे ज्यादा खारा लग रहा है.

कुछ लोग, जैसे पश्चिम दिल्ली की कैंटीन में काम करने वाला 20-22 साल का एक लड़का जो सफाईकर्मी है, कहता है कि राजमा अच्छा है लेकिन थोड़ा और तेल और मसाला अच्छा होता: “हम इसे खाकर ऊब जाते हैं.” बुजुर्ग ग्राहक ठीक इसके उलट, यानी तेल और मसाले के कम इस्तेमाल को पसंद करते हैं. वहीं कुछ टीनएज लड़के स्टोर से खरीदे हुए फ्रेंच फ्राइज डालकर अपने खाने को स्वादिष्ट बनाते हैं.
उत्तरी दिल्ली की कैंटीन में छोटे बच्चों को शायद शिकायत का मौका भी नहीं मिलता. वे मुफ्त बिस्कुट और चिप्स से खुश रहते हैं, जबकि उनके माता-पिता दाल-चावल उनके मुंह में डालते रहते हैं. यह एक मार्केटिंग का एक तरीका है जो स्टाफ ने सोचा है.
अटल कैंटीन दिल्ली की एक नई पहल है जिसका उद्देश्य शहर की पोषण स्थिति को सुधारना है. राष्ट्रीय राजधानी में इसकी 100 शाखाएं हैं और हर दिन 1,00,000 थालियां लोगों को खिलाई जाती हैं : 50,000 दोपहर और 50,000 रात के लिए और हर थाली की कीमत होती है सिर्फ 5 रुपए.
राजधानी में यह इस तरह की योजना का नवीनतम संस्करण है. इससे पहले शीला दीक्षित और अरविंद केजरीवाल दोनों ने इसे आजमाया था लेकिन ज्यादा सफलता नहीं मिली. यह मॉडल तमिलनाडु, राजस्थान और कर्नाटक जैसे राज्यों की लोकप्रिय योजनाओं से प्रेरित है.
अर्थशास्त्री रितिका खेड़ा के 2024 के एक लेख के अनुसार, ये कैंटीन उन लोगों के लिए हैं जिनके पास खाना पकाने का समय, सुविधा या कौशल नहीं है, जैसे पुरुष प्रवासी मजदूर या बुजुर्ग; साथ ही यह महिलाओं के घरेलू काम के बोझ को कम करती हैं क्योंकि उन्हें रोज खाना नहीं बनाना पड़ता; और यह कामकाजी वर्ग के लिए एक ऐसा स्थान देती हैं जहां वे बिना किसी रोक-टोक के सामाजिक रूप से मिल सकें. साथ ही इससे पैसे की बड़ी बचत भी होती है.

ये कैंटीन उन पुरुषों के लिए राहत बन सकती हैं जो या तो भूखे रह जाते हैं या सड़क किनारे लगे स्टॉल से सेहत के लिए नुकसानदेह और महंगा खाना खरीदते हैं और इसकी मात्रा कम होती है सो वे इससे पेट पूरा भी नहीं भर पाते. किशन ( 57 वर्ष) मोटर पार्ट्स बेचने का काम करते थे, अब अपनी नौकरी खो चुके हैं. वे इन दिनों नंद नगरी की अटल कैंटीन में खाना खाते हैं. नौकरी खोने के बाद से वे अपनी पत्नी और बेटे का सामना नहीं कर पाए हैं. किशन बताते हैं, “दोनों घर पर खाते हैं. घर अब मेरे बेटे की कमाई से चलता है.”
किशन नौकरी ढूंढ रहे हैं और उन्होंने कैंटीन स्टाफ से भी पूछा कि क्या कोई वैकेंसी है लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. कोई भी उन्हें 10,000 रुपए महीने से ज्यादा देने को तैयार नहीं हैं और अगर वे दिल्ली के पॉश इलाकों में काम ढूंढंने जाएं तो आने-जाने का खर्च ही पूरा नहीं हो पाएगा. वे कहते हैं, “मेरी मजबूरी है कि मुझे ऐसे ही रहना पड़ता है. जब मैं कैंटीन में नहीं होता तो घर के बाहर यूं ही समय काटता हूं.” अपना खाना खरीदकर दूसरों के साथ खाना उन्हें राहत देता है- भूख और शर्म दोनों से.
इस योजना ने कई लोगों को पहली बार रोजगार भी दिया है, जिनमें युवा और महिलाएं शामिल हैं. 36 साल की मिंटू इन्हीं लोगों में से हैं. उन्होंने अपनी बेटियों की शादी के लिए लिए गए 2-2.5 लाख रुपए के कर्ज को चुकाने के लिए काम ढूंढना शुरू किया. तीन बेटियों की शादी हो चुकी है, एक बाकी है और उनके पति की राजमिस्त्री की आमदनी इसके लिए पर्याप्त नहीं है. वे बताती हैं , “आज मेरा पहला दिन है. गार्ड ने कहा था काम है लेकिन मैंने कहा मैं फर्श साफ नहीं करूंगी क्योंकि मैं नीची जाति की नहीं हूं.”
वे डिनर सर्विस तक कैंटीन में रुकने का फैसला करती हैं क्योंकि उन्हें बताया गया है कि बाद में बर्तन भी धोने होंगे. अटल कैंटीन और रसोईघरों में अक्सर ऐसे ही कामों का मेल देखने को मिलता है- सर्वर और कैशियर खाली ड्राइवरों की मदद लेते हैं और सफाईकर्मी सुरक्षा मुद्दों में ग्राहकों के साथ मिलकर काम करते हैं.
विष्णु गार्डन की कैंटीन में 55 वर्षीय गार्ड परसनाथ अपनी भलमनसाहत, लोगों को कतार में व्यवस्थित करने और छोटे बच्चों को संभालने के लिए जाने जाते हैं. वे खुद भी नियमित रूप से यहां खाते हैं, उन्हें डायबिटीज है और वे आलू से बचते हैं.
लेकिन जब रात के खाने में झगड़े होते हैं और शराबी लोग लड़खड़ाते हुए अंदर आकर लड़कों को परेशान करते हैं या महिलाओं से बदतमीजी करते हैं तो वे कहते हैं, “हम समस्या को प्यार से सुलझाने की कोशिश करते हैं.” हालांकि वे यह नहीं बताते कि जब यह तरीका काम नहीं आता तो वे क्या करते हैं.
पूर्वी दिल्ली की कैंटीन के 52 वर्षीय मैनेजर पवन एक तरह से पिता की भूमिका में हैं. उनके पास गार्ड नहीं है और इसके चलते उन्हें सख्ती करनी पड़ती है. वे गड़बड़ी करने वालों को कॉलर पकड़कर बाहर कर देते हैं और ज्यादा गुस्सा उन्हें उन लोगों पर आता है जो हर रात चिकन के साथ खाने के लिए रोटियों का ढेर लेने आता है. वे यह भी कहता हैं, “मैं ऐसे लोगों को संभालने के लिए नौकरी पर ही शराब पी लेता हूं. वरना कैसे मैनेज होगा?”
दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (DUSIB) इन कैंटीनों को मैनेज करता और कॉन्ट्रेक्ट जारी करता है. पी.के. झा इस सरकारी एजेंसी के सीईओ हैं. वे भी इन सुरक्षा समस्याओं को स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने सभी कैंटीनों में पूर्णकालिक गार्ड की योजना का प्रस्ताव दिया है और पुलिस से गश्त करने का अनुरोध किया है, “लेकिन आप भी जानते हैं, शराबी आदमी को कौन रोक सकता है? ऐसे इलाकों में दिक्कतें होती हैं.”
सुरक्षा इन कैंटीनों की एकमात्र समस्या नहीं है. रितिका खेड़ा के 2024 के लेख में कहा गया है कि भारत भर की सरकारी कैंटीनों को ज्यादा फंड की जरूरत है, खासकर इसलिए क्योंकि इनमें अंडा, दही, दही या छाछ जैसे प्रोटीन युक्त भोजन की कमी है. अटल कैंटीन भी इसी कमी से जूझ रही है जहां एक प्लेट की कीमत 30 रुपए है और सरकार 25 रुपए वहन करती है.

