आज से 25 साल पहले 13 मई 2001 को 32 साल के एक वकील हिमंता बिस्वा सरमा पहली बार असम विधानसभा पहुंचे थे. उन्होंने जलुकबाड़ी सीट से भृगु कुमार फूकन को हराया था, जो असम गढ़ परिषद के वरिष्ठ नेता थे, और यह जीत कांग्रेस की टिकट पर मिली थी.
4 मई को असम ने उन्हें इससे बेहतर रजत जयंती का तोहफा शायद ही दिया हो. पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में BJP का नेतृत्व करते हुए सरमा ने अपनी पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाई. BJP ने जिन 90 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से 82 जीतीं, जबकि BJP के नेतृत्व वाले गठबंधन NDA ने, जिसमें एजीपी और बोडो लैंड पीपल्स फ्रंट शामिल हैं, कुल 126 में से 102 सीटें जीतीं.
यह आंकड़ा आजादी के बाद असम में किसी भी पार्टी को मिले तीसरे सबसे बड़े जनादेश के बराबर है. कांग्रेस ने 1972 में 126 में से 95 सीटें जीती थीं और 1983 में 91 सीटें, जब असम आंदोलन के दौरान चुनाव का बड़े पैमाने पर बहिष्कार हुआ था. 2011 में कांग्रेस को 78 सीटें मिली थीं और उस जीत के पीछे भी सरमा की बड़ी भूमिका थी, हालांकि तब उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के साथ इसका श्रेय बांटना पड़ा था. लेकिन इस बार इस जीत का पूरा सेहरा उनके सिर पर ही बंधा है.
यह जनादेश सरमा के लिए बहुत जरूरी भी था. कांग्रेस में रहते हुए वे 2011 से खुद को मुख्यमंत्री बनाने की मांग करते रहे थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि वे राज्य के लिए ज्यादा कर सकते हैं. कांग्रेस नेतृत्व इस बात से सहमत नहीं हुआ और अगस्त 2015 में वे BJP में शामिल हो गए. नई पार्टी में भी उन्हें 2021 तक इंतजार करना पड़ा, तब जाकर उन्हें वह पद मिला जिसकी मांग वे एक दशक से कर रहे थे.
मुख्यमंत्री बनना भी आसान नहीं था. 2016 और 2021 में BJP की जीत के वे मुख्य रणनीतिकार थे लेकिन इन जीतों को सिर्फ उनके नाम से नहीं जोड़ा गया. मई 2021 में उन्हें मुख्यमंत्री बनने के लिए पार्टी नेतृत्व के साथ जूझना पड़ा जो मौजूदा मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल को हटाने के पक्ष में नहीं था, खासकर ऐसे व्यक्ति के लिए जो सिर्फ छह साल पहले पार्टी में आया था. इस तरह मुख्यमंत्री बनना आधी जीत थी. पूरी जीत के लिए उन्हें अपने नाम पर जनादेश चाहिए था.
इसीलिए BJP की सीटें 2016 और 2021 में मिली 60 सीटों से काफी ज्यादा बढ़ाना जरूरी था. इस बार सरमा ही चुनाव का चेहरा थे और यह संदेश दिया गया कि असम को उसका सबसे अच्छा मुख्यमंत्री एक दशक देर से मिला. इस कसौटी पर देखें तो उन्होंने सिर्फ जीत हासिल नहीं की, बल्कि पूरा समीकरण बदल दिया.
इस जनादेश की जमीन सोच-समझकर तैयार की गई थी. सरमा ने असम की राजनीति की पुरानी चिंता को फिर से उठाया, यानी बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ का खतरा, और इसी मुद्दे पर चुनावी अभियान तैयार किया. दरअसल ज्यादातर अवैध प्रवासी मुस्लिम माने जाते हैं, इससे गैर-मुस्लिम मतदाताओं का एकजुट होना आसान हुआ. आलोचकों ने इसे सांप्रदायिक राजनीति कहा लेकिन असम में यह मुद्दा 1980 के दशक के असम आंदोलन से ही भावनात्मक और पहचान से जुड़ा रहा है.
पहचान की राजनीति के साथ सरमा ने नकद लाभ की राजनीति भी जोड़ी. सरकार के अनुसार, असम के लगभग हर चार में से तीन लोग किसी न किसी कल्याण योजना से जुड़े हैं. प्रमुख योजना ‘ओरुनोदोई’ है, जिसके तहत महिलाओं को हर महीने सीधे पैसे दिए जाते हैं. अब इसकी राशि बढ़ाकर 1400 रुपए कर दी गई है और करीब 38 लाख परिवार इससे जुड़े हैं. इस तरह एक लाभार्थी वर्ग बना है जिसने 9 अप्रैल को वोट दिया.
