राजस्थान की सियासत में नेता-पुत्रों की सक्रियता को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है. इस चर्चा को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के उस बयान ने नई धार दी है, जिसमें उन्होंने कहा, "मुख्यमंत्री सहित सबको चाहिए कि वे अपने बेटों को राजनीति से दूर रखें. वरना ये बेटे कब आपकी बदनामी करवा देंगे, आपको पता भी नहीं चलेगा."
सियासी जानकार मानते हैं कि गहलोत ने इस बयान के जरिए चाहे मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री का जिक्र किया हो, मगर उनका निशाना अपने सियासी प्रतिद्वंद्वियों पर रहा है. सियासी मामलों के जानकार गजेंद्र सिंह कहते हैं, "राजस्थान में इन दिनों गहलोत के कई धुर विरोधी नेता अपने पुत्रों की सियासत में एंट्री की जुगत कर रहे हैं. ऐसे में गहलोत ने अप्रत्यक्ष तौर पर उन्हें निशाना बनाया है."
यहां ध्यान देने वाली बात है कि तीन महीने पहले ही यानी 27 दिसंबर 2025 को जयपुर में कांग्रेस के छात्र संगठन (NSUI) की 'अरावली बचाओ' रैली में सचिन पायलट अपने बेटे आरान पायलट के साथ दिखे थे. वहीं, 9 मार्च को पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपने पूरे परिवार के साथ प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात करती नजर आई थीं.
अशोक गहलोत का यह बयान इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उनके अपने राजनीतिक कार्यकाल में भी परिवारवाद के कई उदाहरण सामने आते रहे हैं. गहलोत के बेटे वैभव गहलोत की राजनीति में एंट्री भी उनके प्रभाव से ही मानी जाती है. राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के जरिए सक्रियता बढ़ाने के बाद उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में जोधपुर से कांग्रेस का टिकट मिला, मगर BJP के गजेंद्र सिंह शेखावत ने उन्हें ढाई लाख से भी ज्यादा वोटों के अंतर से शिकस्त दी. इसके बाद 2024 में वैभव गहलोत को जालोर-सिरोही लोकसभा क्षेत्र से फिर मैदान में उतारा गया, लेकिन वहां भी उन्हें जीत नहीं मिल सकी. जबकि अशोक गहलोत ने नतीजे आने तक अपने बेटे के चुनाव अभियान की पूरी कमान संभाले रखी थी.
इस दौरान गहलोत के पुत्र-मोह को लेकर उन पर कई सियासी हमले भी हुए. गहलोत सरकार के दौरान ही तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. रघु शर्मा के बेटे समीर शर्मा के विभागीय बैठकों में दखल का मुद्दा भी खूब छाया रहा. मंत्री के बेटे की इस दखलंदाजी को लेकर विभाग के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने आपत्ति भी दर्ज कराई थी, मगर समीर को रोकने की जगह संबंधित अधिकारी का ही तबादला कर दिया गया. गहलोत सरकार में जल संसाधन मंत्री रहे महेंद्रजीत सिंह मालवीय के बेटे प्रेम प्रताप मालवीय की सियासी दबंगई के मामले भी काफी चर्चा में रहे. अशोक गहलोत के दूसरे कार्यकाल में विधानसभा अध्यक्ष रहे दीपेंद्र सिंह शेखावत के बेटे बालेंदु शेखावत की सियासी सक्रियता भी उस दौरान खासी चर्चा में रही थी.
नवंबर 2024 में झुंझुनूं विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में कांग्रेस ने जिन अमित ओला पर भरोसा जताया, वे पूर्व केंद्रीय मंत्री शीशराम ओला की तीसरी पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं. अमित ओला के पिता 2024 के लोकसभा चुनाव में झुंझुनूं संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए हैं. उनकी पत्नी राजबाला ओला जिला प्रमुख रही हैं.
BJP नेता लक्ष्मीकांत भारद्वाज कहते हैं, "दूसरों को नसीहत देने से पहले अशोक गहलोत को अपने घर में झांक लेना चाहिए. जिन्होंने अपने बेटे की सियासत चमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, वही आज राजनीतिक शुचिता की बात कर रहे हैं. गहलोत अगर परिवारवाद के इतने ही खिलाफ हैं, तो पहले उन्हें अपने घर से शुरुआत करनी चाहिए."
हालांकि परिवारवाद सिर्फ कांग्रेस तक सीमित नहीं है. BJP में भी राजनीतिक विरासत का असर साफ दिखाई देता है. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह लगातार चार बार सांसद रह चुके हैं और अब अगली पीढ़ी के रूप में उनके बेटे विनायक प्रताप सिंह को आगे लाने की चर्चाएं भी शुरू हो चुकी हैं. इसी तरह BJP के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ के बेटे पराक्रम सिंह राठौड़ और स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के पुत्र धनंजय सिंह खींवसर भी सक्रिय सियासी भूमिका में नजर आ रहे हैं.
मौजूदा मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के छोटे बेटे कुणाल शर्मा की सियासी सक्रियता भी इन दिनों चर्चाओं में है, वहीं उपमुख्यमंत्री प्रेम चंद बैरवा के पुत्र चिन्मय भी कई मामलों को लेकर चर्चित रहे हैं. कुछ मामलों में नेता पुत्र सीधे चुनाव मैदान में नहीं उतरते, लेकिन चुनावी रणनीति और मैनेजमेंट में उनकी भूमिका अहम हो गई है. जैसे जयपुर ग्रामीण से सांसद राव राजेंद्र सिंह के बेटे देवायुष सिंह और पूर्व मंत्री नरपत सिंह राजवी के पुत्र अभिमन्यु सिंह राजवी अपने-अपने क्षेत्रों में चुनावी प्रबंधन संभालते रहे हैं. राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवाड़ी ने भी अपने पुत्र आशीष तिवाड़ी की सियासत चमकाने के लिए खुद का राजनीतिक करियर दांव पर लगा दिया था. पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी भी अपने बेटे नितिन जोशी को संगठन के जरिए सियासत में लाने की कोशिश में जुटे हैं.
दरअसल, राजस्थान की राजनीति में यह परंपरा नई नहीं है, लेकिन अब यह ज्यादा खुलकर सामने आ रही है. गहलोत के बयान ने इस बहस को फिर से जिंदा कर दिया है, लेकिन सच्चाई यही है कि चाहे कांग्रेस हो या BJP, लगभग हर दल में अगली पीढ़ी अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस विरासत की राजनीति को कितनी स्वीकारोक्ति मिलती है और सियासी पार्टियां योग्यता और परिवार के बीच कैसे संतुलन बनाती हैं?