पूरे नेटवर्क के लिए अब तक 100 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं जो अन्य राज्यों के वार्षिक फंड के बराबर है, लेकिन और कैंटीनें खोलने की गुंजाइश है. खेड़ा एक उदाहरण देकर बताती हैं कि चेन्नई में दिल्ली की तुलना में लगभग चार गुना अधिक सरकारी कैंटीन हैं जबकि वहां की आबादी कम है.
इसके अलावा लागत भी बदलती है. झा के मुताबिक शुरुआत में एक अटल कैंटीन बनाने की लागत लगभग 17 लाख रुपए थी जो अब 23 लाख रुपए हो गई है. दिल्ली के शहरी विकास मंत्री आशीष सूद कहते हैं कि इस बजट में शौचालय और कर्मचारियों के आराम के लिए विश्राम स्थल बनाने की योजना भी शामिल है.
इस योजना की स्थिरता उन राज्यों की तरह ही खतरे में है जैसे तमिलनाडु, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश- जहां राजनीतिक बदलाव के साथ फंड अचानक रुक सकते हैं. इसे नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट में शामिल करना इसे सुरक्षित बना सकता है लेकिन इसकी संभावना कम है. वहीं 2024 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने हर राज्य में सरकारी कैंटीन खोलने का निर्देश देने से इनकार कर दिया था.
इस बीच हाल के महीनों में और लोग अटल कैंटीन की ओर आए हैं क्योंकि अमेरिका-इज़राइल-ईरान युद्ध के कारण देशभर में एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति कम हो गई.
दक्षिण दिल्ली की रसोई में हालांकि कोई कमी नहीं है. यहां मनोज नहाकर वापस आ गए हैं. उनके बालों में डाई (रंग) लगा हुआ है. खाना लगभग तैयार है और अब उसे इंसुलेटेड कंटेनरों में भरकर वैन से भेजा जाना है. वे कहते हैं, “जब ड्राइवर निकल जाएंगे तो हम कपड़े धोकर सुखाएंगे, पास के पार्क में टहलने जाएंगे, फिर किचन को एक बार और साफ करेंगे और फिर शटर बंद कर देंगे.”
नहाने की व्यवस्था, कपड़े सुखाने की रस्सी, गद्दे- सब कुछ उसी परिसर में है. जब वे सोते हैं तब दिल्ली उनका बनाया हुआ खाना खा रही होती है.
तो क्या यहां का खाने वाला हर कोई संतुष्ट होगा? नहीं, पूरी तरह नहीं. नमक, मसाले और तेल पर बहस चलती रहेगी लेकिन यही इस काम की प्रकृति है. हर कोई मीन-मेख निकाल देता है.