विकास का मुद्दा भी इससे जुड़ा रहा. सड़कें, पुल, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और निवेश सम्मेलनों ने इसे मजबूत किया, जबकि ‘मिशन बसुंधरा’ के जरिए जमीन के रिकॉर्ड को व्यवस्थित किया गया. रोजगार के अवसर और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया के दावे ने युवाओं की नाराजगी को कम किया. कुल मिलाकर यह एक ऐसा शासन मॉडल बना, जिसे विपक्ष न तो बराबरी से पेश कर सका और न ही पूरी तरह खारिज कर पाया.
चुनावी नक्शा भी उनके पक्ष में बदला. चुनाव आयोग की 2023 की परिसीमन प्रक्रिया में उन सीटों की संख्या घटाकर लगभग 36 से 22 कर दी गई, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक थे. कुछ इलाकों को बांटा गया, कुछ को जोड़ा गया और कुछ सीटों को अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित किया गया. विपक्ष ने इसे गड़बड़ी कहा, जबकि BJP ने इसे स्थानीय लोगों के हित की रक्षा बताया. इससे कांग्रेस के लिए जीत का रास्ता और मुश्किल हो गया.
फिर नैरेटिव की लड़ाई आई, जिसे सरमा ने चुनाव से पहले ही जीत लिया. चुनाव से पहले उन्होंने कांग्रेस के कई नेताओं को BJP में शामिल कराया जिनमें दो बार के सांसद प्रद्युत बोरदोलोई और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा शामिल थे और दोनों BJP के टिकट पर जीत गए. जब कांग्रेस के नेतृत्व में आठ दलों का गठबंधन बना, तब तक माहौल बदल चुका था. BJP मजबूत दिख रही थी और विपक्ष कमजोर.
उन्होंने अपनी पिछली गलतियों से भी सीखा. 2024 में जब गौरव गोगोई ने जोरहाट लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, तब सरमा ने उनके खिलाफ आक्रामक अभियान चलाया था. इससे मुकाबला ‘डेविड बनाम गोलियाथ’ जैसा लगने लगा और गोगोई को सहानुभूति मिली, जिससे वे जीत गए. इस बार जब गोगोई ने विधानसभा चुनाव में वही सीट चुनी, तो सरमा ने जानबूझकर शांत रणनीति अपनाई. नतीजा साफ रहा, गोगोई को BJP के हितेंद्र नाथ गोस्वामी ने 23,182 वोटों से हरा दिया.
उस दौरान सरमा का अभियान एक तरह से राष्ट्रपति शैली का था. धुबरी से सादिया तक उन्होंने लोगों से कहा कि अगर स्थानीय उम्मीदवार पर भरोसा न हो, तो उन पर भरोसा करें. ऐसा वे इसलिए कर सके क्योंकि दो दशकों के काम ने उनकी छवि बनाई है कि वे अपने वादे पूरे करते हैं, चाहे लोग इसे सही मानें या गलत. समर्थकों के लिए वे निर्णायक हैं, आलोचकों के लिए नियमों की परवाह कम करते हैं, लेकिन ज्यादातर मतदाताओं के लिए वे प्रभावी हैं.
इसके साथ ही उन्होंने “मामा” की छवि भी बनाई है. वे गांवों के लोगों के संदेशों का जवाब देते हैं, रैलियों में लोगों को अपने पास आने देते हैं और सुरक्षा के बावजूद उनका दिया खाना-पानी स्वीकार करते हैं. आलोचक कहते हैं कि उनका कभी-कभी असंसदीय और सांप्रदायिक भाषा का इस्तेमाल इस पद के लिए ठीक नहीं है. लेकिन उन्होंने इस पद को आम लोगों के करीब लाने की कोशिश की है, और यही कई मतदाताओं को पसंद आता है.
इस नतीजे का असर असम से बाहर भी दिखेगा. अब सरमा को BJP में देवेंद्र फडमवीस और योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं के साथ देखा जा रहा है. इन नेताओं को खासतौर पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बाद वाले दौर के लिए प्रधानमंत्री पद के संभावित चेहरों के रूप में माना जा रहा है. वे पहले से ही इन दोनों के भरोसेमंद सहयोगी हैं और अक्सर मुश्किल हालात में पार्टी के काम संभालते हैं.
यह जनादेश अलग है. यह उनकी अपनी लोकप्रियता और काम पर आधारित है, न कि किसी राष्ट्रीय लहर पर. यही बात उन्हें BJP में एक खास नेता बनाती है. 25 साल पहले जो नेता पहली बार विधानसभा पहुंचा था, अब उसने खुद के दम पर जनादेश हासिल कर लिया है.

